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रेशमी सलवार

(1)
लखनऊ में सर्दियों का मौसम शुरू हो गया था ,,
मैं अपने छोटे से मकान में बैठा अपनी एक अधूरी कहानी के किरदारो में उलझा सा था ,,
तभी डोरबेल बजने की आवाज आई ..
मैं झल्ला कर उठा और दरवाजा खोला समाने पोस्टमैन था ...
अंकित साहब आप ही हो उसने कहा ,, जी हा कहिये ...
आपके नाम एक तार हैं मैं तार लिया और दरवाजा बंद कर किचन में आ गया और देर से रखी चाय को स्टोव पर गर्म करते करते तार को पढ़ने लगा ..
तार मेरे अजीज दोस्त अद्दनान का था ,,
अंकित कल सुबह की बस से एक लड़की आ रही है उसे कोई काम दिलवा देना ...
खुदा हाफिज जल्द ही मिलेगे ...
मै थोड़ी देर सोचता रहा चाय पी और कहानी में खो गया ...
सुबह करीब नौं बजे फिर से डोरबेल बजी ...
दरवाजा खोलते ही मेरे समाने एक छरहरे बदन की गोरी नौजवान लड़की खड़ी थी ..
उसने कहा अंकित आप ही हो ...
जी हा ...
अद्दनान साहब ने भेजा है मुझे ...
मेरा नाम नगमा हैं ,,
वोह यह वही नगमा थी अद्दनान की प्रेमिका ..
आप अन्दर आ जाईये ...
उसके चेहरे पर एक मुस्कुराहट थी ...
मैंने एक चाय की प्याली को उसकी ओर बढ़ाते हुये कहा ..
शौक फरमाईये जी ...
चाय पीते पीते उसने कहा अंकित जी लखनऊ में किसी अच्छे डाक्टर को जानते हो आप ...
क्यो जी क्या तकलीफ हैं ...वह शांत थी
मेरी सिगरेट की डिब्बी से एक सिगरेट निकलते हुये उसके कहा माफ करना में सिगरेट पीती हूँ ,,,
वह सिगरेट ही नही पीती थी ...
सुट्टा भी लगाती थी बिल्कुल मर्दो की तरहा ...
तभी उसने कुवांरी लड़कियो की तरहा पैर पटके और खड़ी हो गयी ..
हाय अल्लाह कैसे कहू आपसे .....
मुझे शर्म आती हैं ...
मैं थोड़ा शांत था जी निश्चिंत होकर कहिये ....
जी बात यह है की पंद्रह दिन के उपर हो गये मुझे डर है की कही कुछ .................
पहले तो मैं नही समझ पाया परन्तु जब वह बोलते बोलते रूक गयी तब समझा और जोर से हंसा .....
वह शरमा गयी ...
मैने अपनी बद्दतमीजी के लिये माफि मांगी ...
वह आगे बोलने ही वाली थी तभी मेरा एक दोस्त आ गया जिसे मैने नगमा को कही काम दिलवाने के लिये कहा था ....!!
शादिक ने नगमा से कुछ बातचीत की और उसे अपने आफिस में काम दे दिया ....
तभी नगमा ने अपने लखनऊ में रहने की चिंता जताई ....
मेरे दिमाक में शादिक का लालबाग वाला खाली पड़ा फ्लैट आया ...
शादिक तुम्हारा लालबाग का फ्लैट खाली है न ...हा भाई उसने जवाब दिया ...
तुम नगमा को वहा कुछ दिन रूकने की म़जूरी दे दो ...
शादिक नगमा को लेकर लालबाग की तरफ निकल गया ...
मुझे शादिक पर थोड़ा भारोसा कम रहता है क्योकि वह एक बेहद निर्दयी किस्म का इंसान हैं ...
पहले मुर्गे को ले आयेगा फिर उसकी गरदन को मरोड़ कर उसका शोरबा निकलेगा और उसको पीकर एक मुर्गे के आंसुओ में डूबी कविता लिखेगा ....
घाव हो जाये पर वह इलाज नही करवाये गा ..
कई बार इन्ही बातो के कारण मेरी झडप भी हो चुकी है उससे ....
मैने तुरन्त मनोज को टेलीफोन किया ...हा हेल्लो कौन ...
मनोज मैं अंकित बोल रहा हूँ ...
शादिक के आफिस में एक नगमा नाम की नयी लड़की आई है ...
नयी है उसे कुछ समझ न आये तो मदद कर देना ..उसकी ...
ओके ब्रो कहते हुये उसने टेलीफोन रख दिया ......
दो चार दिन बीतने के बाद मैं मानसिक थकान दूर करने अपने गांव चला आया ......
वहा मैं अद्दनान से मिला ..
अद्दनान नगमा की तरीफ करते न थक रहा था ...
