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"शर आला तो......धाउनि आला काळ
विव्हळला श्रावण बाळ!
हा! आई गे! दीर्घ फोडुनी हाक
तो पडला जाऊनी झोक!"

(अपनी नोक पर मृत्यु लिए तीर से बींधे, श्रवण के मुख से दर्दनाक चीख निकल पड़ी। हा! माता! वह चीखा व धराशायी हो गया!
- श्रवणकुमार की, महाराज दशरथ के हाथों हुई मौत पर, कवि ग.ह. पाटिल की लिखी कविता है यह। दूसरी कक्षा में पढाई जाती थी उस समय।)

मारोती जब भी सस्वर गाता, शिक्षक-वृंद रो देते। उसकी आवाज का लोच व स्वर का दर्द, रुला देता। उसके रहते, मुझे कभी गाने नहीं मिला। घर में दादी को रुला देने पर ही संतोष करना पड़ता मुझे। उसपर मेरे गुस्से का दूसरा कारण था, उसका कक्षा में हमेशा प्रथम आना। गणित उसका प्रिय विषय था। छह-सात अंकों के गुणाकार-भागाकार चुटकियों में कर लेता।

बरसों बाद, मुंशी जी की कहानी, "गुल्ली-डंडा" पढ़ते हुए, मैं कब अपने बचपन में पहुँच गया, पता ही नहीं चला। महाराष्ट्र के एक छोटे से खेड़े, शेंबाळपिंपरी में, पहली से चौथी तक शिक्षा, मराठी माध्यम से पाई थी मैंने। बचपन याद आया तो श्रीमान मारोती जाधव भी याद आ गए।

मारोती एक ग़रीब खेतीहर मजूर माता-पिता का इकलौता पुत्र था। कक्षा के अन्य छात्र भी मेरी ही भांति खार खाया करते उसपर। उससे पंगा लेना, टेढ़ी खीर थी हम सबके लिए। दबंग था वह...

"यार, इस मारोत्या का कुछ करना पड़ेगा....कहीं टिकते ही नहीं हम इसके सामने।"

"क्यों न उसकी गणित की पुस्तक चुरा लें??"

आखिर बालक ही थे सब, तो कुछ ने इसे अंजाम भी दे डाला। शिकायत करने पर सबकी झड़ती ली गई पर किताब मिली नहीं। परीक्षा सर पर थी। यह सब होते हुए भी मारोती जाधव निर्द्वन्द्व थे।

"किताब गुम हुई है। जो मुझे आता है वह थोड़ा ही खोया है?"

ऐसा लगता जैसे धमका रहा हो हमें कि;

"गब्बर, तेरे लिए तो मेरे पैर ही काफी हैं!!"

और सचमुच, वह फिर प्रथम आया। शाला में ही नहीं, पूरे तालुके (तहसील) में प्रथम!!

चौथी के बाद की, मेरी सारी शिक्षा, अकोला से हुई। कुछ बरसों बाद, खेती बेच दी गई और उस गांव से नाता टूट गया मेरा सदा के लिए।

मेरी ससुराल उसी तहसील की है। लगभग पच्चीस वर्षों बाद एक घटना हुई और मारोती जाधव से फिर मुलाकात का सौभाग्य मिला। मेरे निकट के एक रिश्तेदार मुझे अपने खेतों में ले गए एकबार। उनकी खेती बडी शानदार थी। उनके साथ, उनका विश्वासपात्र नौकर भी था जो मुझे हर छोटी-बडी बात का विवरण भी देता चल रहा था।

"मालक, ज्वारीची भाकरी-भरीत आवडते का तुम्हासनी? करायला सांगतो...जेवणाची वेळ होत आली आहे."
(मालिक, ज्वार की रोटी और भरता पसंद हो तो बनवाने को कहे देता हूँ....भोजन का समय हो रहा है।)

हम तीनों साथ ही बैठे भोजन के लिए। थोड़ा सुस्ता लेने के पश्चात फिर निकल पडे खेतों में। शाम होते होते थककर चूर हो गया था मैं। एक पेड़ के नीचे दरी बिछा दी गई। मेरे संबंधी बोल रहे थे;

"अपना गडी (नौकर) गाना अच्छा गाता है। सुनेंगे..."

उसने गीत शुरू किया और मैं अकबकाकर उठ बैठा। यह तो निश्चित मारोती है। अब मुझे याद आ रहा था कि सभी उसे उसके नाम, मारोती से ही संबोधित कर रहे थे। उसे गाते सुन मुझे आज समझ आ रहा था कि शिक्षक क्यों रो पड़ते थे। मैं अपनी डबडबाई आंखों को, औरों की नज़रों से बचाकर पोंछ ले रहा था।

मालिक के थोड़ा इधर-उधर होते ही मैंने पूछ लिया उससे;

"तू मारोती जाधव न रे पिंप्री चा? मला ओळखलं का रे??"
(तुम मारोती जाधव हो न? मुझे पहचाना??)

"बिलकुल पहचाना!! तुम्हें देखते ही पहचान लिया था मैंने। मालिक ने पहले ही बता रखा था कि अकोला से दामाद आ रहे हैं। कैसे हो? मालक कह रहे थे बैंक मैनेजर हो.."

"वो सब छोड़....तेरे जैसे होशियार विद्यार्थी को मजूरी क्यों करनी पड रही है?"

उसने जो बताया, दुखद था। चौथी के दो वर्ष पश्चात पिता के गुजर जाने पर, मजूरी के सिवा कोई अन्य रास्ता न था, अपना व अपनी अंधी माँ का पेट पालने का। यह सब बताते हुए माथे पर कोई शिकन न थी उसके। जैसे कोई रोचक कथा सुना रहा हो! और आखिर में जब उसने कहा;

"भले पढ-लिख नहीं पाया....तो क्या? मेरा शरीर, मेरे मजबूत हाथ और अथक परिश्रम का जज्बा तो था न मेरे पास!!"

अबकी बार वह जिंदगी को धमकाता सा लग रहा था;

"गब्बर, साँप को हाथों से नहीं....पैरों से कुचला जाता है! तेरे लिए तो मेरे पैर ही काफी हैं!!!"


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