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आस्था के प्रतिमान - ११

#धर्मो_हिंसा_तथैव_च ....

विमर्श करते हुए न चाहते हुए भी इतिहास की नीम अंधेरी वीथियों में खिंचा जाता हूँ कि संभवतः ये जो पलायनवादी सुस्त आज है इसका बीज भर मिल जाए....।

कह नहीं सकता इसकी क्या उपयोगिता हो सकती है...।

सुधीजन उपालंभ भी दे सकते हैं कि इन्हें गड़े मुर्दे खोदने से ही फुरसत नहीं ....अरे आज की बात करो!!!!

किंतु बात यदि हिंदू समाज के #मोहिन्जोदारो (मुर्दों का टीला) साबित होने की हो तो ऐतिहासिक विमर्श अनिवार्य हो जाता है,मेरे मत से।

हम सनातन मतावलंबी कर्म के सिद्धांत पर कई सदियों से इतनी खोपड़ी खपा चुके हैं कि अब उसका वास्तविक अर्थ भूल ही गए हैं।

हर दशा या हर वर्तमान अवस्था किसी अतीत कर्म का परिणाम है। विगत में कहीं कोई संदेश इस देश के सामुहिक अवचेतन में प्रवेश पा गया जो आज परिणाम दे रहा है।

बहुत दूर के उस कालखंड को समझें जो बेबूझ सा ,किसी इतिहास के नीरस व्याख्यान से बहुत परे अपने रहस्यों को अपने में समेटे आज तक किसी राम की अपेक्षा में शिला हो रहा है। "पौराणिक काल"।
यदि इस समय को #दशरथ से लगाकर #जनमेजय तक एक इकाई में बाँध लें तो आप पाएंगे *"हारे को हरिनाम"* का कहीं विचार नहीं। उल्टा इंद्र,अग्नि, वायु और रूद्र से ऋषि ऐसे बात कर रहा है मानो दो समबली बात करते हों। *"अहंब्रह्मास्मि"* का उद्घोष है.... *"निर्बल के बल राम" का आर्त स्वर नहीं।*

"अध्यात्म ही नहीं व्यवहार में भी अगत्स्य,दुर्वासा और परशुराम जैसे ऋषि उपलब्ध थे जो समाधियोग से शस्त्रप्रयोग तक हर विधा के अग्रगण्य थे।"

राम से कृष्ण तक हमने वो ऊँचाई छू ली कि अपना इतिहास लिखना बहुत तुच्छ लगा।इसलिए पुराण लिखे।

कृष्ण के स्वधाम गमन के बाद शनै शनै स्थिति अवरोह को आई। "सारा ध्वनि चेतना का विज्ञान लुप्त हो गया।" समाज में ऋषि वर्ग अप्राप्य हो गया।उहापोह के इस समय में गौतम बुद्ध और महावीर का आविर्भाव हुआ।

एक ने #करुणा और एक ने #अहिंसा का मंत्र समाज के प्राणों में फूँक दिया।

राजवंश इनके पथ के अनुगामी हो गए....।अशोक जैसे महायोद्धा ने शस्त्र ऐसे फेंक दिए जैसे कोई पाप अब तक हाथ से चिपका था। गीता भुला दी गई।इस जादुई आभामंडल के सम्मोहन में सारा समाज साधु संतों जैसा सोचने लगा।

समय के साथ ये हमारी #अंतर्कोषीयस्मृति (Intra Cellular Memory) में भी प्रविष्ट हो गया।स्वभाव बन गया।

आक्रमण का प्रतिकार न करना, हानि करनेवाले को भी हानि न पहुँचाने जैसे बहुत उच्च सिद्धांत कब कायरता और आलस्य हो गए पता भी न चला।

भगवान नामक एक काल्पनिक राजा जनमानस के अवचेतन में बैठ गया जो कभी सब ठीक कर देगा।लोग उस पर आश्रित हो गए।
राजवंश अपने को उसके प्रतिनिधि घोषित करने लगे और स्वयं पर से नियंत्रण भी खोते रहे।

इस भूमिका के तैयार होते ही मुस्लिम आक्रमण हुए जिन्होंने इस विभ्रान्त समाज को अंदर तक हिला दिया।

