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मेरी नई कहानी ★★ पारिजात ★★

पारिजात हाँ यही नाम है मेरी एक मित्र का ...मुलाकात यूँ कहें बस... मुम्बई में रहती है नौकरी करती है।आज भी मेरे सामने वाले रूम मे अपनी दो सहेलियों के साथ रहती है लगभग तीन सालों से ...लगता है अभी कल की ही बात है ...एक दिन उसकी सहेलियाँ रात्रि शिफ्ट के लिये आफिस निकल चुकी थी और पारिजात दिन के शिफ्ट में काम कर के लौटी,उसका पर्स चोरी हो चुका था ज्यादा कीमती सामान तो नहीं था पर रूम की चाभी,रेलवे पास मोबाईल और कुछ पैसे ...समस्या यह खड़ा  हो गया कि रूम बंद अब वह अनजाने शहर में  जाये तो कहाँ जाये गुमसुम सी  खड़ी थी दरवाजे के सामने ...नयी नयी शहर में आई थी किसी से जान पहचान भी न था...उसे समझ में नहीं आ रहा था क्या करे कहाँ जाये रात्रि के लगभग दस बज रहे होंगें ...वैसे तो मैं महिलाओं से एक निश्चित दूरी बना कर रहता हूँ पर यहाँ  गुमसुम सी लड़की पर नजर पड़ी,उसने भी देखा ...अनायास मैं पूछ बैठा 'कोई प्राब्लम है' क्या...आदतन उसके मुख से निकला 'नहीं' ...कोई बात नहीं मैं रुम मे चला आया पर दिमाग वहीं बाहर दरवाजे पर... कुछ तो गड़बड़ है एसा मेरा मन कह रहा था ...मै अपनी पत्नी 'फूलकुमारी' से ईस विषय में बात किया ...वह भी अभी तक सिर्फ पारिजात को एक दो बार देखी थी गैलरी में आते जाते ...बोली नयी नयी किरायेदार है ...पर  बात चीत नहीं हो पायी है ...वह बाहर गयी पूछी तो पता चला पर्स चोरी हो गया  है जिसमे चाभी मोबाईल रेलवे पास और कुछ पैसे थे ...वह चाह कर भी किसी से बात नहीं कर सकती थी क्या करे कहाँ जाये अनजाने शहर में...फूलकुमारी उसे जबरदस्ती घर में लेकर आई वह आना नहीं चाह रही थी कारण अभी तक हमलोगों से बात चीत भी नहीं हुवा था झिझकते हुवे वह घर में आई....सिमटी हुई मानो लाजवंती हो कहीं छुवा गयी तो मुरझा जायेगी ...अनजानी जगह अनजाने लोग ...दो मिनट बाद मैं ही मौन तोड़ा... कारन मैं फूलकुमारी  से किचन में पूछ चुका था ...ऐसे  चुप रहोगी तो कैसे चलेगा यह गाँव नहीं शहर है ...पारिजात कुछ नही बोली ...पुनः मै ही बोला अगर तुम्हें असुविधाजनक लग रहा हो तो तुम जा सकती हो पर हमें यह विश्वास दिलाना होगा कि तुम जहाँ भी जाओगी सुरक्षित रहोगी ...क्योंकि अभी चाभी वाला भी नहीं मिलेगा ....दुकान बंद कर घर चला गया होगा. ..क्या सोच रही हो ...

कुछ नहीं भैय्या ...लगा सिर्फ उसके होंठ हिले हों ...

कोई जान पहचान का है मुम्बई में मैं पूछा...

नहीं अभी नई नई नौकरी लगी है पंद्रह दिन हुवे हैं हैं मुम्बई आये हुवे , मैं यहाँ किसी को नहीं जानती...

कहाँ की रहने वाली हो ...

झारखंड ...

झारखंड में कहाँ ...अनायास ही मेरे मुख से निकल आया...

बरकठ्ठा ...आप जानते हैं क्या भैय्या ...आप लोग कहाँ से हैं भैय्या..।

हाँ...

हमलोग हजारीबाग के हैं....

हजारीबाग नाम सुन कर पारिजात  चेहरे में एक चमक आ गयी...चौंक कर बोली ...क्या सही में भैय्या ...

हाँ ...मैं बोला ...तुम ईसे अपना ही घर समझो अब रात्रि में मैं तुम्हें कहीं जाने नहीं दुंगा...

वह सिर्फ सर हिलाई कुछ सोचते हुवे...फिर बोली ...मेरी वजह से आपलोगों को बेवजह तकलीफ होगा...

