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नंदी की पीठ पर देवाधिदेव महादेव नहीं तो क्या यवन सवार होंगे???
सड़कछाप कुतर्कियों और दैत्यों ने बिना किसी लॉजिक के ही इस परंपरा पर ठीक वैसे ही रोक लगाया जैसे शनि सिंगणापुर को मुद्दा बनाकर कुटिलता का प्रदर्शन किया था...!!

"जलिकट्टू" एक ऐसा खेल है जिसमे सांड की पूजा करके उसके सिंग पर सोने के सिक्के और नोट बांध दिए जाते है। बाद में उसे हासिल करना खिलाड़ियो का लक्ष्य होता है। इसमें किसी भी तरह से सांड को कोई नुकसान नहीं होता। न वो घायल होता है और न उसको कोई चोट लगती है। ये खेल है सनातन धर्मावलंबियो की वीरता और साहस का.... ये खेल उन कायरो का नहीं जो निर्बल बकरे को काट डाले....ये खेल है हिंदुत्व के वीरो का जो सांड जैसे शक्तिशाली जीव के जानलेवा सिंगो से सोने के सिक्के हासिल कर उसे छोड़ देते है...

"जलिकट्टू" में किसी तरह की हिंसा पशु के साथ नहीं होती। जलिकट्टू पर प्रतिबन्ध का अर्थ है गौ हत्या को परोक्ष रूप से स्वीकार करना। तमिलनाडु के बाद केरल राज्य आता है जिसमे गाय काटी जाती है। ज्यादा से ज्यादा गौ मांस उद्योग बढ़ाने के लिए जलिकट्टू पर प्रतिबन्ध लगाना चाहते है वामपंथी और हिंदुत्व विरोधी।

जलिकट्टू में सांड वास्तव में नंदी का स्वरुप है जो शिव का वाहन है। वीर नौजवान उस सांड की पीठ पकड़कर उसकी सींग से सिक्के हासिल करने की कोशिश करते है। वैसे ही सांड जैसे बलशाली पशु की पीठ पर महादेव ही सवार हो सकते है या उनका कोई भक्त.... वो लोग नहीं जो बकरे जैसे दुर्बल जानवर की बलि लेकर खुद को ताकतवर कहते है...!!!

जलिकट्टू फिर से शुरू होना चाहिए। ये हमारी परम्परा है।
तथाकथित सड़कछाप दैत्यों को स्मरण रहे हमारी परंपरा से बार बार खिलवाड़ करना विनाश का कारण सिद्व होगा...!!!

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