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वॉर लेवी या युद्ध कर क्या होता है सोचा है आप ने ?

कुछ दिनों पहले एक छोटी पोस्ट लिखी थी जहां War Levy अर्थात युद्ध कर क्या होता है यह सवाल किया था । तथ्यपूर्ण जवाब ही मांगे थे, एक ही जवाब बिलकुल सही था – जकात ।

वस्तुत: वह पोस्ट की पार्श्वभूमि एक परिचर्चा थी जहां यह मुद्दा हमारे एक विद्वान मित्र ने बहुत सही ढंग से विशद किया था । मैंने बस यह नाम गढ़ा था कि यह तो एक अनवरत चलते युद्ध के लिए वॉर लेवी वसूली जा रही है, क्योंकि इस्लाम हमेशा मुसलमान को ‘नेशन ऑफ इस्लाम’ का नागरिक होने को बाध्य करता है और जिस मुल्क में रहता है वहाँ ‘नेशन ऑफ इस्लाम’ की हुकूमत स्थापित हो इसलिए जिहाद को प्रेरित कराते रहता है । तो चूंकि यह दारुल हर्ब है तो इस्लामनिष्ठों के लिए शत्रुभूमि ही हुई और स्थिति अनवरत युद्ध की ही है, तो जकात युद्ध कर या वॉर लेवी ही माना जाये । मौदूदी इस मामले में स्पष्ट हैं, अन्यों जैसे गोल घुमाकर बात नहीं करते । पाकिस्तान निर्मिति में भी इनका बड़ा ‘योगदान’ था।

व्यस्त हो गया तो इसपर पोस्ट लिखनी रह गई, आज यह हमारे मित्र की पोस्ट आई है जो साझा कर रहा हूँ । अधिकारी व्यक्ति हैं, पढ़कर समझ ही जाएँगे आप । मैं इस विषय पर न इस से अलग लिख सकता हूँ और न इस से बेहतर । पढ़िएगा, और अवश्य शेयर कीजिएगा।
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ज़कात
ज़कात: ना ग़रीब का हक़ है, ना दान है, बल्कि इस्लाम का स्थायी taxation system, कर तंत्र है।
क़ुरान की आयत 9.60- “ज़कात का पैसा ग़रीब व ज़रूरतमंद के लिए होता है, जो ज़कात इकट्ठा करते है व इसका हिसाब किताब रखते है इनके लिए है, काफ़िरों के दिल जीतने के लिए है, बंदी बनाए गए मुसलमान को छुड़ाने के लिए है, क़र्ज़ चुकाने के लिए है, जिहाद व जिहादियों के लिए है, व राहगीर के लिए है। ये अल्लाह का हुक्म है।अल्लाह बुद्धिमान है व सब जानता है।”
इस क़ुरान की आयत में ज़कात के अल्लाह द्वारा निर्धारित प्रयोग दिए गए है। अब हम इन निर्धारित प्रयोग की एक एक कर व्याख्या करेंगे।

ज़कात के प्रयोग:
1. ग़रीब व ज़रूरतमंद के लिए: केवल ये इस्तेमाल ही काफ़िरों को बताया जाता है। केवल इसी का प्रचार किया जाता है सार्वजनिक रूप से। यहाँ तक कि ज़कात शब्द का अनुवाद ही “ग़रीब का हक़” या “दान” किया जाता है, जबकि ये एक टैक्स है जो हर मुसलमान, अमीर या ग़रीब, को देना ही पड़ता है। व इसका उपयोग केवल मुसलमान के लिए ही हो सकता है।
Sayyid Abul A'la Mawdudi, Founder of Jamaat-e-Islami, in his book "Let Us Be Muslims" [1] writes: “Only Muslims are entitled to receive Zakah.”

