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प्राच्यविमुखता का इतिहास -४८

हम बहुत कम मौकों पर किसी वस्तुव्यापार के लिए सही शब्द का प्रयोग कर पाते हैं। कई बार लगता है कि हमसे गलती हो रही है, पर क्या, यह तक समझ में नहीं आता। हम कर रहे हैं वह ठीक नहीं है, इसका बोध होता है, पर यह समझ में नहीं आता कि यदि यह ठीक नहीं है तो ठीक क्या है। इसका एक उदाहरण अपने अनुभव से दूं।

मैंने अपने सबसे पहले और मेरे आज तक के कार्यों में सबसे महत्वपूर्ण और बाद के कार्यों की जननी कृति को काफी उधेड़ बुन के बाद नाम दिया आर्य-द्रविड़ भाषाओं की मूलभूत एकता । पुस्तक छप गई, सारी प्रतियां बिक गईं, कुछ अशोभन भी घटा, कुछ अकल्पनीय भी मिला, पर मैं इसको पुनर्मुद्रित कराने से बचता रहा। कारण यह कि मुझे लगता रहा कि इस पुस्तक के लिए यह शीर्षक ही गलत है। मैं सही हूं, परन्तु यह हमारे पाठक या श्रोता तक एक भिन्न आशय के साथ ग्रहण किया जा सकता है। इससे उस सिद्धांत को बल मिलता है जिसका पुस्तक में खंडन किया गया है। संदेश यह जाता है कि मूलतः कोई एक भाषा थी जिससे आर्य और द्रविड़ परिवारों में गिनी जाने वाली भाषाएं निकली हैं।

पुस्तक में यह प्रतिपादित था कि भारत में असंख्य बोलियां थी, जिनमें लंबें संपर्क के कारण कतिपय ध्वनिगत साझेदारियां और स्वीकार्यतायें थी और इनके समन्वय से एक उन्नत भाषा पैदा हुई, जो मेरा आशय न था।

मैं मानता था, क्षमा करें, मैं समझता था कि भारत में असंख्य बोलियां चलन में थी। मानता यह था कि लंबे सामाजिक संपर्क के कारण उनकी भिन्नताएं कम हो गई थीं। उनकी साझी ध्वनिमाला बन गई थी। इस सीमा में ही याजिकीय प्रयोजन से एक बोली के बर्चस्व के कारण उसे व्यापक मान्यता मिली और उसमें कर्मकांड के कारण उन्हीं घोष ध्वनियों का अधिक जोर से, या महाप्राणित, उच्चारण करने के कारण सघोष महाप्राण ध्वनियां पैदा हुईं।

मेरे इस भ्रम का निवारण करने वाला कोई नहीं था कि नई ध्वनियां, या किसी भिन्न भाषा की ध्वनियां जब हम ग्रहण करते है तो उनके अनुरूप बनने के लिए हमारी अपनी ध्वनिमाला में क्या परिवर्तन होते हैं जिसमे कुछ नई ध्वनियों को हम सुन और समझ सकते है, पर बोलें तो अनर्थ हो जाता है। यह बात रामविलास जी को पढ़ने के बाद समझ पाया कि ध्वनियों का परिवर्तन सम्भव तो था परंतु इतना आसान नहीं था।

खैर, सही शब्द या अभिव्यक्ति क्या हो सकती है इसे समझने में बीस साल लग गए और उसी पुस्तक को जब कुछ अदल बदल के साथ प्रकाशित कराया तो जो शीर्षक रखा उससे भी सन्तुष्ट नहीं हूं, पर यह मानता हूं कि यह पहले से अच्छा है।

जो हम सोचते है या कहना चाहते हैं पर सोच भी नहीं पाते, क्योंकि सोचना भी भाषा के माध्यम से ही होता है, कह पाना, दूसरों तक इस तरह पहुंचा पाना कितना कठिन है, इसे वाचाल लोग जानते नहीं, चुप्पे अपनी वाणी तलाशते ही हार मान जाते हैं।

