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मोदी सरकार को हिंदुवादी समझना हिंदुओं की सबसे बड़ी भूल थी और उन्हें हिंदुवादी समझते रहना उससे भी बड़ी भूल होगी ।

वे हिंदुवादी कभी न रहे । गुजरात के परिप्रेक्ष्य मे विरोधियों ने उन्हें हिन्दूवादी की उपाधि दे दी जिसका उन्होने कभी खंडन नहीं किया । इतनी ही बात है। वैसे भी मोदी जी अपना तय काम करते जाते हैं, विरोधियों के आरोपों का खंडन करने में अपनी ऊर्जा नष्ट नहीं करते । लेकिन अगर हिंदुओं को मोदी जी या उनके सरकार से कुछ काम करवाने होंगे तो अपना जातिनिरपेक्ष तगड़ा वोट बैंक बनाना होगा तभी बात बनेगी ।

वैसे एक बात बताइये मेरे हिन्दू भाइयों और बहनों, क्या आप ने वाकई कुछ सोचा है जो अगर कार्यान्वित किया जाये तो भले आप की पीढ़ी में असर न दिखाये, लेकिन तीसरी पीढ़ी से आगे कई पीढ़ियों के लिए लाभ और सुरक्षा दोनों प्रदान करेगा ?

आप को पता न हो तो मुसलमान और इसाइयों की योजनाओं को देखिये, हमेशा लॉन्ग टर्म प्लानिंग होती है । उनके फायदे में हमारा नुकसान जरूर होता है और वह किस तरह से करना है यह भी उनके प्लानिंग में है ।

हमारे नुकसान की उन्हें चिंता इसलिए नहीं होती क्योंकि हमें भी हमारे नुकसान की चिंता नहीं होती ।

फिर भी उनके पास यह भी योजना हमेशा होती है कि जिस दिन हम हमारी चिंताओं को लेकर मुखर होंगे, प्रखर होने के पहले वे मुख बंद किए जाये ।

वे यशस्वी होते हैं या नहीं यह अलग बात है लेकिन यह उनकी सोच का हिस्सा होता है यह हमें हिसाब में लेना चाहिए । क्या हमारे पास ऐसी सोच है या फिर क्या हम ऐसी सोच रखनेवालों को प्रश्रय देते हैं ? क्या हम इस बात की जरूरत भी समझते हैं या यही सोचते हैं कि मैं क्या कर सकता हूँ, जाने दीजिए, बेटे को विदेश भेज दूंगा बेटी के लिए दामाद भी वहीं का ढूंढ लूँगा ।

हमारे असली प्रशासक वर्ग याने ब्यूरोक्रेट्स और न्यायाधीश वगैरा भी तो यही करते आए हैं जब कि इस देश को अपनी संतान को रहनेयोग्य रखने का जिम्मा वास्तव में उनका रहा है ।

आप को यह कहावत अभी भी याद होगी ही कि फलदार पेड़ का बीज पोतों के लिए लगाया जाता था जिसे लगानेवाले पीढ़ी सींचती थी, उसकी अगली पीढ़ी सहेजती थी और तीसरी पीढ़ी उससे लाभान्वित होती थी । यह मानसिकता क्यूँ और कैसे भुलाई गई ? ज्यादा सोचना नहीं होगा अगर आँखें खोलकर यह देखें कि हमें सब कुछ ‘इंस्टंट’ की आदत शायद इसी लिए डाली गई हो ।

जिंदगी को जवानी में नहीं भोगेंगे तो कब भोगेंगे ? अभी कर्जा लीजिये, उपभोग कीजिये । यह नहीं कहता कोई कि बाद में जिंदगीभर कर्जा और ब्याज भुगतते रहिए । आप को रत्नाकर डाकू बनाते हैं ये सब, आप के परिजनों को बरगला कर ।

एक जमाना था जब पहले आदर्शवादी सोच रखनेवाला व्यक्ति पत्नी और बच्चों के ‘सुख’ के लिए घूस लेने की शुरुवात करता था । आज ऐसी ही नौकरियाँ पाने के लिए घूस दी जाती है जहां घूस मिलने की अधिकाधिक क्षमता है । और जिसके पास ऐसी नौकरी है वही पुरुष के घर लड़कियों के पिता लाइन लगाते हैं ।

