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हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास - 11

‘‘अजीब बात करते हो यार । पहले यह तो बताते कि यदि घृणा का यह कारोबार चार पांच हजार साल से या जैसा तुम कहते हो, उससे भी पहले से चला आ रहा है तो इस्लाम को अलग निशाना क्‍यों बनाया । हिन्‍दू हैं ही इसके काबिल । तुम तो
हिन्दुओं के प्रति मुसलमानों की घृणा को या मुसलमानों के प्रति हिन्दुओं की घृणा का राजनीतिक उपयोग करना चाहते हो।’ सोचा संक्रान्ति की शुभकामना देने आया होगा और घर में घुसते और आसन ग्रहण करने से पहले ही उसने हमला कर दिया। जब तक बात दूसरे जनों तक थी वह पढ़ कर चुप रहा पर अब तो बात इस्लाम पर आ गई ! हद है, उसे यह दिन भी देखना था!

मैं हंसने लगा, ‘‘पहले आराम से बैठो तो सही । ठंढ इतनी अधिक है कि यह भी नहीं कह सकता कि ठंढा पानी पीकर अपना दिमाग ठंढा कर लो, चाय का पानी गर्म होने तक अपना दिमाग सन्तुलित करो फिर गर्मजोशी से बातें होगी! तब तक रेवड़ियां खाओ!’’

‘‘अपनी बात मनवाने के लिए रिश्‍वत दे रहे हो’’, उसने हंसते हुए कहा, ‘‘मैं तो पहले ही इसके लिए तैयार हो कर आया था!’’

और कुछ देर बाद चाय की चुस्की के साथ पहल मैंने ही की, ‘‘यदि हम समझना चाहे कि हिन्दुओं के प्रति विदेशियों में पांच हजार साल पहले से चली आ रही घृणा और इस्लामी जुनून में हिन्दुओं के प्रति घृणा में क्या अन्तर है, तो कहना होगा, पहले घृणा करने वाले अपने पिछड़ेपन के बोध से क्षुब्ध थे। उनके पास सांस्कृतिक स्तर पर देने को कुछ नहीं था, भौतिक स्तर पर उनके संसाधनों का दोहन हो रहा था और उसमें उनकी सहायता या सेवा के बदले में कुछ लाभ हो रहा था, परन्तु देने को वह भी नहीं था। अपनी विवशता का यह बोध भी उन्हें क्षुब्ध करता था।

''वैदिक या भारतीय मूल्यों को अपनाना चाहने के बाद भी उनकी समकक्षता में न आ पाने की ग्लानि के कारण हीनता से बचने के लिए अपने दुर्गुणों को भी एक गुण बना कर उनमें उसके अभाव को रेखांकित करते हुए अपने को उनसे ऊंचा सिद्ध करने का प्रयत्न कर रहे। अरस्तू ने ज्ञान और कौशल के क्षेत्र में एशियाइयों की श्रेष्ठता स्वीकार करते हुए जिस स्पिरिट की कमी को रेखांकित किया था और उसे यूरोप के लोगों की विशेषता बताया उसके लिए सही शब्द दबंगई या हेकड़ी है जो अनपढ़ों, गंवारों के भीतर शि‍क्षितों और संभ्रान्त जनों के प्रति पाई जाती है और जिसके लिए उत्तर भारत में जाट, अहीर, ठाकुर और भूमिहार बदनाम रहे है। शिक्षा, ज्ञान और संस्कारों के साथ इसमें कमी आ जाती है परन्तु जातीय दुर्गुणों पर गर्व करने वालों को इस पर काबू पाने में लंबा समय लगता है! कई बार तो इसमें शताब्दियां और सहस्राब्दियां लग जाती हैं फिर भी यह दूर नहीं होता क्योंकि यह अपनी विशिष्ट पहचान का हिस्सा बन चुका होता है।यह अपने आत्मबल को बनाए रखने के लिए जरूरी होता है।