ठीक यही स्थिति हमारी इस लेखमाला के साथ भी रही। मैंने इसे नाम दिया, ‘हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास’, परन्तु आप ने भी पाया होगा कि हमारे विवेचन में सभी स्तरों और रूपों में यह घृणा नहीं रहती, प्रेम तो हो ही नहीं सकती, विरक्ति इसके मूल में है ।इसमें घृणा के भी दौर हैं, विरक्ति उसे संभाल नहीं सकती; हिन्दुत्व भारतीयता को संभालना चाहे भी तो संभाल नहीं सकता; एक भौगोलिक सत्ता के रूप में भारत की पहचान पूरे भारत देश के लिए कभी थी भी नहीं, आज भी नहीं है, प्राच्य अधिक समावेषी है, पर इसमें अतिव्याप्ति भी है जब कि इतिहास में जब से भारत से पश्चिम का परिचय हुआ, प्राच्य का प्रयोग भारत के लिए, उससे पहले ईरान के लिए और उससे भी पहले अनातोलिया या आधुनिक तुर्की पर अपना दबदबा जमाए भारतीयों के लिए होता था।

साड़ी के रंग और डिजाइन का चुनाव करती महिलाओं के यह-या-वह या-वह या यदि गांठ साथ दे तो सभी के चुनाव जैसा ही है एक जटिल ऐतिहासिक विकास के लिए सटीक शब्द चुन पाना। फिर भी मुझे लगा यदि इसे प्राच्यविमुखता का इतिहास कहें तो दूसरे सभी नामों से यह अधिक सटीक होगा।

अतः आज इस शीर्षक को अपने अब तक के लेखों के लिए भी व्यवहार्य मानते हुए आगे इसी का प्रयोग उचित समझता हूं। पहले के लेखों को इसमे समाहित करते हुए इसे आज के शीर्षक के क्रमांक में शामिल करते हुए इसकी संख्या लिखी है।

परन्तु इस प्राच्य में सन्दर्भभेद और कालभेद से एशियाटिक, प्राच्य, हिन्दुत्व, सनातनता, भारतीयता सभी समाहित हैं। अर्थात् अतिव्याप्ति और अव्याप्ति के सभी संकट जिससे प्रकट हो कि नाम ग्राह्य होते हुए भी सटीक नहीं है, एक समझौता है।

अपने आए दिन के व्यवहार में हम अपनी बात सटीक रूप में नहीं कह पाते, कामचलाऊ रूप में ही कह पाते हैं। मेरा सारा लेखन कामचलाऊ ही है। कुछ भी पूर्ण नहीं, अन्यथा उन्हीं सवालों पर बार बार विचार क्यों होता रहता। समझ की पूर्णता समझ की मौत है। आगे कुछ नहीं बचता, सिवाय अनुपालन के, और ठीक यही तब होता है जब हम किसी विचार या विचारधारा को पूर्ण या अनालोच्य मान कर उस पर सन्देह करने वालों को मिटाने के लिए तैयार हो जाते हैं।

साम्यवाद ने विचार का अन्त कर दिया, विचार ने साम्यवाद का अन्त कर दिया। जरूरी दोनों हैं और इसलिए अपूर्णता से अपूर्णता के उच्चतर शिखरों की ओर बढ़ना ही उन्नति और प्रगति है और शिथिलता अवगति या खाई में पतन।

अब हम अपनी बात उस बिन्दु से आरंभ कर सकते हैं जहां हमने इसे छोड़ा था।

मैकाले राममोहन राय से मिल तो नहीं सके थे परन्तु लगता है उन पर राय द्वारा उठाए गए सुझावों का गहरा प्रभाव पड़ा था। पार्लमेंट में दिए गए उनके व्याख्यान और उनके द्वारा उच्च शिक्षा के लिए अपनाए जाने वाले माध्यम के बारे में सुझाए गए प्रस्तावों के विषय में हम पहले बात कर आए है, परन्तु उसकी भाषानीति के पीछे ईसाइयत के प्रचार का भी लक्ष्य था, यह कुछ बाद में नजर आया।

