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हमारे प्यारे भारत देश को कभी किसी ज़माने में ‘सोने की चिड़िया’ कहा जाता था। इसी सोने की चिड़िया के लोभ में अँग्रेज़ लोग भारत आए थे और दो सौ वर्षों तक लगातार इस सोने की चिड़िया के ‘पर’ नोच-नोच कर इंग्लैंड की महारानी का खज़ाना भरते रहे। पूरी चिड़िया को बांडा-बुच्चा करने के बाद कम्बख्त उसे मरने को छोड़कर भाग गए। उस ज़माने में कई भारतीय लोग भी सोने की चिड़िया के ‘पर’ नोचने के लिए लालाइत रहते थे परंतु अँग्रेज साहब बहादुर के सामने उनकी एक नहीं चलती थी लिहाज़ा उन्हें मात्र सोने की चिड़िया की ‘बीट’ भर से ही काम चलाना पड़ता था। ज़्यादा से ज्यादा ‘पर’ उखाड़ने की प्रक्रिया के दौरान एखाद ‘रोम-रूआ’ इधर-उधर छिटककर गिर पड़े तो भारतीयों को उसी से खुश रहना पड़ता था।

कालान्तर में इस नुची-बुची चिड़िया को विराट स्वतंत्रता आन्दोलन चला कर मुक्त कर लिया गया। धीरे-धीरे चिड़िया स्वस्थ होती चली गई और आज इस का रूप-यौवन देखते ही बनता है।

अँग्रेज चले जरूर गये मगर कुछ खास किस्म के भारतीयों को ‘पर’ नोचने की कला सीखा गए। आजादी के बाद से इन खास भारतीयों ने अपनी उस सोने की चिड़िया को इस कदर नोचा-खसोटा है कि मत पूछिये। ‘पर-पंख’, यहाँ तक कि उसके ‘रोम-रोए’ तक नोच-नोच कर लोग अपनी तिजोरियाँ भरते जा रहे हैं। कई एक सोने के ‘परों’ को स्विस बैंक में छुपाकर रख रहे हैं तो कोई अपने घरों के संडासों, तहखानों, फर्श, रजाई-गद्दों में उन्हें छुपाए बैठा है। कुल जमा चार-पाँच इंसानों के छोटे से परिवार गगनचुंबी इमारतें तान रहे हैं तो कोई सोने-चाँदी की थालियों में खान-पान और हस्थ प्रच्छालन कर रहा है, कोई खालिस सोने के सिंहासनों पर बैठकर हुकूमत चला रहा है। चपरासियों-बाबुओं के घरों में तक इफरात सोने के ‘पख’ भरे पड़े हैं फिर खानदानी अफसरान, नेता, मंत्रियों की कोई क्या कहे! गरीब आदमी जब कभी आशा की नज़र से देखे, तो उसे चिड़िया के वे खून रिसते घाव दिखा दिए जाते हैं जो पंखों को बेदर्दी से नोचने, खसोटने से बन गए है।
कोई उन रिसते घावों पर मरहम लगा रहा है तो वो खास भारतीय, उसी पूरानी सठनीति से उस इंसान को मरहम भी नही लगाने दे रहे ।
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मैं किंकर्तव्यविमूड़ सा देख रही हूँ कि अगर ऐसी ही नुचाई चलती रही तो बेचारी चिड़िया कब तक जिंदा रहेगी?

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