अरे नहीं अब तुम कुछ और मत बोलो झारखंड की हो ...बस अब यह घर आज रात के लिये तुम्हारा आशियाना है ...

पर इतने कम जगह में ...

वन रुम किचन है हमारा  छोटा सा घर...

इसकी चिंता तुम मत करो जरूरत पड़ी तो मैं बाहर सो जाउंगा...

नहीं एसा मत कीजिये भैय्या मेरे लिये ...मैं कौन लगती हूँ आप लोगों की जो मेरे लिये आप बाहर सोएंगे ...

पागल हो क्या ...अनायास ही मेरे मुख से निकला ...झारखंड की हो और भैय्या भी बोलती हो...अब और कौन सा रिश्ता बाकी है ...

ठीक है पर आप बाहर नहीं सोयेंगे...लोग क्या कहेंगे....

लोगो की छोड़ो रूम भले ही मेरा छोटा है पर दिल बड़ा है और तुम मेरी बहन समान हो भैय्या संबोधित कर रही हौ बस काफी है ...यहाँ सुरक्षित रहोगी...

ठीक है भैया ...

जाओ बाथरूम में जाकर हाथ मुँह धो लो ...कुछ खाई हो या ....

खाई हूँ...बात काटते हुवे बोली...

झूठ ...क्या खाई हो और कब आफिस से तो तुम सीधे आ रही हो ...पर्स तुम्हारा चोरी हो गया है...घर तुम गई नहीं हो...भैय्या भी बोलती हो और ...

बस जाने दीजिये ना भैय्या सर छुपाने को मिल रहा है कम है मुम्बई में...एक दिन नहीं खाउंगी तो मर थोड़ी ना जाउँगी...

क्या ...? भूखे सोने का ईरादा है मैं कुछ ऑडर कर देता हूँ....

नहीं भैय्या ...तभी तक  फूलकुमारी सब माजरा समझ चुकी थी दो रोटी और दही (चूंकि हमलोग खाना खा चुके थे बस दही सुबह के लिये था )लेकर आ गई ...वह ना ना कर रही थी फूलकुमारी को समझ आ गया वह शरमा रही है पारिजात का हाथ पकड़कर रसोई  में ले गई...

वह दही रोटी खाने लगी ...खाते खाते उसके आँखों से गंगा जमुना की  धार बहने लगी ...

मैं मजाक किया ...पहले आराम से खा लो फिर लोटा भर के रो लेना ...वह रोते रोते हँसने लगी ...गजब की सुन्दर लग रही थी वह....मानो परी हो ओर आसमान से सीधे उतर कर मेरे घर आई हो ....

रात्रि के लगभग बारह बजने वाले थे ..नींद हमारी क्या सभी के आँखों से गायब था...हमारे दोनो बच्चे सिर्फ देख रहे थे उन्हे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि दीदी क्यूँ आई है ...

रात्रि मे सोने के लिये पत्नी और पारिजात पलंग पर और मैं और दोनो बच्चे जमीन में गद्दा बिछा के लेट गये ....

बहुत घुल मिल गई थी पारिजात इन तीन चार घंटों में...कुछ तो हमारा मिलनसार स्वभाव और कुछ एक ही जिले के होने का असर ...अपनापन जैसा लग रहा था...बात निकली तो पता चला वह  बरकठ्ठा से काफी दूर देहात की रहने वाली है और अपने गाँव की पहली पढी लिखी लड़की है जो मुम्बई में नौकरी  कर रही है, घर में एक छोटी बहन और दो छोटे छोटे भाई हैं...बहन कुसुम अभी कालेज मे है और दोनो भाई गाँव में ही प्रगति पब्लिक स्कूल बरकठ्ठा में पढ रहे हैं बाते करते करते रात्रि कै डेढ बज चुके थे मैं ही जबरदस्ती लाईट ऑफ किया फिर सो गये ...।

सुबह फूलकुमारी को जल्दी जगना पड़ता है बच्चों के टिफिन बनाने के लिये ...लगभग छः बजे फूलकुमारी  जग गई....फूलकुमारी के जगते ही पारिजात भी जग गई ... मैं सोया ही था अभी तक ...मैं लगभग सात बजे जगता हूँ ...बच्चों को स्कूल छोड़ने साढे सात बजे जाता हूँ...मेरे जगते ही देखता हूँ बच्चे तैयार हैं स्कूल जाने के लिये ...अभी बारह घंटे भी नहीं हुवे थे पारिजात को घर आये हुवे वह अपनी भाभी का हाथ किचन में बंटा रही थी ...उसकी सहेलियों के भी आने का वक्त हो रहा था ...घर का माहौल ही बदल चुका था ....