2. जो ज़कात इकट्ठा करते है व इसका हिसाब किताब रखते है इनके लिए है। यानी अल्लाह जानता है कि जो लोग धर्म के काम में लगे है उनके अपने व्यक्तिगत ख़र्चे भी होते है, उनके परिवार भी होते है (जी अल्लाह अपने काम में लगे लोगों से ब्रह्मचारी व भिक्षुक बन कर रहने को नहीं कहता।)। अतः इस्लाम में धर्म के काम कर रहे लोगों को इकट्ठा हुए पैसे में से कुछ चुराने की आवश्यकता नहीं है, उनका इंतजाम अल्लाह ने ही कर दिया है।

3. काफ़िरों के दिल जीतने के लिए है। ज़कात का अल्लाह द्वारा बताया गया ये उपयोग सोचने लायक है। यानी कि काफ़िर नेताओ को ज़कात का पैसा देकर उन्हें इस्लाम का समर्थक बनाया जा सकता है, या इतना तो किया ही जा सकता है कि वे इस्लाम का विरोध ना करे। या फिर सीधे सीधे मुसलमान ही बन जाए। कही जगह ऐसा हुआ कि राजा को ही मुसलमान बना लिया गया इस विधि से, और फिर प्रजा मुसलमान हो गयी। अगर कल आपको पता चला के मर्कल के पास बहुत पैसा आ गया है व अन्य पश्चिमी नेता भी पैसे वाले हो गए है, आप आश्चर्य ना करे। इस उपयोग के तहत लव जिहादी को भी पैसा दिया जाता है व ताज़ा ताज़ा मुसलमान बने काफ़िर को भी दिया जाता है।
Sayyid Abul A'la Mawdudi, Founder of Jamaat-e-Islami, in his book "Let Us Be Muslims" writes on this use of Zakah:

“ये वो काफ़िर लोग है जिनकी सहायता चाहिए इस्लाम को, इनको पैसा दिया जाता है ताकि ये इस्लाम का समर्थन करे। या कम से कम विरोध तो ना ही करे। नए मुसलमान बने लोगों को भी ये पैसा दिया जाता है। मुसलमान बन जाने पर हो सकता है उनकी नौकरी छूट जाए या घर ही छूट जाए। यहाँ तक कि यदि नया बना मुसलमान पैसे वाला है तब भी उसे ये पैसा दिया जा सकता है ताकि उसे इस्लाम की कुव्वत व अमीरी का अहसास हो सके। हूनैन की लड़ाई के बाद मोहम्मद ने नए बने मुसलमानो को युद्ध में मिले लूट के माल ( war booty) में से इतना ज़्यादा हिस्सा दिया कि अंसार लोगों ने विरोध शुरू कर दिया। इस पर रसूल ने कहा,” ये लोग कुफ़्र त्याग कर अभी मुसलमान बने है। में इनके दिलो को ख़ुश करना चाहता हूँ।”(पृष्ठ स 235)

4. बंदी बनाए गए मुसलमान को छुड़ाने के लिए है। मुसलमान अगर काफ़िरों द्वारा बंदी बना लिए जाए तो ज़कात के पैसे से उनकी फिरोती दी जा सकती है। दंगे या आतंक के केस में फँसे मुसलमान का केस भी लड़ा जा सकता है, उसे छुड़ाने के लिए पुलिस को रिश्वत भी दी जा सकती है। कल अगर हमे पता चले कि Guantanamo Bay detention camp के क़ैदियों को छुड़ाने के लिए साउदी सरब ने अमरीकियों को पैसे दिए थे आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

5. क़र्ज़ चुकाने के लिए है। कोई मुसलमान काफ़िर के क़र्ज़ तले दब जाए तो उस का क़र्ज़ चुकता किया जा सकता है।

6. जिहाद व जिहादियों के लिए है। AK 47 ख़रीदी जा सकती है, RDX ख़रीदा जा सकता है, RDX उतरवाने वाले कस्टम अधिकारियों को रिश्वत दी जा सकती है। कसाब के लिए महँगे जुते ख़रीदे जा सकते है, व उसकी मौत पर उसके परिवार को आजीवन पेन्शन दी जा सकती है।

7. राहगीर पर ख़र्च की जा सकती है। पुराने ज़माने में राहगीर की सहायता पुण्य माना जाता था, इसलिए मोहम्मद ने भी उसकी इजाज़त दी।
ऊपर लिखे उपयोगों से साफ़ है कि ज़कात कोई दान नहीं है। और याद रखे कि ये उपयोग क़ुरान की आयत 9.60 में दिए गए है इसलिए अल्लाह का हुक्म है व कोई मुसलमान इन से इंकार नहीं कर सकता। ज़कात एक टैक्स है और इसके वही सारे उपयोग है जो एक सरकार टैक्स में मिले पैसे का करती है।
यानी ज़कात मुस्लिम नेताओं को मिलने वाला टैक्स है।