सच कहें तो पश्चिम की वैज्ञानिक और प्रौद्योगिक अग्रता के समक्ष अपने दैन्य से क्षुब्ध हो कर अपनी अस्मिता को बचाने के लिए अध्यात्म की महिमा और आध्यात्मिकता को भारत की विषिष्ट उपलब्धि और भौतिकता से त्रस्त मानवता के उद्धार के एक मात्र विकल्प के रूप में इसे ही प्रस्तुत करते हुए हम स्वयं भी यही करते आए है। एक ओर पिछड़े रह जाने की पीड़ा से उत्पन्न हीनता, दूसरी ओर उनकी समकक्षता में आने की बेतहाशा कोशिश और तीसरी ओर किसी भी शर्त पर अपने अस्तित्व की रक्षा करने का प्रयत्न।

तात्विक दृष्टि से गलत होते हुए भी यह एक अनुशंसनीय काम है । इसमें अपने रक्षणीय को बचाने और इसके साथ ही पूरी छानबीन से दूसरों के अनुकरणीय और ग्राह्य तत्वों के ग्रहण से हम विकास के नाम पर वैविध्य को समाप्त करते हुए अपने को अधिकाधिक अरक्षणीय बनाने से बचे रहते हैं।’’

विस्तार से उसे डर लगता है। वह हां या ना में जवाब सुनने और देने का आदी है। समझने से भी डर इसलिए लगता है कि इसमें फंसने पर अपनी मान्यताओं या प्रतिश्रुतियों से विचलित होने की संभावना बनी रहती है। उसे हस्तक्षेप करना ही था, ‘‘अजीब गावदी हो, अनुकरणीय और ग्राह्य तत्वों का निषेध करते हुए जहालत में पड़े रहने को तुम एक दुर्लभ गुण और अपनी सुरक्षा के लिए जरूरी शर्त मानते हो? तुम्हारी इसी तरह की बेवकूफियों की तलब ने तो मुझे खींच कर यहां पहुंचा दिया वर्ना यहां आना और नरक में पहुंचना दोनो बराबर।’’

‘‘नरक का रास्ता आसान होता है! उसके लिए प्रयत्न नहीं करना पड़ता ! पतन के लिए आयास नहीं करना होता, नरक के लिए साधना नहीं करनी होती सारे काम गुरुत्वाकर्षण कर देता है। केवल स्वर्ग में पहुंचना कठिन होता है, जैसे मेरे पास तक! पहुंचने के दोनों रास्तों में भीड़ इतनी कि कुछ रास्ते में ही दम तोड़ बैठते है और बाकी को यहां के दरवान घुसने नहीं देते ! असमायी वै स्वर्गो लोकः ! स्वर्ग में प्रवेश आसान नहीं ! तुम्हारा भाग्य है कि मेरे नाम के स्मरण से इसमें पहुंच गए!’’

कुछ बोलने की जगह वह ताली बजाने लगा!

मैं कुछ गंभीर हो गया, क्योंकि इस परिहास में विषय ही लुप्त हुआ जा रहा था, ‘‘देखो, यदि तुम समझते हो कि सर्वश्रेष्ठ जैसा कुछ होता है और उसे पाने के लिए हमें अपनी निजी विशेषताओं को छोड़ कर उसे ही ग्रहण कर लेना चाहिए और अपने को भूल जाना चाहिए, तो यह एक भ्रम है! सामान्यता की कसौटी पर सही उतरने वाला आदमी सबसे दयनीय मिलेगा, सबसे अधिक तनाव में। चलने के लिए रास्ते होते हैं, सर्वोपरि को तलवार की धार पर चलना होता है! इसलिए सर्वश्रेष्ठ का अनुकरण भी सांस्कृतिक आत्महत्या है! इससे जो इकहरापन पैदा होता है, वह लुढ़कता है तो फिर उठ नहीं पाता।

‘‘इसी तरह अपनी निजता की रक्षा के तकाजे से अपने दुर्गुणों तक को बचाने का समर्थन नहीं किया जा सकता । परन्तु एक बात तो यह कि गुण और दुर्गुण भी सापेक्ष्य होते हैं। एक परिस्थिति में जो दुर्गुण है वही दूसरे में गुण बन जाता है। वैविघ्य का बना रहना अधिक महत्वपूर्ण है।’’

