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अमावस का चंद्रमा

पंडित हेमराज शास्त्री एकटक कुंडली देख रहे थे और सामने सिर झुकाये सरिता और रमेश बैठे थे. कुछ पल बाद शास्त्री जी की गंभीर आवाज कमरे में गूंजी अमावस का चंद्रमा द्वादश दुःस्थान पर शनि के नक्षत्र में बैठा है और राहु उपनक्षत्र स्वामी है इसके सिर पर तो बुरी बलाओं का साया है. सुनकर दोनों पति पत्नी घबराकर कातर निगाहों से शास्त्री जी को ताकने लगे.

रमेश का स्वभाव अजीब था, उसके मन में हर समय कोई ना कोई वहम पलता रहता. हर किसी पर शक करना उसकी आदत में शुमार था खासतौर पर स्त्रियां तो जैसे उसकी दुश्मन थीं. स्त्रियों के प्रति उसके मन में ना जाने कैसी दुर्भावना बसी थी की वह कभी भी उन्हें सम्मान नहीं दे पाता था. इस सबके चलते घर का माहौल हमेशा खराब रहता. मनोचिकित्सक को भी दिखाया लेकिन कुछ फायदा नहीं हुआ. किसी शुभचिंतक से सरिता को शास्त्री जी के बारे में पता चला तो वह उन्हें रमेश की जन्मकुंडली दिखलाने आई थी.

इसकी मां जिंदा है शास्त्री जी ने पूछा. सरिता ने जवाब दिया जी नहीं वह दो वर्ष पूर्व गुजर चुकी हैं लेकिन इनका बर्ताव उनके साथ सही नहीं था. इनकी अपनी मां से कभी नहीं बनी हमेशा उनसे झगड़ते रहते और जली कटी सुनाते. इनकी तरफ से वह बहुत दुःखी रहती थीं.

हूं..... शास्त्री जी एक लंबी सांस लेकर बोले और सास. जी मेरी मां जिन्दा हैं और हमारे साथ ही रहती हैं. मेरा भाई विदेश में रहता है पिता जी गुजर चुके हैं इसलिए कुछ दिन से मां हमारे पास आ गई हैं. अपना घर किराये पर चढ़ा दिया है, आर्थिक रूप से सक्षम हैं लेकिन अकेली होने की वजह से अब हमारे साथ रहती हैं. इनका व्यवहार उनके साथ भी अच्छा नहीं है बिला वजह उन्हें परेशान करते हैं.

शास्त्री जी बोले चंद्रमा बहुत निर्बल है और निर्बल ही नहीं पाप पीड़ित भी. यह भाग्यशाली है जो इसकी सास साथ रहने आ गई. इसे अपनी सास की सेवा करने को बोलो वरना कुछ दिन यही हालत और रही तो यह पागल हो जायेगा.

शास्त्री जी समझाते हुए बोले चंद्रमा मानव जीवन का आधार है. यह मां, जल, मन, औषधि, संतोष और समृद्धि है. बुरी बलाओं का जो मैंने अभी जिक्र किया वह इसके मन पर छाईं तमाम तरह की नकारात्मक भावनाएं हैं जो इसे चैन से नहीं बैठने देती और ना यह दूसरों को चैन लेने देता है.

मां और मां समान स्त्रियों की जितनी सेवा करेगा उतना ही सुख पायेगा. यही इसके जीवन की साधना है. स्त्रियों का सम्मान इसे मानसिक शांति देगा. इसे कुछ दिन शुद्ध चांदी का वर्क खिलाओ और बदन पर चांदी पहनाओ. गंगाजल या बारिश का पानी कांच की रंगहीन शीशी में इसके हाथों से भरवाकर घर में रखो. मोती पिष्टी दूध के साथ टॉनिक की तरह खिलाओ. सरिता ने पूछा कोई विशेष पूजा पाठ. शास्त्री जी ने बताया यह केवल शिवलिंग पर जल अर्पित करे और ध्यान रहे पात्र स्टील का ना हो. उत्तम तो चांदी का पात्र रहेगा पर तांबे का लोटा भी प्रयोग कर सकते हो. जल अर्पण पश्चात शिवलिंग पर चन्दन या गुलाब का दो बूंद इत्र मले इससे शनि और राहु का जहर ख़त्म हो जायेगा. जाओ और तीन महीने बाद मुझे परिणाम सूचित करो.

सरिता और रमेश शास्त्री जी को प्रणाम कर घर की तरफ लपके.

आज रमेश ने रात्रि भोजन अपनी सास की पसंद का बनवाया. उड़द की दाल, बाजरे की रोटी, राई की मिर्च साथ में मक्खन और गुड़. सबने साथ बैठकर भोजन किया और भोजन के बाद देर तक गपशप भी चलती रही. बूढ़ी हैरानी से कभी सरिता को देखती तो कभी रमेश को. उसके मुंह से बारम्बार दोनों के लिए आशीष निकल रहे थे.
सरिता ने आज पहली बार रमेश के चेहरे पर संतोष के भाव देखे.

बाहर काले बादलों की ओट से निकल कर चंद्रमा खुले आकाश में सरपट भागे चले जा रहे थे...


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