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आस्था के प्रतिमान -१३

शास्त्रार्थ परंपरा का विलोपन और समभाव का खिचड़ा

'ब्राह्मणवाद' और 'मनुवाद' की तरह ही इस शब्द #सर्वधर्मसमभाव पर भी पर्याप्त बौद्धिक उत्खनन की परम आवश्यकता है।
मुझे नहीं लगता हमारी संस्कृति के मूल में ऐसा कोई 'कायरतापूर्ण' विचार रहा होगा।

सर्वप्रथम तो हम मानते आए हैं कि धर्म बस धर्म है इसका, उसका, मेरा, तेरा नहीं है। हाँ मत या संप्रदाय कई हैं।

१- पंच देव और चौबीस अवतार तथा यजन द्वारा उनकी विशिष्ट उपासना करनेवाले वेद उपनिषद को मार्गदर्शक मानने वाले वैदिक(आजकल हिंदू)।

२- आत्म तत्व को परमतत्व मानने वाले २४ तीर्थंकरो के जिन् मत के अनुयायी जैन।

३- परमशून्यवादी गौतम बुद्ध के पथानुगामी बौद्ध।

ये मूल मत रहे हैं एक सनातन धर्म के।

और इनमें कभी भी समभाव का खिचड़ा नहीं पका।शास्त्रार्थ होता रहा। एक दूसरे के मत की कमी और अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के बौद्धिक युद्ध होते रहे।

"समभाव की अवधारणा जड़ से ही कुटिल और पलायनवादी है।"

ऐसा समझिये एक शिखर है(धर्म), और उसपर जाने के अनेक पथ हैं(मत)।
अब तलहटी में खड़ा जिज्ञासु किसी अनुभवी से पूछे कि कौन सा पथ श्रेष्ठ है तो अनुभवी उसे अपने मार्ग की श्रेष्ठता बताएगा क्योंकि एक तो उसका वह मार्ग देखा भाला है।
दूसरे उसकी रुचि जिज्ञासु की यात्रा आरंभ कराने में है, बकवास में नहीं।

"यदि वह सारे मार्ग श्रेष्ठ बता दे तो पूरी संभावना है जिज्ञासु चले ही ना।उहापोह में उलझ जाए।"

हमारी परंपरा बहुत उत्कृष्ट रही है किंतु तलवार के जोर पर बात मनवाने वाले जाहिल के अनुयायियों ने जब वैचारिक युद्ध हारने के बाद अपनी पशुता प्रकट की और हम दमन में असमर्थ रहे तो ऐसे नपुंसक शब्दों की ढाल ओढ़कर जान बचाई।

फिर कुटिल अँग्रेज ईसाईयत लाए। ये दो गँवार मत जबरन हम पर थोपे गए तब अपने अस्तित्व मात्र के लिए कहना पड़ा *सर्वधर्मसमभाव* ।

बहुत खेद का विषय है कि आधुनिक काल में #स्वामी_दयानंद_सरस्वती और अभी 40 साल पहले #ओशो_रजनीश के अतिरिक्त हमारे किसी ज्ञानी ने परंपरागत शास्त्रार्थ द्वारा अपना मत दबंगई से रखने और विरोधी के मत की बखिया उधेड़ने का ईश्वरीय साहस नहीं दिखाया।

#स्वामी_विवेकानंद और #रामतीर्थ बहुत आदरणीय हैं।पर इनकी प्रतिभा सामंजस्य बैठाने में ही नष्ट हो गई। यदि इन्हें दीर्घायु प्राप्त होती तो संभावना हो सकती थी।

हमने मूलरूप से अस्तित्व को शिवशक्ति का चिद्विलास माना है। इसलिए क्रीड़ाभाव से जीवन के हर आयाम को देखा है। चिंतन मनन और शास्त्रार्थ भी हमारे योगी संतों के वैचारिक खेल रहे हैं। हम कभी अपने मत जबरन थोपने नहीं गए, अपितु, प्रतिपक्ष के ही मत का प्रबुद्ध विश्लेषण करके उसे सनातन प्रज्ञा से ही उद्भूत प्रमाणित किया। हमारी श्रेष्ठतम बौद्धिक प्रतिभा सतत् सत्य के अनुसंधान में रत रही है। #भा अर्थात् #प्रकाश। #रत अर्थात् संलग्न। #भारत अर्थात् प्रकाश की ओर यात्रा में संलग्न।

और यही कारण रहा कि धर्म के सर्वोच्च शिखर अगर किसी भूमि ने देखे हैं तो वो भारत ही है।

#अज्ञेय


आस्था के प्रतिमान -१४

मनु का सामाजिक मनोविज्ञान

मनु पर आक्षेप लगाना आसान है क्योंकि मनु उत्तर देने को उपस्थित नहीं है।
किंतु सत्य जानकर स्वयं अपने भीतर विद्यमान शिव को निर्णय करने दें।

मनुस्मृति जैसी आज है उसमें जितना आपत्तिजनक हिस्सा है मुस्लिम व ईसाई शासनकाल की देन है।

मनु ने एक पूर्ण मनोवैज्ञानिक सामाजिक संरचना की अवधारणा दी थी।

समय के साथ हम उसके वैज्ञानिक पक्ष से दूर होते गए और विधर्मी सत्ता ने इसे भांप लिया।

एक अत्यधिक मनोवैज्ञानिक ग्रंथ के महत्वपूर्ण हिस्से हटाकर उसमें ऊलजुलूल बकवास डाल दी गई। ब्राह्मणों को खलनायक स्वरूप दिया।क्षत्रियों को अय्याश व वैश्य समाज को लुटेरा।

शूद्र के लिए ऐसे घिनौने नियम जोड़े गए जो वैदिक युग में थे ही नहीं।मेहतर या भंगी मुस्लिम काल की देन है।ये अब छुपा नहीं है।

मनुस्मृति को विकृत करना इसलिये आवश्यक था क्योंकि उसका शुद्ध स्वरूप फिर से शक्तिशाली सनातन समाज को खड़ा कर देता।

आधुनिक मनोविज्ञान के जनक #Sigmund_Freud के शिष्य #Carl_Gustav_Jung ने मनु स्मृति प्रदत्त वर्ण आश्रम व्यवस्था को मनुष्य की आधारभूत मनोवैज्ञानिक संरचना मानते हुए हर युग में उसकी अनिवार्यता को स्वीकार किया है।
पर वर्तमान विकृत स्वरूप में नहीं।उस मौलिक स्वरूप में जिसमें 'रत्नाकर' भील और मछुआरन सत्यवती का पुत्र 'वेदव्यास' महान ऋषि के रूप में समादृत हुए हैं।

*हम चाहें तो लीक तोड़ सकते हैं।१००० वर्षों के अंधकार से मुक्ति की जिद चाहिए.... बस।*

#अज्ञेय

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