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"तुम उन्हें दयालु कहती हो? किसी की परीक्षा लेने के लिए, उसे अपने बेटे को, सिंह का भक्ष्य बनाने के लिए कहने वाले तेरे हरि 'दयालु' नहीं, क्रूर लगते हैं!"

मेरी दादी अक्सर देवी-देवताओं, भक्त-भगवान और साधु-संतों व प्रजावत्सल राजा-महाराजाओं की ऐतिहासिक-पौराणिक कहानियां सुनाया करती थी मुझे. निरक्षर थी. अपने बचपन की सुनी कथाओं से लेकर तो विवाहोपरांत दादाजी से सुनी, पुजारी जी से सुनी और भागवत-कथा में सुनी कहानियों का ज़ख़ीरा था उसके पास!

"तू जब दस महीनों का भी न था, मैं ले आई थी तुझे अपने संग गांव में....", अक्सर बताया करती मुझे! कक्षा चौथी तक, यानी दस वर्षों की उम्र तक, अपनी दादी के पास रहा मैं, गांव में.

राजा मोरध्वज की कथा सुना रही थी तो बालसुलभ जिज्ञासा से पूछ लिया था मैंने उपरोक्त प्रश्न! उस समय तो कुछ समझ नहीं आता था, पर अब कुछ-कुछ समझ आने लगा है मुझे....

"बेटा, कसौटी जितनी कठिन होगी उतना ही निखार आता है!"

सचमुच कितना सही कहती थी वह....

बालकों की जिज्ञासा कभी शांत नहीं होती! किसी प्रश्न का उत्तर मिलते ही, दूसरा कुलबुलाने लगता है मन में....

"अच्छा माँ, वैसे तेरे हिसाब से सबसे दयालु कौनसे भगवान हैं? ऐसे, जो कभी किसी की न तो परीक्षा लेते हैं, ना दुख ही दिया करते हैं!"

मैं अपनी दादी को ही माँ समझता और कहा भी करता था. पहले प्रश्न का समाधान होते ही दूसरा आ गया मेरे मन में....

वह हँस पडी. ठेठ देहाती परीवेश की रहने वाली मेरी दादी के दाँत, कम उम्र में ही गिर पड़े थे. उसका पोपला मुख बड़ा अच्छा लगता, हम सारे भाई बहनों को! एकबार उसके कंधे और गले में पीछे की ओर से अपनी बाँहें डाल, झूलते हुए मैंने अपना गाल उसके गाल से सटा दिया तो वह हँसकर मुझे नीचे उतरने के लिए कहने लगी. उसके पोपले मुख की आवाज से उत्पन्न कंपन ने, मेरे सटे हुए गाल में गुदगुदी कर दी. इस रोमांचक अनुभूति को आज भी महसूस तो कर सकता हूँ, शब्दों में नहीं बता सकता! मैंने अपना यह अनुभव छोटे भाई-बहनों से भी शेयर किया. अब रोज, कोई न कोई, अपना गाल उसके गाल से सटाता और उससे कुछ बोलने के लिए कहता. यह खेल हो गया था हम सबका. यह मजा इतना फेमस हुआ घर में कि एक दिन मेरे पिता भी बाध्य हो गए इसे उठाने को!

माफ करना! मैं कहीं और ही निकल लिया....

मेरे प्रश्न को सुन हँसते हुए बोली वह;

"हाँ हैं न! एक भगवान बडे दयालु हैं....सब भगवानों में सबसे अधिक दयालु!!", दादी अनपढ़ थीं और मैं बालक....'एक ईश्वर' की अवधारणा से निपट अंजान!! कहने लगी, "चल, आज उन्हीं के बारे में बताती हूँ......एक, भगवान महादेव हैं. बडे भोले! इतने कि लोग भोलेनाथ भी कहते हैं उन्हें. यह कभी किसी की परीक्षा नहीं लेते, बस वरदान दिया करते हैं सबको! कोई आए, कुछ भी मांगे.... इन्होंने वर दिया ही दिया! लोगों को जब पता चला इनके बारे में, तो अन्य सारे भगवानों को बिसरा, इनके दरवज्जे गर्दी करने लगे. ये झुंड के झुंड लोग आते और अपना इच्छित वर प्राप्त कर लेते. भीड़ इतनी बढी कि महादेव को दिन-रात काम करना पड़ने लगा. बेचारे बरसों सो नहीं पाते! उनकी पत्नी, गौरा पार्वती चिंतित हो गयीं. महादेव के स्वास्थ्य की चिंता सताने लगी उन्हें. वे दिन-रात सोचा करतीं कि क्या जुगत लगाऊँ और महादेव को ज़रा आराम मिले! पत्नी का काम ही है यह.... आखिर उन्हें उपाय सूझ ही गया. एक दिन, थोड़ा समय देख महादेव से कहने लगीं;

'वैसे भी आप बिना जाने-पूछे ही तो वरदान कर दिया करते हो. क्यों न हम इन निठल्ले बैठे किंकरों को सौंप दें यह काम, वर देने का?'

महादेव को युक्ति पसंद आई. उनकी सहमति बनते देख गौरा का हौसला बढ़ा. उन्हें अपने द्वार होने वाली गर्दी तो कम करनी ही थी, निठल्ले किंकरों को भी काम पर लगाना था....

'ये किंकर वैसे ही मुटा रहे हैं.... यहाँ बैठे-बैठे वरदान देंगे, और मोटे पड़ जाएंगे. आपके भक्तों को भी कैलाश तक आना पड़ता है! ऐसा करते हैं, इन किंकरों को सारे संसार में विचरण करते हुए, आपके भक्तों की कामनाओं को 'तथास्तु' कहने को कह देते हैं. इस प्रकार भक्तों की मेहनत बचेगी, निकम्मे किंकरों को काम मिल जाएगा और आपको आराम!! क्या कहते हैं?'

भोले बाबा को क्या आपत्ति हो सकती थी भला? भक्त खुश, गौरा खुश..... भगवान भी खुश!! पर किंकरों की मुसीबत हो गई. निकम्मे बैठे बैठे आलसी हो गए थे. अब यह, सारे संसार भर घूमते हुए, लोगों को इच्छापूर्ति का वरदान देना, कठिन काम लग रहा था उन्हें.

आलसी लोग, खूब चतुर होते हैं!

जुगत लगा ही ली उन्होंने. महादेव कहाँ देखने-पूछने वाले हैं? तो अब यह किंकर, सारे संसार भर, केवल 'तथास्तु-तथास्तु' कहते घूमते रहते हैं! वे नहीं देखते, किसके मन में क्या चल रहा है. आकाश मार्ग में विचरण करते हुए जिस किसी की आवाज सुनाई देती है, तथास्तु हो जाता है उनकी तरफ से!

हमेशा ध्यान रखना इस बात का कि कभी कोई नकारात्मक या गलत विचार ना आएं मन में. कहीं उसी समय महादेव का कोई किंकर वहाँ से गुजर रहा हो और उसने तथास्तु कर दी, तो?"

मैं डर गया.....

"और जो कहीं ऐसा हो गया तो माँ?"

"अरे, इतनी भी डर की बात नहीं है रे! जब कभी ऐसा हो तो, पहले उस नकारात्मक बात को मन से निकालना और ज़ोर से नारा लगाना, 'जय भोलेनाथ!"....बात खतम...."

अब भी जब कभी मेरे मुख से निकलता है;

"जय भोलेनाथ!" या "जय शिवशंकर!",

श्रीमती जी पूछ पड़तीं हैं....

"अब क्या निगेटिव विचार आ गए मन में?"

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