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4. " बेनकाब सब हुये ,मिट गई काली माया ।"
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" माया ' 'अमता' 'हेजरी ' ,'आउल' हैं विक्षिप्त ।
काले धन के खेल में , रहे सदा जो लिप्त ।।
रहे सदा जो लिप्त , आमजन के शोषण में ।
लगे रहे दिन रात ,सिर्फ अपने पोषण में ।।
लगा ' मोदियाघात ': , जिसे वह है चिल्लाया ।
बेनकाब सब हुये , मिट गई 'काली माया ।।"


विशेष ...
' माया '....अनेकार्थक ,लक्ष्मी, धन सम्पत्ति , ऐसा रहस्य
अथवा व्यक्ति जिसको सामान्यता सामान्य
जन जन की समझ के परे हो , प्रायः नाकारा
त्मक अर्थ में प्रयुक्त होता आया है । जैसे....
" माया महाठगिन हम जानी "
........कबीरदास
'अमता '...मत से मता ,मत का स्त्रीलिंग ,बुद्धि ,अमता का
दुर्बुद्धि अथवा उलटी खोपड़ी वाली औरत ।
जो काले को सफ़ेद और सफ़ेद को काला
घोषित करे ,अर्द्धविक्षिप्त ।
'हेजरी '....हिजड़ा ,निरर्थक बकवास करने वाला ,लबा र,
अविश्वसनीय
'आउल '...उल्लू ,मूर्ख
' मोदियाघात '... एक अत्याधुनिक घातक रोग ,जो प्रधान
मंत्री मोदी की 5 सौ और एक हजार के नोटों
को बन्द करने की घोषणा से उत्पन्न हुआ
और मात्र कुछ
घण्टो में ही समस्त काले धंधेबाजों को
को अपने लपेटे में ले लिया । इसका प्रभाव
भारत के साथ ही पाकिस्तान ,बंगला देश ,
नेपाल तक हो गया ।इसके बैक्टीरिया ने
नेता ,अधिकारी ,बड़े व्यापारी पर ज्यादा
घातक हमला किया । पीड़ित लोग लगातार
मोदी को गालियां देते हुये चिल्ला रहे हैं ।
' काली माया '...काली कमाई ,ब्लैक मनी


5. गद्दारों ने पैदा कर दी ,भूषण बनने की लाचारी !
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सुन कर भी 'हुंकार' मित्र हम ,'रसवन्ती' में रमते आये ।
राजनीति ज्योतिष् दर्शन की , चर्चा में भी जमते आये।।
किन्तु देश की दशा देख अब ,'फीके'लगने लगे 'विहारी' !
गद्दारों ने पैदा कर दी , 'भूषण' बनने की लाचारी ।।
रागछोड़ अब आग उगलने ,को आतुर लेखनी हमारी ।
दुष्ट दलों की माया न्यारी ।।


विशेष ..'.हुंकार '...द्वि अर्थक , आजादी के पहले 'दिनकर 'जी
की वीर रस की रचना ,जो अंग्रेज सरकार द्वारा जब्त
कर ली गई थी ।
और ...,
राष्ट्र् समाज की पीड़ा से उद्वेलित विद्रोह का भाव ।
'रसवन्ती' ...'दिनकर 'जी की उसी समय प्रकाशित श्रृंगार
रस की रचना ।
और ,
प्रेम और श्रृंगार की भाव धारा में बहते रहना ।
'फीके '... नीरस , रसहीन ।
' विहारी' ... हिन्दी साहित्य के इतिहास में रीति काल के
श्रृंगार रस के सर्वाधिक प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित
कवि ।
'भूषण '... रीति काल के घोर विलासिता और श्रंगार
रस में डूबे कवियों के मध्य वीर रस ,विद्रोह
के कवि ।


6. ''रे 'निद्रित' ! 'प्रहरी 'जाग जाग !!"
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दिख रही प्रज्ज्वलित यत्र तत्र ,सर्वत्र आज आग ही आग ।
रे निद्रित प्रहरी जाग जाग !!
आतंकी जल्लादों से जो ,किये गुप्त गठजोड़ रहे ।
छद्म रहनुमा अय्याशों के , सपनों के हैं महल ढहे ।।
कुटिल कुकर्मों से जनता को ,रहे चूसते बने जोंक हैं ।
मोदी के विरुद्ध वे ही सब ,बढ़ चढ़ करते नोंक झोंक हैं।।
'अमरत्व ' बाँटने का दावा ,कर रहे बिषैले कुटिल नाग ।
रे निद्रित प्रहरी जाग जाग !!
धरती से 'अम्बर 'तक छाया ,सभी ओर बस धुआँ धुआँ है ।
हाथ पसारे नहीं सूझता ,खाईं खन्दक कहाँ कुआँ है ।
'सूर्य चन्द्रमा ' लुप्त हो रहे, रह रह 'धूमकेतु ' ही दीखें ।
करुण सिसकियाँ पड़ें सुनाई ,बेहद 'हृदय विदारक' चीखें ।।
चिल्लाहट चीख पुकारों में ,कैसी समाधि !कैसा विराग!
रे निद्रित प्रहरी जाग जाग !!

विशेष ........
निद्रित ... प्रसुप्त ,सोया हुआ ।
प्रहरी .... रक्षक ,द्वारपाल ,यहाँ लाक्षणिक अर्थ अर्थात्
सरलार्थ भारत की 'सामूहिक राष्ट्रीय चेतना '
अम्बर ....आकाश , आसमान ।
अमरत्व ... अमरता , न मरने देने का वरदान ।
सूर्य चन्द्रमा ..... प्रतीकात्मक सरलार्थ राष्ट्र् समाज के
के लिये समर्पित निःस्वार्थ देशभक्त महान्
पुरूष और नारियां ।
धूमकेतु ... राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय और आक्रामक
चोर ,लुटेरे ,काले धन्धो के संचालक ,
आतंकवादी ,ज़िहादी ,भारत के शत्रुओं से
साँठगाँठ करके देश के विखण्डन के
अभियान में संलग्न कुलमिलाकर एक शब्द
में ' गद्दार ' ।
हृदय विदारक .....अत्यधिक कारुणिक ,हृदय को चीर
देनेवाली ।



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