बच्चे स्कूल ही नहीं जाना चाह रहे थे  मैं जबरदस्ती स्कूल छोड़कर आया ...

स्नान वगैरह करने के बाद हम तीनों नाश्ता करने बैठे ...

पारिजात नाशते के समय पुनः रोने लगी ...

मैं मजाक किया...क्या  तुम खाना खाते समय हरदम रोती हो ईस लिये पतली दुबली हो ...कोई क्या कहेगा ...                              

नाश्ता करते करते पारिजात की सहेलियाँ आ गई...चूँकि दरवाजा आमने सामने है...  खुला होने की वजह से नजरें आपस में मिली ...सहेलियों का मुख आश्चर्य से खुला का खुला रह गया ...आवाज देकर पारिजात ही उनको अन्दर बुलाई ....सारी बातें बताई ...सहेलियों के चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ दिखाई दे रहा था...साथ ही साथ वे दोनो हमदोनो को भी देख रहीं थीं...मैं असुविधाजनक महसूस  कर रहा था उठ कर जाने लगा तो पारिजात हाथ पकड़ कर रोकते हुवे बोली भैया आप कहाँ जा रहे हैं जाना तो अपने रूम में अब  हम लोगों को है आप बैठिये हमलोग जाते हैं ...आप भाभी के साथ बैठिये ...सच बोलें तो उसका हक के साथ भैय्या बोलकर हाथ पकड़कर बिठाना मुझे अंदर से तक बहुत अच्छा लगा था ...

मैं कुर्सी पर बैठते बैठतेे बोला तुम लोग भी पलंग पर बैठ जाओ चाय पीकर जाना...भाभी चाय बना रही है ...

अरे नहीं भैय्या...हम लोग चलते हैं...

ठीक है जाओ लगता है भाभी के हाथ का खाना पसंद नहीं आया...आगे कुछ बोलता पारिजात बोल उठी ...

भैय्या आप नसीब वाले हैं ऐसी भाभी ...भगवान जी आपको दिये हैं भाभी के हाथ का खाना एकदम मैय्या (माँ)के हाथ के खाना जैसन लगा ...और उठ कर किचन में भाभी के पास चली गई...और चाय बनाने में सुबह नाश्ते के जैसा मदद करने लगी ...

पाँच मिनट में चाय पीकर पारिजात और उसकी सहेलियाँ सामने रूम में चली गईं...

वैसे भी हमारा घर मनपसंद पत्नी और उनके प्रेमवत व्यवहार के कारण स्वर्ग से कम नहीं है पर पारिजात के आने के बाद से स्वर्ग धीमी-धीमी खुशबू से महकने लगा था ....अक्सर दिन में एक दो बार घर में पारिजात आ ही जाती थी ...बच्चों और भाभी के साथ पारिजात कुछ ही दिनों में ईतनी घुल मिल गई थी कि अगर कोई अनजान व्यक्ती देखता तो यकीन नहीं कर पाता कि इनके बीच रिश्ते बने अभी एक महीने भी नहीं हुवे होंगे...

पारिजात घर में भाई बहनों में सबसे बड़ी थी ...वह ना सिर्फ भैय्या मुझे कहती थी वरन भैय्या का मान भी देती थी ...हम दोनो के बीच भाई बहन का रिश्ता बन चुका था ...पारिजात अपनी सारी बातें जो एक अभिभावक को  बताई जा सकती थी भाभी से खुल कर बताती थी ...हम भी ज्यादा दखलअंदाजी उसके जीवन में नहीं करते थे...जब तक वह खुद राय नहीं मांगती थी ....कहने का मतलब यह है कि पारिजात हमारे जिन्दगी में काफी अन्दर तक जगह बना चुकी थी ...एक दो दिन आगर ना मिलूँ तो एसा लगता मानो उससे मिले महींनो हो गये...

अक्सरहा वह घर में जब आती थी मैं दुकान में रहता था पर पत्नी और बच्चों से उसको काफी लगाव हो गया था...

जिन्दगी हमारे साथ साथ पारिजात की भी अच्छे से चल रही थी ...

अब वह कब नाराज होती थी और कब खुश मिजाज रहती थी महसूस हो जाता था ....

लगभग दो या तीन बार मैं पारीजात को किसी युवक के साथ रेलवे स्टेशन के बाहर या फिर किसी रेस्टोरेंट में देखा था ...पर मैं एसा व्यवहार किया कि मैने कुछ नहीं देखा है ...