ये कथन कि ज़कात टैक्स है, दान नहीं, इस से भी सिद्ध होता है जो अबुल आला मौदुदी ने अपनी किताब “Let us be Muslims” में लिखा है:
“रसूल की मौत के बाद कुछ कबीलों ने ज़कात देने से मना कर दिया था। लेकिन पहले ख़लीफ अबू बकर ने उन पर उसी तरह युद्ध की घोषणा कर दी जैसे काफ़िरों के ख़िलाफ़ किया जाता है। यद्यपि उन्होंने नमाज़ नहीं छोड़ी थी, व अल्लाह व रसूल में भी आस्था ज्यों की त्यों थी। लेकिन अबू बकर ने कहा कि ये गल चुके अंग की तरह से है। इस्लाम एक सम्पूर्ण तंत्र है व ज़कात इसका सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। ज़कात के बिना नमाज़, रोज़े, व कलमा भी बेकार है।” (पृष्ठ 198)

अबुल आला मौदुदी आगे लिखते है: “ज़कात के लाभों का बखान असम्भव है। हम ज़कात देते है इसलिए हम मुसलमान है, इसीलिए इस्लाम है। जैसे कि मैंने ऊपर बताया है, ख़लीफ अबू बकर ने उन लोगों पर भी लड़ाई छेड दी जो नमाज़ पढ़ते थे, कलमा कहते थे, लेकिन ज़कात नहीं दे रहे थे। यहाँ तक कि रसूल के बाक़ी साथियों को इस पर संदेह था कि क्या मुसलमान के ख़िलाफ़ केवल ज़कात ना देने पर जंग की जा सकती है। लेकिन अबू बकर ने साफ़ किया कि “अल्लाह की क़सम, ये लोग जो ज़कात रसूल को दिया करते थे, अगर वो देने से मना करेंगे, चाहे वो ऊँट को बाँधने वाली रस्सी का एक टुकड़ा ही क्यूँ ना हो, तो मेरी तलवार का सामना करना होगा।”

(हदीस अबू दाऊद) अबू बकर के इस तर्क को रसूल के सभी साथियों (सलाफ) ने माना और वो अबू बकर के साथ खड़े हो गए। क़ुरान में भी साफ़ लिखा गया है कि ज़कात ना देने वाला मुसलमान मूर्तिपूजक ब जन्नत को नकारने वाले काफ़िर के बराबर ही है। (क़ुरान 41/6-7)” लानत है उन मूर्तिपूजकों पर व ज़कात ना देने वालों पर व जन्नत के अस्तित्व से इंकार करने वालों पर।”

तो भाइयों, ये महत्व है ज़कात का जो इस्लाम की इमारत को खड़ा किए हुए है। इसे सरकार द्वारा लगाए गए टैक्स की तरह मत समझो। ये उस से बहुत बढ़कर कर है। समझ लो कि इस्लाम नाम के शरीर में दोड़ने वाला ख़ून है ज़कात है। इसी से इस्लाम ज़िंदा है।”( पृष्ठ 204-205 व 214-215)

कोई भी ऐसा obligation, कार्य, जो अनिवार्य हो, व जिसके ऊपर लिखे उपयोग हो, वो एक टैक्स है, दान नहीं। ज़कात का अनुवाद “दान” या “ग़रीब का हक़” या “ग़रीब पर दया” करना सबसे बड़ा झूठ है, तकिया है, जो हर मुसलमान काफ़िर को बोलता है।

