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अधूरा प्यार.. (अंतिम भाग)

पहला भाग यहाँ पढ़ें - मेरा अधूरा प्यार मेरी यादें
दूसरा भाग यहाँ पढ़ें - मेरा अधूरा प्यार मेरी यादें भाग-2

मुलाकातो का सिलसिला मुसलसल जारी था। Morning walk के बहाने से ...लायंस क्लब के कल्चरल प्रोग्रामो के दौरान ...कभी दुर्गा पूजा पंडालो मे..तो कभी विक्टोरिया मेमोरियल पर। तब तक हम दोनो को दो तीन काॅमन मित्र ऐसे बन चुके थे जो उन हालात मे एक दूसरे का संदेश हमारे तक पहुंचा देते थे यदि हम किसी वजह से सीधे संपर्क मे नही हो पाते थे। उसने अपनी तीन चार तस्वीरे मुझे दी थी जिन्हे सारे दिन मे बीसीयो बार निहारा करता था।

आज के प्रेमी जोडे बीस साल पहले के उस दौर की एक समस्या का अहसास शायद न कर सके । तब मोबाइल नही होते थे । सिर्फ लैंडलाइन का ही सहारा था ...और जब उस पर फोन करते थे तो चार पांच बार मे कहीं एक बार ऐसा संयोग बैठता था कि वो फोन उठाती थी। कई बार ऐसा भी हुआ कि ...कही मिलने का प्रोग्राम तय कर लिया ...वक्त भी तय हो गया। लडका होने के नाते मै तो टाईम से पंहुच जाता था.. क्योकि मुझपर इतने बंधन नही थे । मगर कई बार वो ...वादा करके भी नही आ पाती थी। घर मे काम निकल आता था ...मम्मी नही जाने देती थी ...ऐन वक्त पर पापा या भाई रोक लेते थे । अब इन हालात मे...यदि मै गद्दी से निकल चुका होऊ तो उसके पास मुझे संदेश भेजने का कोई तरीका नही होता था कि आज मिलने का प्रोग्राम कैंसिल है।..और मै ....नियत जगह पर घंटो घंटो इंतज़ार करता रह जाता था...ll चार चार पांच पांच घंटो का इंतजार जाने कितनी ही बार किया ....और सच कहूं तो कलकत्ते की चिपचिपी गर्मी मे पसीना बहाते हुए उसके आने का इंतजार करने का भी अपना ही आनंद था...।।

इन ढाई सालो के दौरान मैने हर मुलाकात मे एक नियम का पालन जरूर किया ...जो मैने उसे शुरुआती दिनो मे ही बता दिया था । वो ये कि.. मुलाकातो के दौरान होने वाले खर्च को हमेशा मैने वहन किया । चाहे ठेले पर फुचके (गोलगप्पे) खाये हो ...चाहे किसी फैंसी रेस्टोरेंट मे गये हो ...चाहे वो निको पार्क मे झूलो पर झूले हो.. .चाहे मूवी गये हो...या फिर टैक्सी का भाडा भरा हो। वो खर्च चाहे दस रूपये हुए हो या दो सौ(उस जमाने मे दो सौ बहुत होते थे) ...मुझे कभी ये मंजूर नही था कि वो एक पैसा भी खर्च करे। ये शायद मेरी मेल इगो ही थी.. कि पैसा खर्च करना मर्द का काम होता है ll और मेरे इस अहम का मनीषा ने सदैव एहतराम किया। उसके पर्स मे मेरी जेब से अधिक रूपये होते थे मगर उसने कभी भी मुझपर अमीरी का मुजाहिरा नही किया ll कई बार सिर्फ मेरी खुशी के लिए वो कभी आईसक्रीम .. कभी भेलपूरी ..कभी झाल मुढी ..खाने की फरमाईश करती थी । वो जानती थी कि उसपर खर्च करके मुझे कितना सुकून मिलता है और ये खुशी मुझे देने मे उसने कभी कंजूसी नही की । जहां तक मेरी माली हालत का सवाल था तो मै भैया द्वारा मुझे दिये जानेवाले पाकेटमनी और पढाई खर्च मे थोडी बहुत हेरा फेरी कर लेता था ...कभी कभी गद्दी के सहनिवासी मित्र भी मदद कर देते थे । काम चल जाता था..