जैसे तैसे संघर्ष कर कर के २०० वर्ष गोरे साहब लोगों की कृपा प्राप्त कर अब स्वतंत्र हुए हैं।
परंतु अभी अपनी पहचान को लेकर ही असमंजस में हैं।

#रक्षण के लिए आज भी वही काल्पनिक ईश्वर है.... #क्षरण के प्रति इतनी अवहेलना है कि जब तक वह व्यक्तिगत स्तर तक नहीं आता लगता ही नहीं क्षरण हुआ है ( #डॉ_नारंग)।

इस समय में यदि युद्ध स्तर पर वैचारिक जागृति अभियान छेड़ा जाए, हर आयाम में,हर मंच से तो आशा हो सकती है कि ये हजारों वर्षों की मानसिक अपंगता दूर हो।

सोशल मीडिया लोहा गर्म कर ही रहा है.....चोट तो मगर वास्तविक जगत में पड़नी चाहिए।

#अज्ञेय


आस्था के प्रतिमान -१२

एक जिज्ञासा...

"क्या #मृत्यु_भोज करना एवं करवाना उचित है ???
आजकल ट्रेंड चल पड़ा है लोगों को बरगलाने का कि मृत्यु भोज करवाने की बजाए ₹ दान कर दो ।
मगर मैं समझता हूँ कि हमारे पूर्वजों ने कुछ सोच समझ कर ही रिवाज बनाएँ होंगे ।
मेरे मतानुसार मुस्लिम समुदाय में सबसे अधिक प्रेतबाधा जनित समस्याएं होती है।"

#समाधान : आपके विचार सराहनीय हैं किंतु सनातन शास्त्र परंपरा से विचार करना होगा।साथ ही किन परिस्थितियों में क्या परिवर्तन किए गए ये भी देखें।

प्रेतबाधा इत्यादि विषयों पर भी अनुभूति परक विमर्श होने की आवश्यक है।

मुस्लिमों में प्रेतप्रकोप ज्यादा होने के अपने अलग कारण हैं।

सबसे पहले तो इस्लाम को समझो।वो मध्य पूर्व की उसी धरती से उठा है जहाँ लाखों वर्षों से असुर और राक्षस व दैत्य दानव जातियों का प्रभुत्व था।

इस्लाम उसी आसुरी संस्कृति का पुनर्जन्म है।

इनमें मृत देह जलाई नहीं जाती।वह भूमि के नीचे सड़ती है।
एक सर्वमान्य तथ्य है कि जीव को अपने देह से अधिक कुछ भी प्यारा नहीं होता।
जब मृत्यु होती है तो जीव को उसे स्वीकार करने में समय लगता है।
हम देह जला देते हैं अतः हमारे प्रेत शीघ्र मुक्त हो जाते हैं।
गड़े हुए शरीर के आसपास जीव निरर्थक आशा में बहुत लंबे समय तक मंडराता है और फिर पीर,जिन्नात,शख्स(सगस), इत्यादि प्रेत योनियों में भटकता है।
इस्लाम चूंकि राक्षस धर्म है अतः उनके लिए ये दुर्गति भी सद्गति है।

उनमें सूफी साधना द्वारा उद्धार होता है जो इस समय लुप्त हो चुका है।

अभी सूफी नाम से भूत प्रेत पूजक ही हैं।
सबूत हैं, सूफी साधना करने वाले एक समय के बाद मानसिक विक्षिप्तता के शिकार हो जाते हैं।
उनके मुरीद इसे ऊंची अवस्था कहते हैं पर दरअसल वे उन आत्माओं के मानसिक कब्जे में जा चुके होते हैं जिनके द्वारा उन्होंने सारे जीवन झाड़फूँक टोटके द्वारा लोगों के स्वास्थ्य व धन इत्यादि संबंधित लाभ कराए थे।

उनके धर्म में #संदेशवाहक_साहब भी मुक्त नहीं हैं तो फिर बाकी का तो विचार ही छोड़ो।

अब आते हैं वैदिक सनातन या हिंदू विचार पर....