ज़कात इस्लाम का स्थायी टैक्स सिस्टम है व मुसलमान नेताओं को एक स्थायी आय का स्रोत है। मुसलमान नेताओं को ना चुनाव लड़ने की ज़रूरत है, ना चुनाव प्रचार की, ना सरकार बनाने की, उनके पास एक स्थायी टैक्स की आमदनी है जैसे सरकार में आयी पार्टी के पास होती है। उनका टैक्स सीधे क़ुरान द्वारा निर्धारित किया गया है याने अल्लाह का हुक्म है। और क्यूँकि उनके घर का ख़र्च भी ज़कात से ही चलता है, इसलिए उनके लिए ज़रूरी है कि इस्लाम क़ायम रहे, इस्लाम व मुसलमान की तरक़्क़ी हो। जितनी मुसलमान की तरक़्क़ी उतनी ज़्यादा ज़कात, व उतनी ज़्यादा मुसलमान नेता की ऐश व आमदनी। इस्लाम मुसलमान नेता की आजीवीका भी है व उसकी अमीरी का स्रोत भी है। और कोई भी ऐसा आंदोलन जिस से उसके नेताओं का व्यक्तिगत फ़ायदा भी हो कभी मरता नहीं है। ये इंसान की फ़ितरत है मनुष्य की प्रकृति है कि जिस से उसका घर चलता है वह उसकी रक्षा के लिए कुछ भी कर सकता है। ज़कात द्वारा मोहम्मद ने ऐसा ईंतजाम किया कि इस्लाम हमेशा फले फूले। मोहम्मद इंसान की प्रकृति को बहुत अच्छी तरह समझता था। आयत 9.60 एक तरह से क़ुरान व इस्लाम की आत्मा है।

फिर से अबुल आला मौदुदी को पढ़े:” तो मुसलमान भाइयों, ये महत्व है ज़कात का जो इस्लाम की इमारत को खड़ा किए हुए है। इसे सरकार द्वारा लगाए गए टैक्स की तरह मत समझो। ये उस से बहुत बढ़कर कर है। समझ लो कि इस्लाम नाम के शरीर में दोड़ने वाला ख़ून है ज़कात है। इसी से इस्लाम ज़िंदा है।”( पृष्ठ 215)

अगर आप ridda wars शब्द गूगल करेंगे तो आपको बताया जाएगा कि रिद्दा युद्ध अबू बकर ने उन लोगों के विरुद्ध लड़ा था जो रसूल की मौत के बाद इस्लाम छोड़ गए थे। लेकिन असल में उन लोगो ने इस्लाम नहीं छोडा था, केवल ज़कात देने से माना किया था। इस पर अबू बकर ने कहा कि ज़कात न देने वाला मुसलमान काफ़िर ही है और उसके साथ वही सलूख किया जाएगा जो एक काफ़िर के साथ किया जाता है।

और तब से इस्लाम का ये सबसे पक्का क़ानून बन गया। एक मुसलमान के सब गुनाह माफ़ हो सकते है लेकिन ज़कात ना देने का गुनाह माफ़ नहीं हो सकता है।

तो अब कभी आप सुने कि मुसलमान ज़कात नाम का दान दे रहा है तो समझ जाए कि वो असल में मुस्लिम समानांतर सरकार को टैक्स दे रहा है। जी, आपकी सरकार काफ़िर सरकार हो सकती है, लेकिन आपके देश में भी मुसलमान की अपनी एक समानांतर सरकार है जिसे वो टैक्स देना नहीं भूल सकता।
सरकार की सबसे बड़ी पहचान होती उसकी टैक्स लगाने की ताक़त। और मुसलमान नेताओं के पास ये ताक़त है, जिसे वो सेना खड़ी करने पर ख़र्च कर सकते है, काफ़िर नेताओं के साथ diplomacy पर ख़र्च कर सकते है, मुसलमान के कल्याण पर ख़र्च कर सकते है, व अपने ख़र्चो के लिए ख़र्च कर सकते है। यानी एक स्थायी सरकार के सारे लक्षण है मुसलमान नेताओ के पास। उनकी सरकार कभी नहीं गिरती।

और ये तकिया की ताक़त का नमूना है कि काफ़िर ज़कात को दया में दिया दान समझते है। अगर काफ़िर जीवित रहना चाहते है, अगर काफ़िर देश जीवित रहना चाहते है तो उन्हें ज़कात नाम इस समानांतर टैक्स सिस्टम के बारे में कुछ करना होगा। टैक्स लगाने की पावर केवल सरकार की होनी चाहिए किसी भी देश में, किसी धर्म के नेताओं को नहीं। वरना तो ये देश के अंदर देश का उदाहरण है। ज़कात इस्लाम की गले की नस है और जब तक ये नस सुरक्षित है तब तक इस्लाम रहेगा।
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