कहते है इश्क और मुश्क छिपाये नही छिपते। मनीषा की मम्मी को भी पता लगा आखिर ..ll उसकी मेड ने हमे एक बार साथ देख लिया था और उनको बता दिया । फिर मम्मी ने उसकी बहुत पिटाई की थी...lll इधर भैया और मुजफ्फरपुर मे बाकी घरवालो को भी गद्दी के दोस्तो से इस कहानी का पता चल गया। बाऊजी और भइया लोगो ने तो इस ओर विशेष ध्यान नही दिया मगर जब मै छुट्टियो मे मुजफ्फरपुर गया तो मां ने जरूर सारी बात पूछी । मां को तसल्ली ये जानकर हो गई कि लडकी मारवाडी है ....सुंदर है ...अमीर परिवार से है। तो मां ने मुझसे यही कहा कि यदि उसके परिवार वाले भी राजी हो तो ऐतराज की कही कोई वजह ही नही है ...lll

मनीषा की मम्मी को शायद इतना अंदाज नही था कि उनकी लडकी इस राह पर बहुत आगे बढ चुकी है । उन्होने इसे युवा होती लडकी का बचपना ही समझा। थोडे दिनो की सख्ती के बाद बात आई गई सी हो गई। और हमारे मिलने जुलने का सिलसिला ..कभी कम तो कभी ज्यादा चलता रहा ...lll प्यार का पौधा निरंतर फल फूल रहा था । हमने आपस मे निश्चय कर लिया था एक दो साल बाद घरवालो को सबकुछ बता देगे। और हमे ये भी पूरा यकीन था कि उनके न मानने की कोई वजह भी नही हो सकती । दोनो परिवार मारवाडी थे ...अमीर..सभ्रांत और प्रतिष्ठित थे ..लडकी सुंदर थी पढी लिखी थी ..मै भी दिखने मे ठीकठाक था ...कोई ऐब नही था ll यानि फिल्मी मोहब्बत की तरह हमारे मामले मे जाति धर्म हैसियत रूतबा या आपसी दुश्मनी जैसी कोई अडचन नही थी । ये तो वो चमन था जहा सिर्फ बहार ही आ सकती थी ...खिजां की रूत के लिए तो कोई गुंजाइश ही नही थी । हमारी मासूमियत और यकीन की इंतहा ये थी कि हमने तो ये तक डिसाईड कर लिया था हमारे तीन बच्चे होगे...ll दो लडके और एक लडकी ...ll आज अपनी मासूमियत को याद करके खुद ही शर्मा जाता हू कि कैसे हम अपने परिवार की प्लानिंग कर रहे थे..ll मै तीन बच्चे चाहता था मगर वो तीसरे बच्चे क लिए राजी नही थी .।। काफी झगडे के बाद आखिर उसे मेरी जिद के आगे झुकना पडा..ll हमने तो तीनो बच्चो के नाम तक सोच लिए थे....गौरव...सौरव ...निकिता ...ll

ढाई साल का वक्फा मानो पंख लगाकर उड गया।चारो ओर फूल ही फूल खिले थे..ll जीवन मानो ऐसा चमन थी जहां सिर्फ बहारो की रूत ही आती है। यूं लगता था मानो धरती पर जन्म लेने की वजह मिल गई हो..ll