यह प्रस्ताव बहुतों को बहुत कुटिलतापूर्ण लग सकता है, मुझे इससे झटका तो लगा पर इसके पीछे कोई कुटिलता नजर नहीं आई। सचाई यह है कि हिन्दू समाज में कतिपय ऐसी कुरीतियां प्रचलित थी जिनकी कल्पना करके भी सिहरन पैदा होती है और इनके प्रचलन के कारण हिन्दू समाज अपनी संवेदन शक्ति तक खो चुका था।

मैं कुछ बातें विभिन्न सन्दर्भो में कई तरह से दुहराता आया हूं। दुहराने के बाद भी मेरे ऐसे पाठक भी उन्हें समझ पाये हैं, उनकी चेतना में परिवर्तन हो पाया है ऐसा लगता नहीं। कारण, मेरे ऐसे पाठक भी, जो मुझे नियमित पढ़ते हैं, उनकी प्रतिक्रियाएं कुछ सवालों पर मेरी अपेक्षा से भिन्न होतीं। मुझे इससे निराशा नहीं होती। जानता हूं कितना कठिन है चेतना के रूप को बदलना। जानता हूं कि त्वचा में लगातार रगड़ खाने से ही घट्ठे नहीं पड़ते, किन्हीं कुरीतियों के लगातार चलते रहने से उनके विषय में जो निर्वेदता या संवेदनहीनता पैदा होती है उसके चलते दिमाग में भी घट्ठे पड़ जाते हैं। हो सकता है आप में से कुछ को घट्ठा का अर्थ भी पता न हो। यह भोजपुरी का शब्द है और अनुमानत इसका अर्थ है लगातार घिसते रहने, या घर्षण होते रहने से पड़ी गांठ है, जिसमें हमारी जीवन्त कोशिकाओं तक पहुंचने वाला रक्तसंचार क्षीण होते होते बन्द, संवेदी तन्तु मन्द होते होते बन्द हो जाते हैं और अब उनसे बनी गांठ हमें घर्षण की वेदना से बचाती है, पर उसका दबाब उससे ठीक नीचे के ऊतकों को अनुभव तो होता है परन्तु धीरे धीरे वे भी मरने लगते हैं और गांठ का हिस्सा बन जाते हैं और गाँठ बढ़ जाने पर स्वयं पीड़ा देने लगती है ।

ठीक ऐसा ही मानसिक संचार प्रणाली के साथ होता है। न्यूजपेपर का अर्थ तो जानते होंगे। न्यूज का अर्थ है जैसा पहले न सुना था न जाना था और वह पहली बार दिखाई दिया तो दुनिया को बताना था। कल मैं आपको यह समझाने का प्रयत्न करूंगा कि ईसाइयत से टकराव से हमारा कितना लाभ हुआ और फिर यह कि ईसाइयत के जाल से हम किनके शिकार हो रहे है। इसी में यह भी प्रकट होगा कि हिन्दुत्व क्या है, प्राच्य मनीषा क्या है और क्यों वे जो इसे नष्ट करके कहीं से कुछ पाना चाहते हैं वे नादान हैं, और क्यों जो इसे बचाने की चिन्ता में, जो नवजीवन के लिए ग्राह्य है, उसे ग्रहण करने से कतराने और जो हैं वहीं बने रहने के लिए आग्रही जन जड़प्राय है।

परन्तु याद यह भी दिला दें कि यहां से प्राच्यविमुखता भारतविमुखता बनती हुई हिन्दुत्वविमुखता या हिन्दुत्व के प्रति घृणा का रूप कैसे लेती है कि जिन अवधारणाओ, क्रियाओं, कालों, परिघटनाओं के साथ हिन्दूशब्द के जुड़ने की संभावना तक हो उनसे हम विरक्त ही नहीं हो जाते, उन्हें मिटाने तक को कटिबद्ध हो जाते हैं।

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