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वन्स अपॉन अ टाइम इन लखनऊ
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कल शाम जब पूरा देश भारत इंग्लैंड के मैच के रोमांच में सराबोर था, तब लखनऊ में कहीं एक बंगले में एक औरत बेहद उदास, हताश, निराश बैठी हुई थी... शराब के तीन पैग गटक चुकी थी और चौथा पैग बनाकर बैठी थी.. उसकी आँखें सूजी हुई थी... रो रोकर आँखें लाल हो चुकी थी... इस सर्द मौसम में भी उसके घर का माहौल बेहद गर्म था... उसके सामने उसके कुछ बेहद ख़ास कोई 3-4 लोग बैठे थे... चेहरे पर उनके भी हवाईयां उड़ रही थी क्योंकि ऐसा रूप उन्होंने पहले कभी देखा नहीं था..

डरे सहमे से वो लोग कभी उस औरत को देखते तो कभी घड़ी की तरफ देखते क्योंकि समय मानों थम सा गया था...

तभी उसने अपनी भर्राई हुई आवाज़ में कहा - एक दिन.. सिर्फ एक दिन ही तो सजती थी मैं... बहुत खुश रहती थी आज के दिन मैं.. आज ही के दिन मैं लिपिस्टिक, पौडर लगाती थी... नाक में नथनी, कानों में झुमके पहनती थी.. सज सँवरकर, अच्छे से तैयार होकर, पर्स हाथ में लेकर, इठलाती हुई निकलती थी.. आज ही के दिन मैं बहुत खूबसूरत दिखती थी... लेकिन.. लेकिन..

.... बोलते.. बोलते उसका गला रुंध गया... शब्द मुँह से बाहर आना चाह रहे थे.. लेकिन ऐसा लग रहा था मानों किसी ने शब्दों को बेड़ियों से जकड़ दिया था...

एक गहरी साँस लेकर बोली... तुम बताओ.. क्या दलित के घर में पैदा होना गुनाह है... क्या मुझे खुशियाँ मनाने का कोई हक़ नही.. इतना सब करने के लिए मैंने क्या क्या किया है, पता है तुम्हें...

जी... जी... बहनजी... आप इतना निराश न होईये.. भगवान के घर देर है अंधेर नहीं.. उनमें से एक बन्दे ने कहा..

अरे क्या निराश न होऊं... वो इत्ता बड़ा केक.. वो करोड़ों रुपये के नोटों का हार... तुम्हें एहसास नहीं है कि कितनी खुश रहती थी आज के दिन मैं... इतने बरसों तक लोगों को बेवकूफ़ बनाया मैंने... सब तरफ़ खुद की मूर्तियाँ लगवाईं.. जनता का पैसा पानी की तरह पैसा बहाया मैंने.. अपने भाईयों.. रिश्तेदारों... तुम सबको फ़र्श से अर्श पर लाकर बिठा दिया मैंने... लेकिन वो..दढ़ियल.. साला सब छीन ले गया... उधर मेरे जैसी शकल सूरत वाली ही बंगाल में मेरी एक और बहन... वो भी बड़ी परेशान है.. विदेश से आई वो बहू... दिल्ली में बैठा वो सर्किट... सब परेशान हैं.. सबने कहा उस दढ़ियल से ये फ़ैसला वापस ले लो.. वापस ले लो... लेकिन नहीं माना... और इस देश की जनता को भी जाने क्या साँप सूँघ गया है.. दीवानी हुई जा रही है उसकी... मरे जा रही है उसके लिए... उसकी किसी भी बात का विरोध ही नहीं करती...

इस दौरान दो पैग और अंदर जा चुके थे... फिर वो बोली.. देखना एक दिन मैं इस देश की परधानमंत्री बनूँगी... तब ब... ब... बताऊँगी उ.. उ... उसको... बोलते बोलते वो निढाल होकर सोफ़े पर गिर पड़ी... गिलास हाथ से छूट गया..

तब जाकर बाक़ी लोगों की जान में जान आई... उसे वहीँ सुलाकर.. कम्बल, रज़ाई ओढ़ाकर बंगले से बाहर निकले.. खुद के लिये दो बोतलें खरीदीं, जाम टकराते हुए बोले... आप भले ही न मनाओ अपना जनमदिन.... हम तो मनाएंगे... पहली बार हमें पैसों का बंदोबस्त नहीं करना पड़ा और ना ही गालियाँ सुननी पड़ी... चीयर्स...

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