उसे लगा मैं इस बहाने समग्रतवाद का विरोध कर रहा हूं, ‘‘हम इसी को बुद्धिजीवियों का ढुलमुलपन कहते हैं। वे मानवता के सबसे बड़े दुश्‍मनन है ! अपनी अपनी ढफली, अपना अपना राग! सर्वश्रेष्ठ खतरनाक है इसलिए निकृष्टता को जारी रखो। विविधता को बचाना कि कहीं एकरूपता न आ जाए। सभी समान न बन जाएं। यू पीपुल!’’ गुस्‍स्‍ेा में वह अंग्रेजी बोलने लगता है ।

मैं आवेष मे नहीं आया, ‘‘विविधता के दोष भी हैं गुण भी हैं। गुण अधिक हैं! हमने सर्वश्रेष्ठ की चिन्ता और सबको वैसा बनाने के उन्माद में उससे अधिक सत्यानाश किया जितना विविधता में संभव था। अपने से भिन्न को मिटा कर, या मिटाने के प्रयत्न में हम यह तक नहीं समझ पाते कि हम हैं क्या और हैं कहां। विविधता हमारे स्वभाव में ही है, प्रकृति में है, एकरूपता तो आद्य रूपों में पाया जाता है, परम तत्व में, एककोशीय जीवों में, अमीबा में, तुम्हारे जैसे मूर्खों में। विकास के साथ एकोऽहं बहुस्याम की प्रक्रिया काम करती है! बहु स्याम बहुधा स्याम की प्रक्रिया काम करती है। इसे एकरूपतावादी या एकपिंडीय सोच के लोग समझ नहीं पाते। एक आदर्श व्यवस्था में विविधता का लोप नहीं हो सकता, विविधता का समायोजन ऐसा होना चाहिए कि सभी अपनी उच्चतम संभावना तक पहुंच सकें।

‘‘एकान्विति मे, चाहे वह सर्वोत्तम के रूप में पेश की जाय, समग्र ऊर्जा एकदिश हो जाती है इसलिए वह बहुत शक्तिशा ली प्रतीत होता है, पर होता सबसे कमजोर है। एकचक्रा न वर्तते। एक पहिया चल नहीं पाता, संतुलन के लिए दूसरा पहिया तो होना ही चाहिए।

''सर्वोत्तम की तलाश ने ही तानाशाही, समग्रतावाद, फासिज्म, स्वच्छन्दता, निरंकुशता का रूप लिया और इसी कारण कुछ समय के लिए सबसे शक्तिशाली व्यवस्थाएं प्रतीत होती हैं, परन्तु ये अपने पहले नायक को लिए दिए उसके साथ ही अनगिन तबाहियां पैदा करके समाप्त हो जाती है। निर्णय के वैविध्य और शक्ति के इसी विकेन्द्रण के कारण लोकतन्त्र अपनी असंख्य कमियों के बाद भी बहुत सारे सदमे झेल लेता है!’’

‘‘सहस्रपाद गोजर की तरह !’’ उसने कटाक्ष किया !

मैंने उसकी ओर ध्या नही न दिया, ‘‘कुछ मतो और विश्‍वासों में अपने को सर्वश्रेष्ठ मान कर शेष को या तो अपने जैसा बनाने या उनको मिटाने का जुनून है । जब यह ईसाइयत में दिखाई देता है तो हम देख नहीं पाते। कहते हैं, अच्छा बनने में बुराई क्या है। यही जब इस्लाम में बुराई को भी अच्छाई बताने के क्रम मे सामने आता है तो यह दलील सुनने मे आती है कि इतने सामाजिक स्तरों को देखते हुए इसे अपनाने में क्या बुराई है। परन्तु इसी को जब हिटलर व्यावहारिक रूप देता है तो हम उसकी भर्त्‍सना तो करते हैं परन्तु इस श्रेष्ठतावाद की पूजा के परिणामों को नहीं समझ पाते!