लगभग बीस दिन के बाद मैने वापस लखनऊ की तरफ रूख किया ....
स्टेशन से उतर कर मै तुरन्त लालबाग की तरफ निकल पड़ा क्योकि अद्दनान ने बहुत जोर देकर कहा था की पहले उसकी खैरियत ले लेना ....
मै फ्लैट पर पहुचा डोरबेज बजाने ही वाला था की शादिक ने दरवाजा खोला ...
अरे भाई आप ..कब आये ...
अभी आया यार और कैसा है ...
मै उसको चीरते हुये अन्दर प्रवेश कर गया ...
आप बैठिये मुझे आफिस के लिये देर हो रही ...
उसने कहा और तेजी से बाहर की तरफ निकल गया ...
नगमा के कमरे का दरवाजा खुला था ...
रजाई से एक चुडियो वाला गोरा सा हाथ बाहर निकला और कुर्सी पर रखी रेशमी सलवार को अन्दर की खीच लिया ...
तीन मिनट बाद नगमा मेरे समाने थी ...
और मेज पर चाय भी ...
चाय पीते पीते उसने अद्दनान के बारे में जानना चाहा मैने कहा वह कुछ रोज में आने वाले हैं लखनऊ ...
वह मुस्कुराई ..
करीब एक घंटे बाद मैं अपने मकान पर वापस आ गया ...
और अपनी एक निरस कहानी लिखने में व्यस्त हो गया ...
कहानी कब पूरी हुयी मुझे कुछ याद नही ...
उसकी अगली ही सुबह अद्दनान और नगमा मेरे समाने थे ...
मैने अद्दनान का जोरदार स्वागत किया ...
और हालचाल पता किया घर का ....
फिर हम सभी कभी देर तक बातचीत करते रहे ...
और खाना खा कर सोने के लिये कमरे में चले गये ...
वैसे तो नगमा ने अद्दनान से अपने सम्बंधो के बारे मे कुछ नही बताया था मुझे इसलिये मैने सबके लिये अलग अलग कमरो का बंदोबस्त कर दिया ...
मै अकसर रात मे दो तीन बजे एक बार उठता हूँ ...
जब मै उठा तो याद आया पीने का पानी तो नगमा के कमरे में है और मुझे जोर की प्यास लगी थी ...
मैने दरवाजा खटखटाया ...
नगमा थोडी देर मे बाहर आई ...
मैने उससे पानी मांगा और वही खड़े होकर पीने लगा तभी मेरी नजर रजाई से बाहर आती दो टांगो पर पड़ी ...
वह अद्दनान था ...
मैं वापस आ गया और सोने की कोशिश करने लगा ...
सबेरे थोडी देर से उठा तो कुछ गर्मागर्मी सुनी बाहर आकर देखा तो अद्दनान अपना समान लेकर कही जा रहा था ..और नगमा ताकिये से मुँह छूपा कर रो रही थी ....
अद्दनान ने हाथ मिलाते हुये कहा ..
ज्लद मिलेगे खुदा हाफिज |
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(2)

मैं चुपचाप वापस कमरे में आ गया और ...
नगमा को तस्सली देने लगा ...
वोहहह इसे तो तेज बुखार हैं मैने उसे अपने पास रखी कुछ दवाईया दी ..
और बाहर सिगरेट पीने चला आया ...
जब वापस लौटा तो नगमा सो चुकी थी ...
मैने उसे जगा कर अद्दनाम से हुयी झडप के बारे मे जानना मुनासिब न समझा ...
शाम को वाहिद का फोन आया ..
नगमा ने उससे थोडी देर बात की और अपना समान बाधंने लगी ...
मैने भी उससे बिना कुछ बोले उसे लालबाग छोड़ आया .....
इधर मैं कुछ ज्यादा ही व्यस्त हो गया ...और नगमा को भूल सा गया एक दिन दोपहर को अचानक मनोज का फोन आया हेल्लो अंकित ...कहा हो ...
घर पर हूँ कहो क्या हुआ ...
मेरे पास चले आओ फोन पर बात नही हो सकती ...
यह कह कर उसने फोन रख दिया था ...
मनोज अक्सर मुसीबत मे फंस जाता था इसलिये मुझे लगा आज भी यह कही गड़बड़ कर चुका हैं ....
मै सीधे उसके घर पहुच गया ...
वह बालकनी में मेरा बेसब्री से इंतजार करता हुआ दिखा ....
अरे यार कहा थे तुम इतने दिनो ...
नगमा के बारे मे कुछ पता हैं ....
मैने कहा नही तो वह वाहिद के फ्लैट पे उसके साथ ही तो रहती हैं ....
मनोज ने कहा नही वाहिद ने उसे उसी दिन ही निकाल दिया था ...
फ्लैट और नौकरी से ...