..मगर अब सपनो के आशियाने पर आखिर बिजलियो का कहर गिरने का वक्त भी आ चुका था...।।

अब बारी आती है उस वजह को बयां करने की जिसकी वजह से एक गुंचा ...गुल बनने से रह गया । इसकी पृष्ठभूमि मे है मेरे परिवार की संरचना ...lll दरअसल मेरा परिवार एक बेहद बडा संयुक्त परिवार था। मेरे पिता की दो शादियां हुई थी और हम कुल दस भाई बहन थे जिसमे मै नवे नंबर पर था। मेरी बडी मां (बाऊजी की पहली पत्नी) की एक दुर्घटना मे जब मृत्यु हुई तब बाऊजी सिर्फ 31 के थे और 13 साल के वैवाहिक जीवन मे चार लडको और दो लडकियो के पिता बन चुके थे। फिर मेरी जननी मां से उनका विवाह हुआ जिससे पहले दो लडकिया ...फिर मै ...और फिर मेरा छोटा भाई इस दुनिया मे आये। मेरे सौतेले भाई बहनो और मेरी उम्र मे बहुत अंतर था । उनमे मेरा जो सबसे बडा भाई था वो मुझसे 21 साल बडा और जो सबसे छोटा भाई था वो भी मुझसे 11 साल बडे थे । और जिस दौरान मै किशोरावस्था पार कर रहा था ...बाऊजी बुढापे की ओर अग्रसर हो चुके थे ।

परिवार मे धन संपत्ति की कोई कमी नही थी। पुश्तैनी जायदाद बहुत थी । तेल मिल...बगीचा...हवेलीनुमा मकान ....और प्राईम लोकेशन पर तीन चार बडे बडे प्लाट। फलता फूलता कारोबार था । मुजफ्फरपुर ...रांची और कलकत्ता मे ब्रांचे थी । तीन ट्रक चलते थे ...15-16 कर्मचारी थे । परिवार मे एकता थी और सौतेलेपन का कथित फर्क दूर दूर तक नही था। 1995 तक तीन बहनो और चारो बडे भाईयो का विवाह हो चुका था। मुझसे बडीवाली बहन ...मै और मेरा छोटा भाई अभी अनमैरेड थे। बस इसी दौरान हमारे घर मे भाभियो मे मनमुटाव होना शुरू हो गया ....जो कालांतर मे आखिर भाईयो के बीच फूट की वजह बना । घर मे झगडे होने लगे ।बात बंटवारे तक पंहुची मगर भाईयो और बाऊजी मे बंटवारे के तरीके को लैकर कभी सहमति नही बनी । मामला कोर्ट कचहरी तक गया ...

उस समय सारा कारोबार भाईयो के हाथ मे ही था । बाऊजी रिटायर जैसा जीवन जी रहे थे ...मै और मेरा छोटा भाई अभी अपने पांव पर खडे नही थे । ऐसे मे सभी भाईयो ने अपने अपने काबू मे जो भी कारोबार और लिक्विड धन था वो दबा लिया । अचल संपत्ति का मुकदमा कचहरी मे लंबित हो गया । खडे पैर मै और मेरा भाई मानो सडक पर आ गये। अनुभवहीन कंधो पर थके पिता ...दुखी मां और युवा बहन की जिम्मेदारी आ गई। जमा पूंजी के नाम पर मां ने जो कुछ जोड रखा था बस वही था ।

साहबान...अब यहां से मेरे संघर्ष की कहानी शुरू होती है जिसमे ..चाय के खोखो पर एक एक किलो चाय बेचने से लेकर आज के एक मकबूल कारोबारी फर्म का मालिक बनने तक की कहानी है और जिसका यहां तफसील से वर्णन करने का कोई मायने नही । बस ये समझ ले कि उस समय जीवन एक ऐसे मोड पर था जहां से कुछ समझ नही आ रहा था कि किधर मुडना है ? भविष्य बिल्कुल अंधकारमय नजर आ रहा था। ये तक नही मालूम था कि कल को किसी के पास 1000-1500 की नौकरी करनी पड सकती है या फुटपाथ पर सब्जी का ठेला लगाना पड सकता है...ll इन कठिन हालात मे जब मै मुजफ्फरपुर जाकर जीवन की उलझी हुई गांठो का सुलझाने की जद्दोजहद कर रहा था....कभी-कभार मनीषा से पीसीओ के फोन से बाते हो जाती थी । इसी दौरान उसने बताया कि उसके लिए एक रिश्ता आया है और अब हमे उसके घरवालो के सामने शादी की बात करने का वक्त आ चुका है ।

शादी...!!! मनीषा से..!!

