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"बच्चे, तुमने बहुत अच्छा लिखा है. तुम जैसा छोटा सा बालक यह भाव प्रदर्शित करता है, मतलब शिक्षा सार्थक है. देश का भविष्य सचमुच उज्वल है. वाह, वाह!"

"क्या यह स्कूल की वार्षिक पत्रिका में दी जा सकती है, काका?", उसने प्रसन्न होकर पूछ लिया....

"क्यों नहीं? बिलकुल दी जा सकती है...", काका बोले....

बडे उत्साह से उसने अपनी कविता अपने हिंदी वाले सर को दे दी. अब उसे प्रतीक्षा थी स्कूल की वार्षिक पत्रिका के इस वर्ष के संस्करण की. उसे पूरा विश्वास था अपनी कविता के चयनित होने का.

"भले तुम अंग्रेजी माध्यम से पढ़ रहे हो, पर हिंदी तो मातृभाषा है तुम्हारी. शुद्धलेखन की इतनी सारी गलतियों के कारण तुम्हारी प्रविष्टि अस्वीकार की जाती है. मुझे शर्म आ रही है कि मैं तुम्हारा हिंदी शिक्षक हूँ!"

कुछ अन्य छात्रों के साथ उसकी प्रविष्टि को भी वापिस कर दिया गया था. वह निराश हो गया. बालकों पर आलोचना का प्रभाव, प्रशंसा जैसा ही होता है. जितनी सरलता से प्रशंसा उत्साहित करती है उतनी ही आसानी से आलोचना हतोत्साहित कर देती है इन्हें. वह गुमसुम सा रहने लगा. उसे विश्वास ही न होता था कि उसकी प्रविष्टि ऐसे अमान्य कर दी जाएगी.

आखिर साहस कर ही लिया उसने. स्कूल का समय ग्यारह से पांच होता था. एक दिन साढ़े दस बजे ही पहुँच गया वह स्कूल में. स्कूल के प्रधानाचार्य को सुनाना चाहता था वह अपनी कविता. वे स्वयं एक बडे कवि थे. कार्यालय के द्वार तक पहुंचते ही उसका साहस जवाब दे गया. प्रधान अपनी कुर्सी पर बैठे, व्यस्त लग रहे थे. भीतर प्रवेश की अनुमति कैसे मांगी जाए? इसी ऊहापोह में बेचैन खडा था कि सामने से बडे-बाबू आते दिखाई दिये. वह घबराहट में लौटने की सोच ही रहा था कि बडे-बाबू की निगाह पड गई उसपर....

"क्यों रे? कुछ काम है? यहाँ क्यों खडा है? स्कूल को तो समय है न?"

ताबड़तोड़ पूछे गये प्रश्नों से हड़बड़ा गया वह और इसी हड़बड़ी में बोल गया;

"वो...मुझे प्रधान सर से मिलना है...."

बडे-बाबू सह्रदय मनुष्य थे. बच्चों से प्रेम से पेश आते हमेशा. किसी छात्र का यूँ अकेले प्रधानाचार्य से मिलने की बात ने उनके कुतूहल को जगा दिया....

"तो खडा क्यों है? चल आजा...", वे उसे हाथ पकड़ भीतर ले गए, "सर, इसे बात करना है आपसे..."

"कहो, क्या कहना चाहते हो?", प्रधान सर उसे संबोधित कर रहे थे. चुप रहने का कोई अर्थ न होता. वह बोला;

"सर, एक कविता सुनानी है....यदि समय हो आपके पास."

प्रधान सर को बालक के ढीठपन का कौतुक लग रहा था. उनकी स्कूल का एक छोटा सा छात्र उन्हें कविता सुनाना चाहता है, उत्सुक हो बोले;

"क्यों नहीं? सुनाओ..."

उसने अपनी रचना सुनाई. प्रधान सर अचरज से उसे निहारते रहे. उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था. इतनी कम उम्र का कोई बालक ऐसे संवेदनशील भाव न केवल रखता है, कविता भी बना लेता है उनपर!

