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हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास - 47
(स्वतन्त्रता संग्राम की आधारशिला )

उन्नीसवीं शताब्दी सही अर्थ में भारतीय इतिहास का संक्रान्तिकाल है। आत्ममंथन के जितने रूप और स्तर इस शताब्दी में दिखाई देते हैं, जिस तरह का प्रबोधन इस शताब्दी में देखने में आता है, वह हलचलभरी बीसवीं शताब्दी में नहीं मिलता और इक्कीसवीं शताब्दी में तो लगता है हम अपने ह्रास काल से गुजर रहे हैं। संभवतः एक कारण यह हो कि उपनिवेशवादी दौर अधिक डरावना प्रतीत होते हुए भी नवउपनिवेशवादी दौर से कम खतरनाक और अधिक उत्तरदायी था। यदि कोई इसका उपहास करे तो हंसी में मैं भी शमिल हो जाऊंगा।

यह मजेदार बात है कि प्रबोधन के सभी रूपों का समारंभ अंग्रेजों ने किया। दूसरों की जहां उपस्थिति थी वहां भी उनकी प्रगतिशील भूमिका दिखाई नहीं देती। दूसरों से मेरा तात्यपर्य यूरोप की दूसरी प्रतिस्पर्धी ताकतों से है. विचारों की अभिव्यक्ति, राज की आलोचना और पत्रकारिता की भूमिका, जैसा हम देख आए है, कैलकटा गैजेटियर से आरंभ हुआ और प्रेस पर प्रतिबन्ध भी इसलिए लगाया गया कि इसमें सरकार की ऐसी आलोचना होती थी जिसका लाभ फ्रांसीसियों को मिल सकता था। जैसे यह तथ्य, जिसे उपनिवेशवादी अंग्रेज भी स्वीकार करते थे कि उस दौर में भारतीय जनता से उनका संबन्ध अंग्रेजों की तुलना में अधिक आत्मीय था। इसका प्रचार उनकी तुलना में कंपनी के अधिकारियों की क्रूरता और अहंकार दोनों को उजागर करता था और इसलिए प्रेस ऐक्ट का प्रावधान भी पहली बार उनके समाचारपत्रों पर ही लगा था।

भारतीयों में सबसे पहले राजा राममोहन राय ने पत्रकारिता आरंभ की। उनका उद्देश्य हिन्दू मुसलिम दोनों समुदायों में जागृति पैदा करना था और इसलिए उन्होंने फारसी में भी एक पत्र निकाला। प्रेस ऐक्ट का विरोध करने वालों में भी वह पहले थे। मैं उनकी ज्ञानपिपासा, क्रान्तदर्शिता और वैचारिक दृढ़ता पर चकित रह जाता हूं। इतनी भाषाओं का इतना आधिकारिक ज्ञान जिनमें वह लिख सकते थे और अपनी आकांक्षा और उसकी परिणति को देख कर अवाक् रह जाता हूं। परन्तु सबसे विस्मित करने वाली बात है वैचारिक मतभेद के कारण अपने पिता से भी संबन्ध तोड़ लेना।

एक दूसरा अभियान जो चार्ल्स ग्रांट ने चलाया था जिनका व्यक्तित्व हमारे लिए इतना जटिल और पाश्चात्य अध्येताओं के लिए इतना सुथरा है कि न हम उनका सही मूल्यांकन कर सकते हैं, न वे।

उन्हें हिन्दुओं की सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक अवस्था बहुत दयनीय लगती थी, पर इसके लिए कंपनी स्वयं किसी से अधिक जिम्मेदार थी यह उनकी समझ में नहीं आ सकता था। उनका आग्रह था कि सरकार को सभी दृष्टियों से उनके उत्थान का प्रयास करना चाहिए। पाश्चात्य अध्येता इसे पढ़ते हुए अभिभूत हो जाएगा और उन्हें लोकापकारी या फिलोन्थ्राफिस्ट म्रान बैठेगा, उसे इसके पीछे की चाल दिखाई न देगी। उन्हीं वाक्यों को पढ़ते हुए मैं सोचता हूं, वह हर मामले में हिन्दुओं का जिक्र क्यों करते हैं?, क्या उन्हें सभी मुसलमानों की स्थिति सभी मामलों में संतोषजनक लग रही थी? या यह कि भूराजस्व के पूराने तरीके को बदल कर जिसमें जमीन पर भूस्वामी का अधिकार था, जिसे लगान के रूप् में एक निश्चित भाग देना पड़ता था यह क्यों मानते थे कि जमीन की मालिक कंपनी है और वह अपनी मर्जी के अनुसार किसान या जमीदार जो भी अधिक लगान देने को तैयार हो उसे देती रह सकती है। उनका मूल्यांकन निम्न रूप में करना गलत न होगाः