हालात बदल चुके थे । मेरी परिस्थिति उस समय मनीषा जैसी अमीर परिवार की लडकी से शादी से तो दूर ...बल्कि शादी की नही थी। खुद के पैरो के नीचे ही जमीन नही थी तो अपनी मोहब्बत के लिए आशियां कहां बनाता..!!! मैने मन ही मन रोते हुए... एक आखिरी बार कलकत्ता जाकर इस कहानी को बेदर्दी से खत्म करने का फैसला कर लिया।

वक्त निकालकर कलकत्ता गया और फिर...उससे आखिरी मुलाकात हुई। अजीब संयोग ये बना था कि वो आखिरी मुलाकात भी 20 जनवरी को ही हुई..और निको पार्क मे ही हुई ...साल था 1999..lll हमारी पहली मुलाकात के ठीक तीन साल बाद ।।

एक तन्हा कोने मे बैठकर मैने उसे सारी परिस्थिति समझाई और कहा कि वो घरवालो की मर्जी से ही शादी कर ले। इतना सुनते ही वो अवाक रह गई... उसके आंखो से गंगा जमना बह निकली ...।।मै हलांकि अपना दिल कडा करके आया था मगर उसे रोते देखकर मै भी रोने लगा ..ll दोनो एक दूसरे के आंसू पोछते और हिचकियो मे बाते करते रहे ..lll बातो के दौरान उसने मेरे साथ भाग चलने से लेकर .... अगले कई सालो तक मेरा इंतज़ार करने और यहां तक अपने घरवालो से बगावत तक करने के भी सुझाव दिये..lll मगर मै इन सबमे किसी बात के लिए भी तैयार नही था । मेरे संस्कार इसकी इजाजत बिल्कुल नही देते थे कि हम अपने घरवालो को समाज मे रूसवा कर दे...ll और मेरी अपनी जिंदगी के बारे मुझे कोई इल्म नही था कि मेरे हालात कब सुधरेगे...!! सुधरेगे भी या नही...।। मुझपर तो वक्त ने कहर नाजिल किया ही था मगर राह की ठोकरो मे उसे हमराही बनाना मुझे किसी कीमत पर कबूल नही था ।

अगले दो ढाई घंटे तक बडी मुश्किल से उसे समझा पाया कि मुकद्दर ने हमारा साथ बस इतना ही लिखा था और ये हमारी आखिरी मुलाकात थी...ll वो बार बार मुझसे लिपटकर रोती रही ...मै उसे समझाता रहा..lll आखिरकार उसे अपनी कसम देकर मैने उसे घर वापस भेजा...l मुझसे विदा लेकर जाते हुए जब मैने उसे आखिरी बार देखा ...तब उसके चेहरे पर उस मासूम बकरी जैसे भाव थे जो जिबह होने जा रही है...। आंखो मे मेरे लिए हजारो शिकायते थी तो बेहिसाब मोहब्बत भी...ll

वो चली गई..ll मै भीगी आंखो से दूर तक उसे जाता तबतक देखता रहा जबतक वो ओझल न हो गई। बैठा बैठा रोता रहा । फिर अगले आधे घंटे मै पागलो की तरह मै निको पार्क हर हिस्से मे घूमता रहा जहां उसके साथ मिलकर कभी सुनहरे भविष्य के ख्वाब बुने थे...lll उसी रात की गाडी से फिर मुजफ्फरपुर लौट गया। तब कलकत्ते को ही नही ... कुछ अधूरे सपनो को भी हमेशा के लिए पीछे छोड़कर..

साहबान...ये थी मेरे अधूरे प्यार की कहानी । आज सोचता हूं कि इसे अधूरा कहना भी शायद मुनासिब नही होगा । एक कली खिलती है ...मगर यदि फूल बनने के पहले ही बागबां उसे तोड ले तो क्या वो अधूरी रह गई.? कली तो जितनी खिली उतना वजूद ही मुकम्मल था..ll कली को अधूरा फूल कहना तो ठीक नही है। मेरा प्यार भी एक खूबसूरत कली की तरह खिला ...बस फूल बनने से पहले तूफां की नजर हो गया ...मगर जब तक उसका वजूद था उसके हुस्न और खुश्बू मे कभी कमी नही थी...

वैसे अभी आंखे फिर से भीगी है मेरी...

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