बेचारी का कुछ पता नही है कहा गयी होगी ....
मै मनोज को लेकर सीधे वाहिद के आफिस गया और पता किया एक सहकर्मी ने बताया की वह अपनी एक मित्र के घर बिमार हालत में पड़ी है ...
कुछ घंटो बाद नगमा मेरे सामने थी ...
हे राम यह वही है मुझे विश्वास न हुआ ...
मैने तुरन्त उसे नजदीक के एक डा के पास भर्ती करवाया ...
उसके आंख में आंसु थे ,जो शायद बाहर निकलना चाहते थे परन्तु उसकी दबी हुयी पलके उन्हे रोक रखी थी ....
डा ने बताया उसके दोनो फेफड़ो में सूजन हैं और जान का खतरा हैं ...
मैं जब बाहर निकला तो मनोज गायब था ...मैने बहुत तालाश की पर वह मुझे न मिला थक कर मै वही सो गया ...
जब सबेरे आंख खुली तो मनोज मेरे सामने था ...
और हल्के हल्के मुस्कुरा रहा था ..उसने मुझे तीन शीशियां दिखाई जिनका मुंह रबर से बंद था ...
जानते हो यह क्या है ?"
मैंने कहा - मालूम नही ___इंजेक्शन से लगते है !"
मनोज मुस्कुराया ---" इंजेक्शन ही हैं !
लेकिन पेंसिलिन के !
मुझे आश्चर्य हुआ क्योकि इसके पास पेंसिलिन कहा से आई ...
मैने उससे पता करना चाहा पर वह बोला नगमा को होटल सिफ्ट करना पड़ेगा ...
मैने कुछ इन्तेजाम कर उसे समाने के होटल में सिफ्ट करवा दिया ...
नगमा चाकित थी की उसे इस हालत में कहा ले जा रहे ...
वह आंख बंद करके अपनी जिंदगी के बचे पलो को जी रही थी ...
जब मनोज हाथ मे सिरिंज लेकर आया तब उसने मुह फेर लिया और बोली अंकित साहब इसे बाहर ले जाईये बहुत ही बद्दतामीज किस्म का आदमी है ......
मनोज चुप रहा ...और नगमा के कुल्हो पर सिरिंज लगा दी .....
पहला इंजेक्शन नौ बजे लगा अब तीन घंटे बाद दूसरा लगना था ...
मनोज को अपने इंजेक्सन पर पुर्ण विश्वास था ....जब वह दूसरी बार सिरिंज लेकर कमरे में गया तो कमजोर होने के बावजूद नगम् तैश में आकर बोली ...
अंकित इस हरामखोर को कह दो बाहर चला जाये वरना मैं खुद ही चली जाऊगी .....
मनोज मुस्कुराया - जानेमन बिना यह इंजेक्सन लगाये मैं नही जाने वाला ....
जान का सवाल है ...
उसने बडी निर्दयी तरीके से सिरिंज चुभो दी नगमा कराह उठी ...
लेकिन पेंसिलिन उसके शरीर मे जा चुकी थी ....
करीब रात को पांचवा इंजेक्सन लगना था ....
नगमा कमरे में आंखे खोले लेटी थी ...
मनोज ने कहा क्यो जानेमन क्या हाल हैं ..
नगमा चुप थी ....ये जो इंजेक्सन मैं तुम्हे दे रहा इश्क के नही है तुम्हारा निमोनिया दूर करने के इंजेक्सन हैं !
मनोज ने सिरिंज लगा दी थी ...और हम कमरे से बाहर थे ....नगमा की हालत में भी सुधार था !
मैं दो दिनो से जगा हुआ था तो मनोज को वही छोड़ कर घर आ गया ओर वहा मुझे पिताजी की तबीयत के बारे में पता चला मैने मनोज के नाम एक तार छोड़ दिया और सीधे रात की गांडी से गांव निकल गया ...
कुछ दिनो में पिताजी की तबियत ठीक होने के बाद मुझे नगमा की चिंता हुयी मनोज का तार भी न आया था ...
इसलिये मैने वापस लखनऊ जाने का फैसला किया ...अगली सुबह मै लखनऊ में था मैने सीधे रिक्शा कर होटल जाना सही समझा ...नगमा होटल में ही थी अभी ...
कमरे का दरवाजा खुला था ...
मैंने तेजी से भीतर प्रवेश किया ...नगमा मुझे देख शरमा कर रजाई में घुस गयी ...
और मनोज मुस्कुरा रहा था ...अरे यार अंकित आओ बैठो कैसे हो ...
माफ करना यार मैं दरवाजा बंद करना अक्सर भूल जाता हूँ ...
और सुनो वह कुर्सी पर पड़ा नगमा का "रेशमी सलवार" उठा देना जरा .....:-)

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