सोच भी रखा था जबतक पारीजात इस विषय में बात नहीं करेगी मैं भी अनजान बना रहुँगा...पारिजात बालिग थी और सबसे बड़ी बात वह जरुरत से भी ज्यादा समझदार थी ...अच्छे और बुरे का उसे ज्ञान उसे अच्छे से था ...

एक दिन सुबह सुबह बच्चों को स्कूल छोड़ कर आया तो वह पत्नी के साथ बैठी थी...किसी अनजाने का भय मुझे हुवा ...फूलकुमारी  इशारे से बैठने को बोली मैं भी दरवाजा बंद कर के साथ में पलंग पर बैठ गया....

कोई बात चीत नहीं मुझे तो कुछ समझ में आ ही नहीं रहा था और फूलकुमारी कुछ बोल नहीं रही थी ...पारिजात तो गुमसुम बैठी थी मैं ही बोल पड़ा आखिर क्या बात है बताओगी तब ना पता चलेगा ईसका क्या ईलाज है ...

फूलकुमारी सर उठा कर मुझे देखी ... पारिजात अभी भी सर झुकाये गुमसुम बैठी थी ...पर उसके दिमाग में कुछ चल रहा था ....

मैं उठने लगा तो मेरा हाथ पकड़कर पारिजात जोर जोर से रोने लगी ....मेरे समझ में कुछ नहीं आया मैं वापस बैठ गया औय पलंग पर ही पारिजात को सुला दिया फूलकुमारी  के गोद में ...फूलकुमारी उसके बालों को हलके हलके सहलाती रही... वह कम से कम दस मिनट तक रोती रही फूलकुमारी गोद में ही मैं भी उसे रोता  छोड़ दिया उसके सब्र का बाँध टूट चुका था...मैं उठा  और रसोई में चला गया....

इधर पारिजात का रोना बंद ही नहीं हो रहा था...

दस मिनट के बाद वह धीरे धीरे शाँत होने लगी पर सर फूलकुमारी के गोद से नहीं हटाई पत्नी सहलाती रही और उसके आँसू पोंछती रही...पारिजात के आँसुवों से फूलकुमारी पूरा कपड़ा गीला हो गया ....मैं रसोई से रूहअफ्जा एक ग्लास में मिला कर ले आया...

मैनें धीरे से पारिजात का सर फूलकुमारी के गोद से उठाते हुवे उसे बिठाया फिर वह खुद मेरे के हाथों से ग्लास लेकर एक ही साँस में पूरा पी गई ...

अब वह शाँत थी मैं परेशान हो रहा था पर क्यूँ मुझे खुद भी समझ में नहीं आ रहा था...कौन लगती है पारिजात मेरी मैं क्यूँ परेशान हूँ पर दिमाग कुछ और कह रहा था तो दिल कुछ और ...

अंततः पारिजात तो नही पर फूलकुमारी ही बोल उठी ....तुम नही बताती हो तो तुम्हारे भैय्या को मैं बताती हूँ तुम्हारा वेदना कुछ कम होगी और निर्णय लेने में आसानी हो जायेगा...

मेरी तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था माजरा क्या है...

पुनः फूलकुमारी ही बोल उठी ...हमारी ननद को प्रेम रोग हो गया है....

तो ईसमे क्या तकलीफ है सभी को होता है मुझे भी हुवा था तो ईसमें इतना रोने वाली क्या बात है ...

ईस बाली उमर में अगर प्यार नहीं होगा तो कब होगा...मैने कहा..

बात ईतना आसान लगता है पर है नहीं वह लड़का दूसरी जाति से है ...

तो क्या हुवा प्यार जाति पाति देख के थोड़े ना होता है ...आजकल यह आम बात है ईसमें ईतना सोचना और रोना क्यूँ...

माँ पिताजी से बात करो तुम्हें लाज लगती है तो पहले मैं लड़के से बात करूँगा फिर चाचा चाची से ...माँ बाप हैं मान जाएगे कब तक नाराज रहेंगे ...

नहीं भैय्या माँ बापू नहीं मानेंगे ..

तो बगावत कर के अदालत में शादी कर लो आज कल तो आम बात है...ईसमे गलत तो कुछ भी नहीं है ....तुम्हारी अपनी जिन्दगी है कैसे भी जीयो यह हक है तुम्हारा... 

भैय्या कहना आसान है गाँव की जिन्दगी में एसा नहीं होता है एक बार मैं पहले ही बगावत कर चुकी हूँ ...

क्या मतलब ...मैं कुछ समझा नहीं ...

सोचनें मे तो यह क्राँतिकारी लगता है पर यह डरती है...फूलकुमारी बोली ....

लेकिन क्यूँ ...बालिग है समझदार है पढी लिखी है कानून भी जानती है फिर क्यूँ...