1. वह साम्राज्यवादी थे और कंपनी के अपने अपदोहन को कम करने या दूर करने का कोई ठोस कार्यक्रम उसके पास नहीं था।
2. वह मानते थे कि सामाजिक विभेद सबसे शिलीभूत रूप में हिन्दू समाज की वर्णव्यवस्था में है पर यह भी मानते कि वर्णविभाजन की प्रकृति और क्रियाशीलता समाज या धर्म से नहीं, अपितु मनोबाधाओं से जुड़ी है क्योंकि धर्मान्तरित ईसाइयों में भी यह बनी रह गयी है।
3. ग्रांट मानते थे कि यदि हिन्दू ईसाई हो जायं तो वे ब्रिटिश सत्ता के प्रति भक्तिभाव रखेंगे, और इससे इसकी जड़ें मजबूत होंगी जब कि दूसरे यह अंदेशा जगाते थे कि यदि ईसाई हो गए तो यूरोप का ज्ञान भी प्राप्त करेंगे और कभी अमरीकियों की तरह विद्रोह भी कर बैठेंगे।
4. वह जरठ नस्लवादी थे इसलिए मानते थे कि अमरीकियों में स्वतन्त्रता की चेतना आई इसलिए कि वे यूरोपीय है, जब कि हिन्दुओं की प्रकृति उनसे भिन्न है।
5. परन्तु उनका साहसिक प्रस्ताव था कि मान लें यह अन्देशा सही हो तो भी शासन को खतरा उठाना चाहिए क्योंकि यह उसके लिए श्लाघ्य नहीं है कि वह अपनी प्रजा को अधोगति में रहने दे और और उससे उदासीन बनी रहे।
6. उसे यह अन्देशा था कि जो वर्तमान राजस्व व्यवस्था है उसमें जमींदार इतने प्रभावशाली हो सकते हैं किवे पश्चिमी ज्ञान और संस्थाओं से परिचित होने के बाद कुहराम मचाना आरंभ कर दें जिसका सीधा तरीका यह है कि उन्हें कुछ और अधिकार दे दो, इससे वे ईसाई बन जाएंगे जिसका अर्थ है स्वामिभक्त और आज्ञाकारी बन जाएंगे।

जिन सवालों पर इतिहास अपना फैसला दे चुका हो उनके औचित्य पर विचार करने का कोई लाभ नहीं, परन्तु यह याद रखना जरूरी है कि उसी वस्तुस्थिति में कितने तरह के उधेड़बुन चल रहे थे और कौन सही सिद्ध हुआ।

राजा राममोहन राय और चाल्र्स ग्रांट दोनों अंग्रेजी शिक्षा के समर्थक थे जब कि कंपनी इस विषय में आशंकित थी। राममोहन राय इसलिए संस्कृत और अंग्रेजी के बीच अंग्रेजी से समर्थक थे कि इससे आधुनिक ज्ञान विज्ञान तक पहुंच हो सकती है, शिक्षा का प्रसार व्यापक हो सकता है, और इससे सरकार के कील कांटों की अच्छी समझ हो सकती है! जब कि संस्कृत से रूढ़िवादिता और अंधविश्वास को बल मिलेगा और समाज दो हजार साल पीछे चला जाएगा और शिक्षा केवल ब्राह्मणों तक सिमटी रहेगी।

