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बच्चों का कसूर क्या था?
एटा के अलीगंज क्षेत्र में कल स्कूल बस और ट्रक के बीच हुई भीषण भिड़ंत में 12 बच्चों के मारे जाने की खबर बहुत मार्मिक और पीड़ादायक है ।वो मासूम बच्चे जिन्होंने अभी अपने जीवन के 15 वसंत भी नहीं देखे थे का इस प्रकार अकाल मृत्यु के गाल में समा जाना कुछ ऐसे प्रश्नों को जन्म देता है जिन का सही जवाब पिछले काफी दिनों से ढूंढा जा रहा है । इन सभी प्रश्नों की तह में जाने पर कुछ ऐसे तथ्य सामने निकल कर आते हैं जो यह बताते हैं कि ऐसी दुर्घटनाओं के लिए कोई और नहीं हम और आप ही जिम्मेदार है ।



प्रदेश के किसी भी जिले में खुले हुए निजी स्कूल हो या सड़कों पर मनमाने ढंग से दौड़ती हुई गाड़ियां यह सभी उन नागरिकों को ठेंगा दिखाती हुई प्रतीत होती हैं जो नियम और कानून का पालन करने में विश्वास रखते हैं । अलीगंज क्षेत्र की जिस स्कूल बस के साथ में दुर्घटना हुई उसमें क्षमता से अधिक बच्चे सवार थे । विद्यालय की जिलाधिकारी द्वारा छुट्टी करने के बावजूद भी विद्यालय खुला हुआ था ।
यह स्थिति तब है जब स्कूल बसों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश एकदम स्पष्ट हैं लेकिन इन पर प्रदेश में शायद ही कहीं अमल किया जाता हो ।
स्कूल बस को चलाने वाला वयस्क था । विद्यालय को छुट्टी वाले दिन खोलने का निर्णय लेने वाला व्यक्ति भी वयस्क था फिर इस दुर्घटना में मारे जाने वाले बच्चों की क्या गलती थी ?



सुनने में तो यहां तक आ रहा है कि स्कूल की बस सही ढंग से रजिस्टर्ड भी नहीं थी अगर यह भी सच है तो उसको सड़क पर उतरने की इजाजत कैसे मिल गई ? नो एंट्री जोन में ट्रक को जाने की इजाजत कैसे मिल गई ? स्कूल प्रबंधन के साथ-साथ परिवहन विभाग भी इस घटना के लिए बराबर का जिम्मेदार है । ऐसा नहीं है कि इस दुर्घटना की जिम्मेदारी स्कूल प्रबंधन और परिवहन विभाग पर डालकर हम पाक-साफ बचाते हैं हमारा खुद का रवैया भी इस दुर्घटना के पीछे एक बड़ा कारण है ।


ऐसे विद्यालय जो छुट्टी वाले दिन भी विद्यालय को खुला रखते हैं उनकी प्रतिष्ठा हमारी नजर में अन्य विद्यालयों से ज्यादा हो जाती है । बच्चों को स्कूल बस से स्कूल भेजना आवश्यकता नहीं आज हमारा स्टेट्स सिम्बल बन गया है । घर से 20 किलोमीटर दूर पढ़ने जाने वाले बच्चे सुबह 5:00 बजे उठते हैं और विद्यालय बंद होने के लगभग डेढ़ से 2 घंटे बाद घर आ पाते हैं ।


अपने अमूल्य समय को स्कूल बस में बिता देना क्या बच्चों के बचपन के साथ खिलवाड़ नही है ? जिन विद्यालयों में पढ़कर हम खुद आज समाज में अपना स्थान बना पाए हैं उन विद्यालयों में अपने बच्चों को पढ़ाना हमें आज शर्म का विषय लगता है इसे मैकाले शिक्षा नीति की सफलता नहीं तो और क्या कहेंगे कि हम अपने बच्चों को विद्यालयों में पढ़ा रहे हैं जिन विद्यालयों की नीतियों से हम स्वयं सहमत नहीं है

विचार_करिये_बचपन_को_जीने_दीजिये

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