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हिन्दू युवा वाहिनी समेत अनेक संगठन गायों के संरक्षण को लेकर गंभीर रहे हैं। खास तौर से यूपी में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार बनने के बाद इस दिशा में और बेहतर काम हो रहे हैं। आदित्यनाथ के स्वयं हिन्दू युवा वाहिनी के संरक्षक होने के नाते यह गंभीरता स्वाभाविक भी है। लेकिन गो गंगा गायत्री के संरक्षण की बात करने वाले कार्यकर्ताओं को यह समझना होगा कि महज गगनभेदी नारे लगाकर यह मकसद पूरा नही होगा। इसे व्यवहारिक रूप देना होगा। अहंकार और दूसरों को डराकर अपनी बात मनवाने की प्रवृत्ति त्याग मिशन समझकर इसके पीछे लगना होगा। 

जहां तक गौ माता के संरक्षण की बात है तो गायों का कत्ल सिर्फ कसाइयों के हाथों नही होता, उनकी असमय मौतों के कहीं न कहीं हम भी जिम्मेदार हैं। लोगों को गाय पालने का शौक तो होता है लेकिन उसके चारे का बंदोबस्त खुद न कर उसे सड़कों पर खुला छोड़ दिया जाता है। ऐसा करने वाले सिर्फ गाय क दूध से मतलब रखते हैं। होता ये है कि सड़क किनारे पॉलीथीन में रखकर फेंके गये खाद्य पदार्थों, ठेलों पर रखी सब्जियों को गायें अपना निवाला बनाती हैं, निवाले के चक्कर में पॉलीथीन भी उनके भोजन का हिस्सा बन जाता है। चूंकि यह बाहर नही निकल पाता, पेट में धीरे धीरे करके इकट्ठा हो जाता है और गायें असमय मौत का शिकार हो जाती हैं। लोग इसे स्वाभाविक मान लेते हैं जबकि सच्चाई यह है कि उत्तर प्रदेश में प्रतिदिन दर्जनों गायों का पोस्टमार्टम होता है उनके पेट से पाॅलीथीन जस का तस निकलता हे। पता चलता है यही पॉलीथीन उनकी मौत का कारण बना। बेजुबान गायों का क्या कसूर, उन्हे क्या मालूम निवाले के चक्कर में जहर निगलना पड़ रहा है। दरअसल कसूरवार हम हैं जो खाद्य पदार्थों को पाॅलीथीन में डालकर सड़कों और चैराहों पर फेंक देते है। इसलिये जितने जिम्मेदार पशुपालक हैं उससे कम जिम्मेदार हम भी नही हैं।

हालांकि उत्तर प्रदेश में एनवायरमेंट प्रोटेक्शन एक्ट, 2003 के तहत पॉलीथिन पर रोक लगा दी गई है। हालांकि यह महज कागजों तक सिमट कर रह गया। लेकिन पर्यावरण और सेहत के लिहाज से यह काफी अच्छा कदम है। क्योंकि पॉलीथिन बहुत नुकसानदेह है। वर्तमान में इसका वार्षिक वैश्विक उत्पादन 8 करोड़ टन है। इसका मुख्य उपयोग पैकेजिंग में होता है। यह बायोडिग्रेडेबल नहीं होने के कारण पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है। इसमें केवल 20 माइक्रोन से कम और 20 गुणा 30 वर्ग सेमी साइज से कम की पॉलीथिन प्रतिबंधित है। रंगीन पॉलीथिन को रिसाइकिल करने में पर्यावरण को खतरा होता है इसलिए इस पर भी प्रतिबंध है। वहीं खाने का सामान ले जाने के लिए पॉलीथिन बैग पर पूरी तरह प्रतिबंध है।

पॉलीथिन कचरे से देश में प्रतिवर्ष लाखों पशु-पक्षी मौत का ग्रास बन रहे हैं। लोगों में तरह-तरह की बीमारियां फैल रही हैं, जमीन की उर्वरा शक्ति नष्ट हो रही है तथा भूगर्भीय जलस्रोत दूषित हो रहे हैं। प्लास्टिक के ज्यादा संपर्क में रहने से लोगों के खून में थेलेट्स की मात्रा बढ़ जाती है। इससे गर्भवती महिलाओं के गर्भ में पल रहे शिशु का विकास रुक जाता है और प्रजनन अंगों को नुकसान पहुंचता है। प्लास्टिक उत्पादों में प्रयोग होने वाला बिस्फेनॉल रसायन शरीर में डायबिटीज व लिवर एंजाइम को असामान्य कर देता है। विषेशज्ञों का कहना है कि पॉलीथीन कचरा जलाने से कार्बन डाईऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड एवं डाईऑक्सीन्स जैसी विषैली गैसें उत्सर्जित होती हैं। इनसे सांस, त्वचा आदि की बीमारियां होने की आशंका बढ़ जाती है।

पर्यावरण विशेषज्ञ रवि अग्रवाल के अनुसार, प्लास्टिक कचरे के जमीन में दबने की वजह से वर्षा जल का भूमि में संचरण नहीं हो पाता। परिणामस्वरूप भूजल स्तर गिरने लगता है। नेशनल फिजिकल लैबोरेट्री के वैज्ञानिक विक्रम सोनी के अनुसार, प्लास्टिक कचरा प्राकृतिक चक्र में नहीं जा पाता, जिससे पूरा पर्यावरण चक्र अवरुद्ध हो जाता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. एसके निगम का कहना है कि पॉलीथिन पेट्रो-केमिकल उत्पाद है, जिसमें हानिकारक रसायनों का इस्तेमाल होता है। रंगीन पॉलीथिन मुख्यतः लेड, ब्लैक कार्बन, क्रोमियम, कॉपर आदि के महीन कणों से बनता है, जो जीव-जंतुओं व मनुष्यों सभी के स्वास्थ्य के लिए घातक है। पर्यावरण विशेषज्ञ चंदर कुमार सिंह कहते हैं कि मोटी पॉलीथिन में कार्बन और हाइड्रोजन की विशेष यूनिट होती है। यह ऐसा रसायनिक जोड़ है, जो टूट नहीं सकता। यही कारण है कि मोटा पॉलीथिन सड़ता नहीं है। उत्तर प्रदेश सरकार को पॉलीथीन पर लगा प्रतिबंध सख्ती से लागू करना चाहिये। साथ ही हिन्दू युवा वाहिनी समेत कई अन्य संगठन जो गायों के संरक्षण को लेकर गंभीर हैं उन्हे अभियान चलाकर पशुपालकों और पौलीथीन में कूड़ा रखकर फेंकने वालों को जागरूक करना चोहिये। ऐसा करके हम बेजुबानों को असमय मौतों से बचायेंगे साथ ही अपना परिवेश भी प्रदूषण से मुक्त होगा। 

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