बात यह है भैय्या गाँव की मै पहली लड़की हूँ जिसने दसवीं फर्स्ट क्लास से पास की ...फिर माँ पिताजी आगे पढाने के लिये राजी नहीं थे शादी के लिये रिश्ता आने लगा था...मैं जिद पर अड़  गई मुझे शादी नहीं करनी हैऔर आगे पढना है ...

मुझे ससुराल के जगह पर आगे पढने के लिये कॉलेज भेजा जाए...

खाना पीना छोड़ दी थी मै भैय्या...फिर दो दिनो के बाद दादी और नानी  के कहने पर माँ पिताजी मान गये...और हार मान कर पढने के लिये राँची भेज दिये ...पर जाते जाते कह गये पता नहीं मैं सही कर रहा हूँ या गलत ...सब कूछ अब तुम्हारे हाथ में है पारिजात ....कुछ भी अच्छा बुरा करने से पहले अपने माँ बाप के बिषय  में जरुर सोच लेना...

मैं पहली लड़की थी भैय्या ....खानदान की नहीं ....पूरे गाँव की भी नहीं... पूरे ईलाके के दस गाँव मे भी अभी त किसी लड़की ने अभी तक कौलेज का मुँह नहीं देखी थी...

इटर में अच्छे नंबर आए फिर सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज में इलेक्ट्रानिक्स कम्यूनिकेनन विभाग में एडमिशन मिल गया और साथ ही साथ स्कॉलरशिप भी ...मैं इंजीनियर बन कर बड़े कंपनी में नौकरी करने वाली अपने पूरे इलाके की पहली लड़की बनी ...

इंजीनियरिंग पास मैं हुई थी भैय्या... पर जश्न पूरे गाँव में मनाया गया था ...वह भी पूरे एक सप्ताह तक ...आज भी गाँव के सारे बुजुर्ग मेरा नाम बहुत ही प्यार से लेते हैं मै आज पूरे के गाँव की लाडली  बन गई हूँ बहुत मान सम्मान मिला आस पास के दसियों गाँव में...मेरी वजह से आज गाँव की लड़कियों के लिये एक रास्ता खुल गया है ..

सैकड़ो लड़कियाँ कालेज जाने लगी हैं....कुछ डॉक्टरी की पढाई कर रही हैं कुछ मैरी तरह इंजीनियरिंग की...और भी हैं जौ अलग अलग छेत्र में आगे बढ रही हैं...

यह प्यार और सम्मान ना भैय्या बहुत वजनी होता है दिखता नहीं है पर मैं उस बोझ को उठाए हुई हूँ ...मैं पूरे ईलाके के गाँव की लड़कियों के लिये रोल मॉडल बन गयी हूँ ...

सब की नजरें मेरे तरफ है मेरा एक स्वार्थ भरा कदम सभी लड़कियों के सपने छीन लेगी....

अगर मैने भाग कर शादी कर ली ना भैय्या तो मैं तो सेटल हो जाउंगी पर सैकड़ो बहने वापस चूल्हा बरतन करने को विवश हो जाएंगी...

इतना बडा़ पाप मुझसे नहीं होगा भैय्या...

सभी के माँ बाप  मुझे देख कर अपनी बेटियों को शहर से बुला लेंगे ...और जो बेटियाँ सपने देख रही है पारिजात दीदी जैसा बनने की उनके सपने मिट्टी में मिल जाएँगे...माँ बाप अपने कदम पीछे खींच लेंगे भैय्या...

बस इतना समझ लीजिये भैय्या मै अपनी अपनी मिली हुई आजादी भोगने की हिम्मत नहीं रखती...पर उसे बचाने के लिये जमीन आसमान एक कर दूँगी ...अपने आप को मिटा दूँगी पर आने वाली बहनों के लिये कोई अवरोध खड़ा नहीं होने दुंगी...यह मेरा अपने आप से किया हुवा वादा है...पारिजात सिसकते सिसकते बोली ...

आज मैं गर्व से फूला नहीं समा रहा था (सामने बैठी सुन्दर,साँवली,साधारण कद काठी परंतु अंदर से मजबूत ईरादों से भरी हुई पारिजात को देख कर )...जिसके पास इतनी समझदार बहन है ...पारिजात  मुझे कब का छोटा कर चुकी थी अपने उच्च विचारों से ...और मैं पारिजात से हार कर भी विजयी महसूस कर रहा था ...उसके उच्च समझदारी से भरे विचारों को सुनकर और उस कठिनाई से भरे रास्तों पर दृढतापूर्वक चलते देख कर ....

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