‘‘हम, तुम्हारी मूर्खता से उस सवाल से ही हट गए जिसे तुमने इतने विश्‍वास से उठाया था। यह कि पुरातन, विदेशी जनों के भारत के प्रति आकर्षण और हिन्दुओं से घृणा और इस्लाम के बाद उन हिन्दुओं से मुसलमानों की घृणा का अन्तर क्या है।

''मैंने कहा पहला हिन्दुओं जैसा बनने, फिर भी न बन पाने के कारण उपजी हीनभावना की क्षतिपूर्ति वाली घृणा थी। वह केवल हिन्दुओं से थी।

'' इस्लाम की घृणा के दो चरण हैं, पहले चरण में यह हिन्दुओं के विरुद्ध नहीं, सभी गैरमुसलमानों के प्रति है ! इसमें उन जैसा बनने की लालसा और उसमें विफलताजन्य हीनतबोध नहीं है, अपितु दूसरों को, और इसलिए हिन्दुओं को भी अपने से गिरा हुआ समझ कर उनको मिटाने या अपने जैसा बनाने की जिद है। इसके लिए वे क्रूरतम कृत्य करते हुए न ग्लानि अनुभव कर सकते थे, न क्षोभ क्योंकि जो मुसलमान नहीं है वह इंसान है ही नहीं । दूसरे इसमें जानने की लालसा नहीं, जो जानने को है वह जाना जा चुका है! भक्त के लिए भगवान को जान लिया फिर जानने को कुछ बचता ही नहीं। बाकी सारा ज्ञान तो माया या भ्रम है जिसे मिटा दें तो भगवद् भजन अबाध हो! इस्लाम भक्ति संप्रदाय का जघन्यतम रूप है क्योंकि भक्ति में जो अभक्त है उसका परिहार करने से ही काम चल जाता है, इस्लाम इसे संहार का रूप दे देता है। फिर भी हीनताजनिक घृणा इसके मूल में नहीं है।

‘‘इसकी घृणा उस हीनता से पैदा होती है जो अपने अमानवीय अत्याचारों के बाद भी उस अभिमान को तोड़ने में विफल रहता है जिसके कारण अत्याचार सहने वाले उसे अत्याचार के कारण उससे अधिक घृणा करते मिलते हैं जितना उसने इनके प्रति अपने मन में पाल रखा है।

''दूसरे किसी देश में पूरे देश को मुसलमान बनाने में सौ दो सौ साल से अधिक का समय नहीं लगा था पर एक हजार साल तक के प्रयत्न के बाद भी इसे दस बारह प्रतिशत से अधिक हिन्दुओं को मुसलमान बनाने में सफलता नहीं मिली । इस विरोध के पीछे उन्हें ब्राह्मणों के प्रभाव और उनकी शैतानी शिक्षा का हाथ दिखाई देता था। यह घृणा ब्राह़मणों और पारसियों के प्रति थी जो मरने को तैयार थे, परन्तु धर्म बदलने को तैयार नहीं!

इतने बल प्रयोग के बाद भी इस्लाम स्वीकार कराने में विफलता ने एक खीझ या दबे हुए हीनता भाव को जन्म दिया हो सकता है जिसने गैरमुस्लिमों के प्रति क्रोध को हिन्दुओं के प्रति घृणा में बदला हो सकता है, परन्तु यह मिटाने और बदलने की दिशा में अधिक प्रवृत्त था, हिन्दुओं के लिए गालियां जिस हीन भावना से हिन्दुओं की समकक्षता में आने में विफल विदेशी देते रहे वह इस्लाम में न मिलेगा। यहां तक कि काफिर जैसा तिरस्कारपूर्ण शब्द भी अपनी विषाक्तता खो बैठा !’’

‘‘सरदर्द की गोली होगी कोई ?’’

मैं जानता था वह क्या कह रहा था ! चुप लगा गया!

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