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पैराश्यूटिये प्रत्याशी क्यूँ लाये जाते हैं ?

बड़े रोष का मुद्दा है पैराश्यूटिये प्रत्याशी । स्थानीय कार्यकर्ता नाराज है क्योंकि पार्टी ने उसको वास्तव में निस्वार्थ कार्यकर्ता समझा और किसी बाहरी आदमी को टिकट दी जिसे वो पैराश्यूटिया कहता है । लेकिन भाई, हर सिक्के के कम से कम दो पहलू होते हैं, यहां कुछ और भी निकल आ सकते हैं ।

पहली बात यह होती है कि यह पैराश्यूटिया केवल चुनावों तक सीमित नहीं होता, कंपनियों में भी कई रिक्त पद इसी तरह से भरे जाते हैं, इंटरनल प्रोमोशन नहीं होता । यही रोष वहाँ भी होता है, बस वहाँ निस्वार्थ सेवा, त्याग, समर्पण आदि घिसे हुये बेसुरे रेकॉर्ड नहीं बजाए जाते । समझते हैं क्यूँ पैराश्यूटिया को लाया जाता है ।

बड़ी सरल बात यह होती है कि पद की जो मांग होती है उसे पूरी करने में उपलब्ध टिकटेच्छु कहीं तो कम पड़ते हैं ऐसा श्रेष्ठीयों का आंकलन होता है । जहां चुनाव की बात होती वहाँ कई पैमाने होते हैं और सीट सीट पर अलग होते हैं । कहीं फंड जुटाना है तो कहीं कार्यकर्ता – चलिये, अब निस्वार्थ की रेकॉर्ड बजाना बंद – कहीं बूथ मैनेजमेंट, कहीं कमीनापन – राजनीति है, इस शब्द से बिदकिएगा नहीं – हाँ तो, मतलब ऐसे कई गुण आवश्यक होते हैं, आप में नहीं हैं तो पार्टी को कोई पैराश्यूटिया लाना होता है । कंपनियों में भी यही होता है, बस पैमाने अलग हो सकते हैं ।

जिन्हें इंटरनल प्रमोशन नहीं मिला हो उन्हें इस बात पर सोचना चाहिए कि ऐसा क्यूँ होता है कि उनका विचार नहीं किया जाता और पैराश्यूटिया लाया जाता है ? इसका उत्तर है कल्चर – संकृति । पैराश्यूटिया ऐसी संस्कृति से आता है जहां उसे उस काम के लिए योग्य बनाया जाता है – पार्टी हो या कंपनी । दूसरी पार्टी का हो तो उसे चुनाव जीतने के गुर पता होते हैं, उनमें वो प्रवीण होता है । कंपनी की बात करें तो कंपनी को आगे ले जाने के लिए जो गुण चाहिए वैसे गुणों का विकास उस कंपनी में होता है जहां से वो आया है ।

नाराज टिकटेच्छुओं को एक ही बात पर विचार करना होगा । अपनी पार्टी में ये गुणों का अभाव क्यूँ है ? क्या पार्टी विथ अ डिफरंस का मतलब यही डिफरंस है कि आपको चुनकर कैसे आना है यह सिखाया नहीं गया या फिर आप के पार्टी का अभ्यासक्रम अप टू डेट नहीं है । लेकिन जीतना जरूरी है और लात नीचे से ऊपर मारना संभव नहीं होता, ऊपर से नीचे ही आसानीसे मारी जाती है । आप में इन गुणों का विकास नहीं किया गया इसलिए आप श्रेष्ठीयों की अदूरदृष्टि को कोस नही सकते – अनुशासन, शब्द सुना ही होगा ना ? दक्ष हो कर पैराश्यूटिया की ड्यूटी बजाईये, दरी उठाये दरी बिछाएँ या फिर पार्टी से बाहर जा कर विश्राम कीजिये । गुसाईं समरथ को और कार्यकर्ता श्रेष्ठी को, दोष नहीं दे सकता ।

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