"सच बताओ, तुमने लिखा है यह? बडा अच्छा लिखा है! मुझे सुनाने की जगह अपने हिंदी सर को देते इसे तो स्कूल की पत्रिका में स्थान मिल जाता. अब तो समय चला गया."

"सर, दी थी...", अपने बस्ते से प्रविष्टि वाला पर्चा निकाल कर प्रधान सर के सामने रखते हुए बोल रहा था वह, "पर वर्तनी की अशुद्धियों के चलते अस्वीकार हो गई."

प्रधान सर ने देखा, सचमुच काफी गलतियां थी उन पंक्तियों में. मन ही मन उन्होंने कुछ सोचा और बोले;

"ठीक है. इसे मेरे पास छोड़ जाओ और आगे कुछ लिखो तो पहले मुझे बताओ. अच्छा कहा है तुमने पर अशुद्धियां काफी हैं तुम्हारे लेखन में. इन्हें दूर करो. तुम्हारे शिक्षक ठीक कहते हैं."

उसके जाने के बाद उन्होंने बडे-बाबू से कहा;

"साहू सर, पुरोहित सर को (हिंदी-सर) मुझसे मिल लेने को कहो, शाम स्कूल छूटने के बाद....बल्कि ऐसा करो, शाम की मीटिंग की नोटिस घुमवा दो. सभी से बात हो जाएगी."

यह असामान्य बात थी. प्रधानाचार्य के मन में कुछ तो अवश्य चल रहा है. बडे-बाबू ने नोटिस जारी करवा दी और उत्कंठा से शाम की प्रतीक्षा करने लगे.

अपने नियत समय पर मीटिंग शुरू हुई. बिना कोई भूमिका बांधे प्रधान सर बोलने लगे;

"छात्रों को सिखाने से कहीं अधिक बडी जिम्मेदारी है हम शिक्षकों पर. केवल परीक्षाओं में मिले नंबर इस जिम्मेदारी का पैमाना नहीं हो सकते. मैं जानता हूँ आप सब अपने दायित्वों का भली-भांति निर्वहन कर रहे हैं. इस बात में संदेह की तनिक भी गुंजाइश नहीं है. पर आज कुछ ऐसा हुआ है कि मुझे यह मीटिंग बुलाना पडी."

उन्होंने सुबह की घटना सुनाई और कहने लगे;

"वर्तनी की अशुद्धियों को सुधारा जा सकता है. यह कहीं न कहीं हमारा भी दोष है जो हम अपेक्षाकृत सुधार नहीं कर पाए उनमें. इन अशुद्धियों का परिणाम अधिक से अधिक, मिलने वाले मार्क्स पर ही पड़ेगा पर उन अनुपम संवेदनाओं का क्या जो नंबरों के भय से कुचल जाएंगी? प्राथमिक-माध्यमिक कक्षाओं के छात्रों का वय आलोचनाओं को झेल पाने की सलाहियत नहीं रखता. वे हतोत्साहित होकर, संवेदनाओं से भी शून्य हो सकते हैं. मिलने वाले नंबरों की कीमत पर यह हानि आनेवाले समय में कहर बरपा सकती है. इतिहास रचने वाले कई महात्माओं, वैज्ञानिकों व आविष्कारकों के उदाहरण हमारे सामने हैं और नित्य बच्चों को बताते भी रहते हैं हम. शत-प्रतिशत नंबरों का लाभ नहीं यदि संवेदनशील न हो कोई! आप सभी से मेरी यही प्रार्थना है कि किसी भी मामले में यह बात याद रखनी है हम शिक्षकों को...."

मित्रों, यह कहानी नहीं है. वास्तविक जीवन में घटी इस घटना का साक्षी हूँ मैं. कल एक अत्यंत सम्मानित साहित्यकार द्वारा कविता रचने के संदर्भ में कही गई बात ने यह घटना स्मरण करा दी. कविता रचने में पिंगल व मात्राओं के ज्ञान से कहीं महत्वपूर्ण, संवेदनशीलता लगती है मुझे तो. संवेदनाओं की कीमत पर शुद्धता, महंगी लगती है.

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