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'हम जहाँ खड़े होते है लाइन वहीं से शुरू होती है.'...ये डायलॉग मारने वाले याद रखें की अमिताभ उस समय जेल में कैदियों की लाइन में खडे थे.

'राजकुमार' पहले एक्टर थे जिनके डायलॉग पर पब्लिक सिक्के फेंका करती थी..पर्दे पर. सलीम-जावेद के डायलॉग का युग आने के बहुत पहले से. अख्खड़ , सनकी और जिद्दी राजकुमार अपनी शर्तों पर ही जीते थे. रील लाइफ में भी और रिअल लाइफ में भी.

एक बार राजकुमार.. राजकपूर के घर पर थे. रात के समय पार्टी चल रही थी...दोनों बैठ के पी रहे थे.. बातें चल रही थी , तभी अचानक राजकुमार उठ कर जाने लगे. राजकपूर ने पूछा की.. 'क्या हुआ , अचानक कहाँ चल दिये.' जानी ने जवाब दिया..'मैं घर होकर आता हूँ.. मुझे टॉइलेट जाना है.' राजकपूर ने हैरानी से कहा.. टाय्लेट तो यहाँ भी है.. उसके लिये इतनी रात को इतनी दूर जाने की क्या जरुरत है ? राजकुमार का जवाब था.. 'राज साहब एक राजा.. दूसरे राजा के घर जाकर टॉइलेट नही कर सकता और अपनी कार लेकर निकल गये..फिर एक घंटे बाद वापिस आकर पीना शुरू.

गोविंदा के साथ एक फिल्म की थी राजकुमार ने..'जंगबाज'. इसमें एक सीन था जिसमे राजकुमार दुश्मनों को ख़त्म करने के लिये गोविंदा को अपने साथ काम करने के लिये बोलते है. वहाँ उनका पहले डायलॉग था.. 'तुम्हारे पास अक्ल है और मेरा पास पैसा है. हम दोनों साथ मिलकर काम करते है.' राजकुमार ने डायलॉग चेंज कर दिया.. ' तुम्हारे पास अक्ल है और मेरे पास अक्ल और पैसा दोनों है.' इतना ध्यान रहता था उनको अपनी इमेज का.

अपने मरने के बाद भी अपनी रहस्यमयी इमेज को बनाये रखना चाहते थे राजकुमार इसलिये अपने अंतिम संस्कार में भी किसी को बुलाने से मना कर गये थे अपने बच्चों को ताकि बिना विग वाले फोटो पब्लिक में ना जा सकें.

'चिनाय सेठ जिनके घर शीशे के होते है वो दूसरों पर पत्थर नही फेंका करते.'

और हाँ जिन लोगों को सभी फिल्म वाले नचनिये और भांड लगते है.. उनको इलाज की जरुरत है. फ़िल्मों को, गानों को आप अपनी जिंदगी से अलग नही कर सकते.. कम से कम भारत में तो नही. हाँ ये आप पर निर्भर है की आपकी पसंद क्या है.

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