सूची लिखने का मेरा कोई इरादा नहीं है क्योंकि अगर दस मुद्दे भी लिखे तो कमेंट्स में केवल आरोप प्रत्यारोपों की बरसात होगी कि आप को यह नहीं दिखा या वह नहीं दिखा, आप पक्षपात कर रहे हैं । यह कहना जरूरी नहीं कि यह आरोप लगानेवालों पर उन दस में से कुछ मुद्दे सही में फिट बैठ रहे हों ।

नहीं, मुझे कोई लिस्ट नहीं लिखनी, आप खुद ही खुद से आँख मिलाकर सोचिए आप को क्या करना है । बेटे को यू एस या यू के भेजना है तो आप का चॉइस है, आप के बुढ़ापे में कोई मियाभाई, डेयरिंग कर के आप की कोठी में घुस आए और उसे कबजाए तो यही याद रखिएगा कि यह कबजाना उसके 1450 साल की प्लानिंग में था, उसे बचाने के लिए आप की कोई प्लानिंग नहीं थी । आप का दिमाग उस कोठी को बनाने के लिए जैसे तैसे कैसे भी पैसे बनाने में लगा था, उसका दिमाग उसे हथियाने का मौका ढूँढने में । डेयरिंग की उसके पास कमी नहीं, और आप डेयरिंग की सोचने की भी डेयरिंग नहीं करते ।

सेनाएँ हमारी सीमाओं का रक्षण करती हैं, उनके निर्वहन के लिए हम टैक्स देते हैं । आप के घरों के रक्षण का जिम्मा आप का है । आप को जज़िया दे कर फिर भी दोयम दर्जे का नागरिक और वो भी रहमो करम पर रहना है या अपने देश में अभिमान के साथ सुरक्षित रहना है यह आप पर ही निर्भर होगा ।

श्रीकृष्ण कह गए (गीता अ ६ , श्लोक ५ )
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् | आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन: ॥
अर्थ अवश्य ढूंढिएगा । उसपर मनन और कृति भी कीजिएगा ।

मोदी जी जब तक हैं, उनको सपोर्ट करने के अलावा कोई विकल्प नहीं दिख रहा है लेकिन आप यह भी जानते हैं कि कोई मनुष्य अमर नहीं होता । मोदी जी के अलावा बीजेपी में एक ऐसा नाम बताएं जो उतना ही विश्वास जगा रहा है ?

वैसे एक बात बता देता हूँ, अगर अपने घर में हम नहीं रहेंगे तो चूहे कीड़े मकोड़े रहेंगे ही । मनुष्यों के रहते ही घर को उनसे मुक्त रखा जा सकता है । अलिंस्की ने एक सलाह दी थी कि नीतियाँ अपने काम की नहीं है तो उन्हें निर्धारण करनेवाली जगहों पर अपने लोग भर दो । वा क ई गिरोह यही करते आया है । नए सिरे से विकल्प खड़ा करने के बजाय Occupy करने के बारे में आप का क्या खयाल है ?

कुछ कहना है तो कृपया कृतियोग्य बात रखिएगा । मीनमेख निकालना मुझे भी आता है । हमारी समस्या यह भी है कि मीनमेख निकालनेवाले ही विद्वान के आविर्भाव में इतराते फिरते हैं । भाई, समाधान बताइये और कृतियोग्य बताइये । इस बात को भूलिएगा नहीं कि हमारे ही पूर्वजोंने सुभाष, सावरकर आदि का आदर तो किया लेकिन साथ गांधी जी का दिया । यही जनता हमारी सेना है और इसे ही पार लगाना है ।

इसे वट का बीज समझिए, कहाँ अपने लिए सही भूमी पाएगा नहीं पता । लेकिन वहन का पुण्य अवश्य लीजिये । और हाँ, हमारे पूर्वज गलत नहीं थे वो पेड़ दादा ने बोया वाली कहावत में।

तस्मादुत्तिष्ठ:!!

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