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ड्रामेबाज़ की चालबाजी का सुंदर नमूना देखिये ।

रानी पद्मिनी – पद्मिनी, ध्यान रहे, पद्मावती नहीं, पद्मिनी ही कहना है – के विषय में डॉ कुमार विश्वास एक कविता सुना रहे हैं । कविता उनकी नहीं, पं. नरेंद्र मिश्र जी की है यह बता भी दे रहे हैं । उसके बाद कविता का बड़े ही प्रभावी ढंग से प्रस्तुतीकरण हो रहा है ।

आप पूछेंगे कि इसमें आपत्तीजनक है ही क्या ? कृपया एक बात समझ लीजिये कि ये आपिये हमेशा सायकोलोजीकल लड़ाई ही लड़ते है, जहां निरा स्यापा लगता है वहाँ भी हेतु होता है कि नजर में रहेगा तो मन मैं रहेगा, भुलाया नहीं जाएगा । आप यही बात को सोचिए, गंभीर खबरें दबा देनेवाले अखबार और चैनल, इनके स्यापे को फ्रंट पेज क्यूँ देते हैं । छपा हुआ शब्द आज भी मायने रखता है बहुतों के लिए, यह वे जानते हैं । बड़ा विषय है, अलग से। यहाँ हम डॉ विश्वास के विडियो की बात करें ।

आप देखेंगे कि शुरुआत में ही वे कह देते हैं कि राजपूतों और राजपुताने के गौरवशाली इतिहास को कोई धक्का नहीं दे सकता, बशर्तें हम अपनी पीढ़ियों को सही इतिहास बताते रहें । फिर पं. नरेंद्र मिश्र जी की कविता का वीर रस पूर्ण प्रस्तुतीकरण कर देते हैं । अब इस पूरे प्रसंग को विश्लेषित करते हैं ।

पहली बात तो यह है कि इनहोने पद्मिनी समर्थकों के साथ अपनी उपस्थिती दर्ज कराई है, भंसाली और उसके सूत्रधारों का कोई विरोध नहीं किया है । नाम भी लेने से बच गए हैं । इसे नोट किया जाये । बस पूरी बात को हल्का कर दिया कि क्या यह भी कोई चिंता का विषय है, ऐसी कोई बात ही नहीं है । याने हम सब बस उस कहानी के खरगोश की तरह है जिसके पीठ पर पत्ता गिरा तो आसमान गिरा, आसमान गिरा कहके चिल्लाने लगा और खुद के साथ सब को भी उकसाने लगा। ऐसा कुछ नहीं है, सो जाइए आराम से, यही अर्थ ध्वनित होता है । हाँ, यह कहना नहीं चूकते कि आनेवाले पीढ़ियों को सही इतिहास हम बताते रहें ।

भाई, आज के तारीख में आनेवाली पीढ़ियों के लिए विडियो (फिल्म) ही इतिहास बन जाएगा, तो क्या उसके बनने के समय सावधानी बरतना आवश्यक नहीं ?

याने शुरू में ही ये मामले को हल्का कर देते हैं और धीरे से डिस्क्लेमर भी छोड़ देते हैं । तुरंत मिश्र जी की कविता को लेकर रंग में आ जाते हैं । आप को क्या याद रहेगा ?

यही, कि चिंता की कोई बात नहीं है, कवि डॉ कुमार विश्वास, बड़े ही विश्वास के साथ आप को विश्वास दिला रहे हैं । दूसरी बात, मिश्र जी की कविता । यह तो आप को ख्याल ही नहीं आया है कि इनहोने कठपुतली संजय भंसाली या उसके सूत्रधारों पर एक शब्द भी नहीं बोला है । ये किसके साथ खड़े हैं यह आप को पता नहीं है । आप के पास तो आए, दो उत्तेजना देते शब्द भी कहे, लेकिन क्या वे आप के हुए ?

Cicero की इस बात को हमेशा ध्यान रखिए - “राष्ट्र का नुकसान मूर्ख और महत्वाकांक्षी भी इतना नहीं कर सकते जितना भीतरघाती कर सकते हैं । सीमा पर खड़ा शत्रु कम दुर्जेय है क्योंकि वो खुलकर अपना झण्डा उठाकर सामने है । लेकिन ये कपटी देशद्रोही देशवासियों के भीतर बेरोकटोक घूमता है, और उसकी शातिर खुसर फुसर और अफवाहें सभी गलियों में घूमती हैं, सरकार के दरबारों में तक सुनी जाती हैं । क्योंकि उसके चेहरे पर तो देशद्रोही लिखा नहीं होता, वो वही भाषबोलता है जो उसके शिकार लोग बोलते हैं । उसका चेहरा उनसे अलग नहीं है और न ही उसके तर्क अलग हैं । और अपने तर्कों से वो मनुष्य के अंदर दबे स्वार्थकों हवा देता है, राष्ट्र की आत्मा को ही सड़ाकर दुर्बल कर देता है । वो गुप्तता से अपना असली काम करता है, व्यवस्था को इस तरह संक्रमित कर देता है कि जब वो सही समय पर चोट करे तो व्यवस्था उसका प्रतिकार करने के योग्य ही नहीं रहती । हत्यारा भी इन के जितना घातक नहीं होता । "

“A nation can survive its fools, and even the ambitious. But it cannot survive treason from within. An enemy at the gates is less formidable, for he is known and carries his banner openly. But the traitor moves among those within the gate freely, his sly whispers rustling through all the alleys, heard in the very halls of government itself. For the traitor appears not a traitor; he speaks in accents familiar to his victims, and he wears their face and their arguments, he appeals to the baseness that lies deep in the hearts of all men. He rots the soul of a nation, he works secretly and unknown in the night to undermine the pillars of the city, he infects the body politic so that it can no longer resist. A murderer is less to fear.”

डॉ कुमार विश्वास का विडियो यह रहा । कुछ कहना है ?


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