ग्रांट का विश्वास था कि अंग्रेजी सीखने के बाद लोग पश्चिमी मूल्यों और मानों को अपनाने के बाद ईसाई धर्म भी अपना लेंगे। यदि संस्कृत में शिक्षा जारी रही तो ब्राह्मणों और उनके प्रभाव के कारण शेष हिन्दुओं में सद्धर्ध का प्रसार नहीं हो सकेगा। अंग्रेजी से ईसाइयत का प्रसार होगा यह विश्वास मैकाले की चेतना में भी था। वास्तव में अंग्रेजी को उच्च शिक्षा की भाषा के रूप में स्वीकार किए जाने और अंग्रेजी शिक्षा के लिए स्कूल खोलने के अभियान के और उसके तात्कालिक और संभावित परिणाम के विषय में उसने अपने एक पत्र मे लिखा थाः
O ur English schools are flourishing wonderfully. We find it difficult, - indeed, in some places impossible, - to provide instruction for all who want it. At the single town of Hoogly fourteen hundred boys are learning English. The effect t of this education on the Hindoos is prodigious. No Hindoo, who has received an English education, ever remains sincerely attached to his religion. Some continue to profess it as matter of policy; but many profess themselves pure Deists, and some embrace Christianity. It is my firm belief that, if our plans of education are followed up , there will be no idolater among the respectable classes in Bengal thirty years hence.

यदि ईसाइयत का प्रचार शालीन तरीके से वैचारिक आधार पर होता तो राममोहन राय को इसके विषय में कोई आपत्ति न होती। यदि इसके कारण कुछ लोग धर्मपरिवर्तन करते तो वह भी उनको क्षोभकर नहीं लगता। 1913 के चार्टर में चाल्र्स ग्रांट के उस पत्र पर लंबी बहस चली थी जिसे उन्होंने 1793 में लिखा और 1797 में बोर्ड आफ डाइरेक्टर्स को सौंपा था पर जिसकी ओर उस विरोध के कारण ध्यान नहीं दिया गया था परन्तु इस अवधि में वह स्वयं पार्लमेंट के सदस्य बन चुके थे, बोर्ड आॅफ डाइरेक्टर्स के सदस्य बन चुके थे, 1797 तक जो आशंकाएं थीं क्षीण पड़ चुकी थीं इसलिए भारत में धर्म प्रचार की खुली छूट दे दी गई और जैसा कि एक मत था कि परमात्मा ने इतने बड़े साम्राज्य पर कंपनी का अधिकार दिया ही इसलिए है कि वह शक्ति का प्रयोग करके भी लोगों का धर्मान्तरण कर सके।

अब ईसाइयत के प्रचार में जिस तरह की उदंडता के नमूने मिलने लगे - हिन्दू देवों के लिए अपशब्द, मूर्तिपूजकों की भर्त्सना करते हुए गर्हित भाषा का प्रयोग, वह भी रास्ता रोक कर जो अपमानजनक भी था, मूर्खतापूर्ण भी, और खतरनाक भी ।

राममोहन राय ने इसके कारण अपने पत्रों में ईसाइयत की जड़ों पर प्रहार करना आरंभ किया, परन्तु जहां तक हिन्दू समाज की विकृतियों को दूर करने का प्रश्न था, उसमें सरकार के हस्तक्षेप करने के अधिकार का प्रयोग करते हुए सती प्रथा को बन्द तो कराया ही, उससे उत्पन्न दूसरी समस्या विधवा विवाह का भी समर्थन किया।

सांस्कृतिक आक्रमण क्षेत्रीय आक्रामण से अधिक उद्विग्नकारी होता है । हिन्दू मूल्यों की रक्षा की चिन्ता से उस सभा का संचालन 1728 में अपने जीवन के अन्तिम दिनों में आरंभ किया जिसका आगे चल कर ब्रह्मसमाज नाम पड़ा। हम इस बात पर जोर देना चाहते हैं कि उनका प्रयत्न कोई नया आन्दोलन करने या मतवाद चलाने का नहीं था, उनकी चिन्ता के केन्द्र में था उस मोर्चे पर खड़ा हो कर अपने आदर्शों और मूल्यों की रक्षा करना जिन पर ईसाइयत की ओर से गुंडागर्दी के स्तर के खुराफात हो रहे थे; इसकी जागरूकता पैदा करना और ऐसे जागरूक लोगों की संख्या का विस्तार और अपने रक्षणीय मूल्यों की पहचान अरक्षणीय रीतियों और कर्मकांडों और बाह्याचार से मुक्ति जो सचमुच हिन्दू समाज को अरक्षणीय बनाते थे।

