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बस्ती की गंगा कही जाने वाली पौराणिक महत्व वाली कुआनो नदी को खत्म करने का सुनियोजित षडयंत्र चल रहा है। गो गंगा गायत्री की बात करने वाले भाजपा कार्यकर्ताओं से लेकर जिला प्रशासन, नगर पालिका तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं का मौन हतप्रभ करने वाला है। चित्रांश क्लब, हिन्दू युवा वाहिनी समेत कई संगठनों ने कुआनो बचाओ आन्दोलन के जरिये नदी को प्रदूषण मुक्त कराने की लम्बी लड़ाई लड़ी। नतीजा शून्य रहा। 

हालांकि आन्दोलन से नदी के प्रति जनभावनायें जुड़ी, जिसका परिणाम हुआ कि अमहट घाट पर भव्य कुआनो आरती जैसे सफल आयोजन होने लगे। अभी हाल ही में नगरपालिका के प्रस्ताव पर पूर्व की सरकार द्वारा करीब सात करोड़ का प्रस्ताव स्वीकृत किया गया। इस धनराशि से कुआनो नदी के अमहट घाट का सुदरीकरण कराया जा रहा है। घाट पर बनी पुरानी सीढ़ियों को तोड़कर नदी में काफी अंदर तक घुसकर स्थायी निर्माण करवाया गया है। करीब करीब आधी नदी को मिट्टी से पाटकर अविरल बहती जलधारा को अवरूद्ध किया जा रहा है। पूछने पर जिम्मेदार यह बताते हैं अमहट घाट का सुंदरीकरण हो रहा है जबकि जानकार बताते हैं कि बजट मुक्तिघाट के निर्माण के लिये आया है।

फिलहाल ये जांच का विषय है लेकिन यह सच है कि नगरपालिका, जिला प्रशासन और ठेकेदार की आपसी मिलीभगत से नदी को नाले में तब्दील किया जा रहा है। इतना ही नही कुआनो नदी को प्रदूषण मुक्त कराने के लिये ठोस कदम उठाये जाने की बजाय शहर के गंदा नाले को अमहट घाट पर जोड़ने की कवायद तेज हो गयी है। नदी की सीढ़ियों पर जहां लोग विभिन्न आयोजनों में स्नान ध्यान, पूजा पाठ और आरती किया करते हैं ठीक उसी के बगल में गंदे नाले को जोड़ा जा रहा है। अब गंदे नाले से निकले शहर के बदबूदार पानी से लोग आचमन करने को विवश होंगे, यहां विभिन्न अवसरों पर स्नान करने की पंरपरा है, गंदे नाले का मुंह स्नान की सीढ़ियों के ठीक बगल में जुड़ने का परिणाम आसानी से समझा जा सकता है। यही नाला आगे ले जाकर धोबी घाट के निकट खोला जा सकता था। स्नान की सीढ़ियों के पास नाले का पानी गिराने का औचित्य किसी के समझ में नही आ रहा है। पूरी योजना कमीशनखोरी की भेंट चढ़ रही है। घाट पर कराया जा रहा घटिया निर्माण कमीशनखोरी को दर्शाने के लिये काफी है।

कुछ लोग यह भी बता रहे हैं कि टूटे हुये अमहट पुल की मरम्मत नही होगी, या नया पुल नही बनवाया जायेगा बल्कि नदी में पाइप डालकर ऊपर मिट्टी आदि डालकर अस्थायी आवागमन चालू करा दिया जायेगा। ऐसा हुआ तो जो कुछ बची खुची कुआनो नदी है वह भी खत्म हो जायेगा। इतना ही नही निर्माण के नाम पर अनेकों हरे पड़ काट दिये गये। किसी सामाजिक कार्यकर्ता के मुह से आवाज नही निकली। ठेकेदार की मनमानी के चलते पुल टूट गया। प्रशासन इसके बावजूद सावधान नही हुआ। पुल के निर्माण को लेकर आन्दोलित संगठनों के लोग भी मौन साध लिये हैं। जो लोग कुआनो के प्रदूषण को लेकर धरना प्रदर्शन करते थे, जल सत्याग्रह करते थे उनकी संवेदनायें मर गयी हैं। यही स्थिति रही तो कुआनो नदी का बचाना मुश्किल होगा। 

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