हमने विगत ५०००० वर्षों से आत्मा की गति पर जितना विचार और प्रयोग किए हैं पूरी धरती पर सबने मिलकर उसका ३% भी नहीं किया है।

हमारे चिंतन की गहराई से कुछ निष्पत्तियाँ हाथ लगीं हैं।

आत्मा अपने शुद्ध बुद्ध स्वरूप में सदैव मुक्त है।उसे बंधन का भ्रम हुआ है।यह भ्रम ही शिव स्वरूप आत्मा को जीव स्वरूप में लाकर जन्म मरण के बंधन में डालता है।किसी सिद्ध द्वारा शक्तिपात होने पर जीव साधना करके फिर से अपने शिव स्वरूप को पा जाता है।उसका भ्रम नष्ट हो जाता है।इसे कहते हैं #मोक्ष।
ऐसा ज्ञानी फिर जन्म नहीं लेता।उसके लिए दाहसंस्कार या उत्तर क्रिया की अनिवार्यता नहीं रहती।इसीलिये हमने संन्यासी के शरीर को जलदान या भूदान के योग्य माना।

पीछे आते हैं सामान्य संसारी जीव।इनका एक समूह होता है जो प्रारब्ध के कारण इन्हें मिला होता है।ये राजी नाराजी सब उसीमें करते हैं और उसमें आसक्त हो जाते हैं।

जब मृत्यु काल उपस्थित होता है तो ऐसा जीव अपने संबंधों को त्यागने से डरता है और बेहोशी में प्राण त्याग देता है।
पूर्व की आसक्ति के वशीभूत वह दाहसंस्कार के बाद भी अपने संबंधियो के आसपास मंडराता है किंतु जब १३ दिन की क्रियाओं से प्राप्त दैवीय ऊर्जा से उसका मोह कुछ कम होता है तो वह एक गहरी नींद में चला जाता है।

मृत्यु का सवा मास होने पर वह फिर जागता है और देखता है अब सब अपने जीवन में मस्त हैं... मैं अब उनके लिए नहीं हूँ तो सवा मास में संबंधियों द्वारा किए पुण्यों और अपने कर्मों के बल पर वैराग्य और बढ़ता है और इस बार वह फिर लंबी नींद में जाता है।

ये नींद पूरी होने पर वह पितृलोक में जागता है।वहाँ उसे अपने अन्य संबंधी मिलते हैं जो पहले चले गए थे।

वहाँ से वह धरती पर अपने लोगों को समय समय पर देखता और उनका ध्यान रखता है।
पितृलोक का एक दिन हमारे एक वर्ष के बराबर होता है अतः श्राद्ध में दिया वार्षिक भोजन उसका दैनिक भोजन होता है।
शुद्ध ब्राह्मण, कौआ,कुत्ता, गौ तथा घुमक्कड़ साधु यदि सादर भोजन कराए जाएँ तो उनके माध्यम से वह शक्ति पाता है।
बदले में वह परिवार को आशीष देता है जिससे परिवार का सुरक्षा कवच बनता है।

रह गई बात मृत्यु भोज की तो वो भी उत्तम तो है पर व्यक्ति की आर्थिक स्थिति देखते हुए उसे कम ज्यादा किया जा सकता है।

यदि परिवार सक्षम है और फालतू अय्याशियों पर लाखों या हजारों हर साल उड़ रहे हैं तो प्रियजन के निमित्त जीवन में एक बार उस समाज के भोज में आपत्ति क्यों जिस समाज से वह गहराई से जीवन भर जुड़ा रहा???
हाँ निर्धन हो तो कोई बात नहीं।

वैसे तेरहवीं का महाभोज इस बात का प्रतीक है कि अब परिवार अपने प्रियजन के वियोग की दुखद स्मृति से आगे निकल कर समाज की मुख्य धारा में आ रहा है।

मुंडन व नवीन वस्त्र भी वही संकेत देते हैं।

मेरा मत है यदि आर्थिक स्थिति सही न हो या कोई अन्य समस्या हो तो भी १२ दिन का समस्त उत्तर कर्म पंडितजी से अवश्य कराएं।

मृत्युभोज न दे सकें तो किसी तीर्थ में गौशाला या आश्रम में अपने हाथों से गौ तथा साधुओं को भोजन करा दें,अपनी सामर्थ्य अनुसार।
किंतु इस विज्ञान को त्यागें नहीं।

(महाभारत के परक्षिप्त अंश दिखाकर कुतर्क करने की आवश्यकता नहीं है।)

#अज्ञेय

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