राममोहन राय गए तो दिल्ली के नामचीन बादशाह का वजीफा बढ़ाने की फरियाद ले कर परन्तु पार्लमेंट के सामने उन्होंने जो याचिका प्रस्तुत की उसमें यह बात जोड़ दी कि भारत में किसानों की दशा बहुत खराब है, कर बहुत उत्पीड़नकारी है। इसे कम किया जाना चाहिए। कहें उनकी चिन्ताएं चाल्र्स ग्रांट के करीब दिखाई देंगी, पर वह राजस्व सुधार में कंपनी की आय बढ़ाने के लिए चिन्तित था, राममोहन राय किसानों के अपशोषण से मुक्ति दिलाने को चिन्तित थे।

राममोहन राय यह जानते थे कि अपनी कमाई कम करते हुए कंपनी कोई रियायत नहीं दे सकती, इसलिए उन्होंने प्रस्ताव रखा कि इससे जो घाटा होगा उसे अंग्रेज कलेक्टरों के स्थान पर कम वेतन के हिन्दुस्तानी कलेक्टर रख कर पूरा किया जा सकता है। इस प्रस्ताव पर दुबारा गौर करें, यह प्रशासन में भारतीय भागीदारी का एक तर्कसंगत दावा था। यदि लगे कि अंग्रेज कलेक्टरों का वेतन क्या इतना था कि उसमें कमी लाने से राजस्व का घाटा पूरा हो सकता था, तो यह सोचें कि मैकाले जो शिक्षा विधेयक और प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी के समर्थक के रूप में जाना जाता है, उसका वेतन दस हजार मासिक था जो सालाना एक लाख बीस हजार हुआ और कंपनी का शिक्षा का बजट मात्र एक लाख था। दूसरे इसमे राममोहन राय की कूटनीतिक क्षमता का भी परिचय मिलता है। कोई हिसाब लगा कर कहता, घाटा इतना है और इस नए प्रबंध से केवल इतनी बचत होगी, तो भी यह दलील तो अपनी जगह थी कि जितनी बचा सकते हो बचाओ और उतनी रियायत तो दो।

कांग्रेस की स्थापना हुई थी प्रशासन में अधिकार की मांग को ले कर । यह मांग सबसे पहले राममोहन राय ने उठाई थी। आप कह सकते हैं कांग्रेस का गठन करने वाले सदस्य नहीं, उसकी नींव के पत्थर राममोहन राय हैं। कोई कह सकता है, इससे पहले किसी ने कहा नहीं, कि इसका प्रस्ताव तो चाल्र्स ग्रान्ट ने ही रखा था कि जो जमींदार अपने साधनों के बल पर यूरोपियों के संपर्क में आ कर अंगेजी सीख लेंगे और अधिक अधिकारों के लिए उपद्रव करने लगेंगे, उनको तुष्ट करने का आसान तरीका यह है कि उनको कुछ और अधिकार दे देा, इसकी लालच में वे ईसाई हो जाएंगे और तुम्हारे आज्ञाकारी और शुभचिन्तक बने रहेंगे।

शैक्सपियर का वह वाक्य आपने सुना होगा, दुनिया में कुछ भी नया नहीं है, और इसका भाष्य यह है कि दुनिया में कुछ भी जैसा था वैसा नहीं रहता और इस परिवर्तन के पीछे मनस्वी लोग होते हैं जो घाराओं का प्रवाह बदल देते हैं। जो संकेत, चाल्र्सग्रांट ने ईसाइयत के विस्तार के लिए दिया था, उसे कांग्रेस ने लिया अर्थात् अभिजनों के लिए सुविधाओं की मांग।

राममोहन राय उनसे बहुत आगे थे, पर हो सकता है उनके मन में भी संभ्रान्त जनों का ध्यान रहा हो। परन्तु हम इतना दावे के साथ कह सकते हैं कि चाल्र्सग्रांट के प्रस्ताव में आर्थिक अभिजात था और राममोहन राय के प्रस्ताव में शैक्षिक संभ्रान्त वर्ग ।

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