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2019 के लिए यह आप को ही करना होगा

जनता के प्रतिनिधियों से हिंदुओं की शिकायत रहती है कि वे काम नहीं करते । ये अर्धसत्य कहा जाना चाहिए। उनसे काम निकालने के तरीके होते हैं, खासकर तब जब वे हिन्दू राजनेता हो और वे भी हिंदुवादी पार्टियों से हो । इनसे अक्सर ये शिकायत रहती है कि वे मुसलमानों के काम तो कर देते हैं लेकिन हमारे काम नहीं करते जब कि उनका वोट तो इन्हें नहीं मिलता, हमारा वोट ही इन्हें जिताता है लेकिन ये हमारे कामों की ओर ध्यान नहीं देते ।

भाई ऐसा है कि मुसलमान भी इनके चुनाव क्षेत्र से होते हैं तो उनके काम भी इन्हें करना चाहिए, इनका कर्तव्य जो है । वे अपना काम किस तरह से निकालना है जानते हैं, उसकी बात करेंगे । पूरी यंत्रणा होती है । अगर सही कांटैक्ट पता नहीं तो वो अपनी मस्जिद में जाएगा। वहाँ से उसे अगली कड़ियाँ जुड़ जाएंगी और काम हो सकता है तो हो जाएगा । कोई टाइम खराब नहीं क्योंकि काम आगे ले जानेवाला हर व्यक्ति वह काम करवाने में मानता है । हाँ, जहां लेन देन का मामला होता है वहाँ दुनियादारी से कोई परहेज नहीं होता, ईमानदारी से दुनियादारी निभाई जाती है । बड़ा फर्क यही होता है कि कहीं झूठ नहीं बोला जाता, काम हो सकता है या नहीं उसके बारे में टोटल clarity रहती है । लोक प्रतिनिधि के पास या सरकारी दफ्तरों में वो जाएगा लेकिन पूरी तैयारी से, किसका नाम ले कर किस से मिलना है ये सब पता होगा । वहाँ भी कोई अपनावाला मिला तो उसके पास जाएगा, वो भी इसकी सहायता कर देगा । या अगर उसे ले जानेवाले लोग होंगे तो वे भी ऐसे लोग होंगे जिनकी बात टाली नहीं जाएगे, वजह कुछ भी हो ।

हिन्दू का मामला अलग होता है । कोई पक्का सूत्र नहीं होता, उसकी तलाश में ही सब से ज्यादा धक्के खाता है और पैसे भी गँवाता है । नेता जी से मुलाक़ात हुई तो भी अक्सर माइबाप अंदाज में । धक्के खिलाने में उसका समय बर्बाद करना नेताजी अपना अधिकार मानते हैं । अगर ये खीजकर कुछ बोले तो समझाया जाता है सही तरह से । चूंकि कोई पक्की यंत्रणा नहीं है, जिसके भी द्वारा कांटैक्ट बनाना चाहता है, वो हो सके उतना नोच लेता है । कभी अनभिज्ञ व्यक्ति को डराकर लेने के देने कराये जाते हैं । और हाँ, इसके काम या कागजात आदि सब सही होते हैं ऐसा भी नहीं होता ।

और कभी कभी वो जाता भी नहीं है लेकिन रूठी पत्नी के अंदाज में कहता जरूर है कि ये केवल वोट मांगने के समय आते हैं, बाकी हमारे साथ क्या हो रहा है इन्हें देखने की फुर्सत है ही कहाँ ?

अब आप समझिए वहाँ क्या सही है और आप के पास क्या गलत या कम । वहाँ एक यंत्रणा है । कुछ वेतनभोगी होते हैं या फिर अलग व्यवसायी भी होते हैं तो भी इस काम के लिए खुद का समय दे देते हैं क्योंकि उन्हें अपनी एकता की ताकत का पता है, उस एकता को अखंड रखने में अपनी भूमिका पता है और उसे वे अपना धार्मिक कर्तव्य मानते हैं । इसाइयों की भी सिस्टम होती है, वे भी अपना काम सही ढंग से निकालते हैं । उनके स्कूल में जो बच्चे होते हैं उनके अभिभावक कहाँ होते हैं यह उन्हें बराबर पता होता है । "अतिपरिचयात अवज्ञा" अच्छी तरह जानते हैं और अपने संपर्क सूत्र का किस तरह बखूबी इस्तेमाल करना होता है इसमें उन्हें महारत होती है । उपरसे आप को ऐसा भी लग सकता है कि आप को सेवा का मौका देकर उन्होने आप पर उपकार किया है।

हा, और एक बात - इन लोगों को अच्छी तरह पता होता है सरकारी योजनाओं का, कहाँ पर डिटेल्स मिलेंगे, क्या लाभ मिलता है, कौन लायक है - सब कुछ । आप को वेब साइट का URL भी पता है तो बड़ी बात होती है ।

हिन्दू के पास क्या है ? वैसे अगर पार्टी ऑफिस में लोग रहे जो ये शृंखला बनें तो बढ़िया रहेगा। नेता भले ही विरोधी पार्टी का हो, मतदाता की ओर ध्यान देना ही होता है । समस्या यही होती है कि किसी पक्ष के पास ये वेतनभोगी यंत्रणा है नहीं और ना ही किसी मंदिर के पास । और, मंदिर में कितने हिन्दू नियमित जाते हैं ? फिर इन लोगों का वेतन आए कहाँ से ? जकात थोड़े ही है हिन्दू की ?

कुल मिलाकर - सब कुछ मुफ्त में मांगने पाने की नीयत हो तो -- बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है ।

अपने एरिया में कुछ समय दीजिये या फिर ऐसे लोग चुनकर डेवलप करें जो यह जानकारी, संपर्क आदि करने में समय दे सकें । नेताओं से मेल जोल रखें । सब से बड़ी बात, दूसरे की कमाई से जलना छोड़ दें । ऐसी यंत्रणा बनेगी तो ही हम नेताओं से काम ले सकते हैं क्योंकि वे तो पहल करके आप के पास आने से रहे । बाकी मोदी जी अकेले कितना कहाँ तक करेंगे ? और अमर भी तो वे नहीं है। सिस्टम विकसित करनी ही होगी।

कुछ कहना है ? आप के भी कुछ अनुभव ? हाँ, यह पोस्ट शेयर - कॉपी - पेस्ट का अनुरोध तो रहेगा।

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