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एक अज्ञात प्रेम का अंत
लोग कहते हैं अग्रेजी पढ़ना बेहद जरूरी है , अग्रेजी नही आयेगी तो आप कुछ नही कर सकते ! परन्तु मैं इस सोच के बिल्कुल विपरित था मुझे अग्रेजी पढ़ना और भाड़ झोकना बराबर लगता मेरी समझ अनुसार अग्रेजी पढ़ने वालो की मिट्टी खराब होती हैं ,,,,,
मेरे दादा जी जो की मास्टर थे , उनके सर भी अग्रेजी का भूत और की तरह ही चढ़ा हुआ था , रही सही कसर मेरी चाची जी ने पूरी कर दी ....मास्टर बन ...कुल मिला कर मेरा घर मुझे घर कम स्कूल ज्यादा लगता था ....स्कूल में तो मैं बहाने मार कर किसी कोने की कक्षा में बैठ ...कहानियां पढ़ता रहता ....बहुत बार पकड़ भी गया और दादा जी ने लात ,मुक्के , बेत से मेरी सुताई भी की ....
एक पिता जी को छोड़ कर किसी भी परिवार के सदस्य को मेरे लाल पड़े हाथो की चिंता न रहती ......
बात मार्च माह की हैं ....उस दिन सवेरे कुछ ठण्ड थी ; परन्तु दोपहर के समय हवा गर्मी पाकर दक्षिण दिशा की ओर बहने लगी थी ..
मैं जिस बरामदे में बैठा हुआ था ...वहां से उद्घान के एक कोने में खड़े हुए कटहल और दूसरी ओर शिरीष वृक्ष के बीच बाहर का मैदान दिखाई पड़ता था !
वह सुनसान मैदान फाल्गुन की धूप से धू-धू कर जल रहा था .....उसी से सटा हुआ एक रास्ता पश्चिम दिशा को होता हुआ गांव की ओर निकल जाता हैं ....उसी पर एक खाली बैलगाडी धीमी चाल से गांव की ओर लौटी जा रही थी .. ..जिस पर बैठा किसान धूप से बचने के लिये सर पर लाल गमछा लपेटे ....किसी लोकगीत की कड़िया गुनगुना रहा था ........
ठीक इसी समय दादा जी की कर्कस आवाज मेरे कानो में गुंजी .......कहाँ हैं वह नालयक ....उससे कह दो आज शाम को गिरधारी मास्टर के घर अग्रेजी पढ़ने जाना है उसको ......वो माँ को सम्बोधित करते हुये आंगन में बोल रहे थे ......मैंने भी दबे मन से हामी भर दी जाने की क्योकि मुझे यकिन था ...मैं न भी करता तो कभी मरमम्त के बाद मुझे भेजा जाता .....खैर मैं नहा धो कर निश्चित समय पर मास्टर जी के घर पहुच गया .....दूर से ही उन्हे प्रणाम कर अपना परिचय दिया ....उन्होने सिर हिला कर मुझे बैठने की स्वीकृति दे दी .........
मैं कमरे का मुआइना करने लगा ......लगभग आठ से दस छात्र सर झुकाये हुये कुछ रटने में तल्लीन थें .......
मास्टर जी ने मुझे कुछ काम दे कर समझा दिया और कमरे से बाहर चले गये ......करीब एक सप्ताह हो चुके थे मुझे अग्रेजी पढ़ते मैं नयी नयी तरकिबो पर विचार करने लगा .....वहाँ से मुक्ति का ...परन्तु सब बेकार सबित हुये .......
एक दिन मास्टर जी के घर जाते वक्त मेरी साइकिल की चैन टूट गयी जिससे मैं सड़क पर लुढक गया ...घर दूर था इसलिये मैने वापस जाना सही न समझा और मास्टर जी के घर की तरफ साइकिल ले पैदल ही बढ़ने लगा ....जब घर पहुचा तो एक मित्र ने बताया आज मास्टर जी की पत्नी की तबियत कुछ बिगड़ गयी हैं वे उन्हे लेकर पास के अस्पताल गये हुये है ...इस लिये आज पढा़ई नही होगी .....तभी दरवाजे पर किसी की आहट सुनाई दी ...एक चेहरे ने पर्दे को किनारे किया ओर किसी चंचल मृगी जैसे बाहर झांका ....पिता जी माँ को लेकर अस्पताल गये हैं ...आप लोग कल आईयेगा ....उसने जैसे कुछ रटा रटाया बोला हो .....
उसके इकहरे बदन में तनिक भी जुम्बिश न थी ....उसकी आयु लगभग 17 वर्ष होगी ....उसके सलोने मुख का वर्णन शायद लेखनी से नही किया जा सकता पर इतना अवश्य लिखा जा सकता हैं , कि उसमे ऐसी आर्कषण शक्ति हैं ,जो देखते ही वन की मृगी की याद दिला देती थी ......साहित्यिक भाषा में कहना पड़े तो उसे एक निर्बुध्दि भी कहा जा सकता है ...जो अपने पिता समान ही थी ......हां अपने समाधान के लिये यह अवश्य सोचा जा सकता है कि बुध्दि वृत्तिपुर्ण विकसित नही हुयी थी .......लेकिन इन सब बातो से उसके सौन्दर्य घटा नही : अपितु उसमे एक विशेषता ही आ गयी थी ....
दरवाजे के पट बंद हो चुके थे शायद कब के ....परन्तु कोई मेरे भीतर जा छूपा था .....पास खडे मेरे मित्र द्वारा झकझोरने पर मेरी एकग्रता भंग हुयी ........शाम ढल चुकी थी ....मैं घर पहुचने वाला था .....घर पहुच कर पता चला कल मुझे माँ के साथ मामा जी के घर जाना हैं .....मैं कभी भी न जाता यदि माँ ने मुझे नये कपड़ो का लालच न दिया होता .......
मामा जी के घर 15 दिन मैने खुब सोच कर विचार कर लिया की मैं घर पहुच कर अपनी उस निर्बुध्दि मृगी को अपना हाल बता दूगा .....घर पहुचते ही ....मैं बेसब्री से सांझ होने का इंतजार करने लगा ....दोपहर से ही साइकिल चमक रहा था ....नहा धो कर मैं निकला ही था...की गांव के बाहर मोड़ पर दादा जी से भेट हो गयी ....मैंने साइकिल से उतर कर उनके चरण छूये और ...जाने के लिये तैयार ही हो रहा था की उन्होने टोका ....तुम्हारी अग्रेजी की क्लास कुछ दिन बंद रहेगी .....मैं सन्न सा हो गया ....और पलट कर कहा क्यो दादाजी .......उन्होने बिना कुछ कहे ...मेरी साइकिल ली और पीछे बैठने को बोला ....साइकिल गांव की पथरीली सड़क पर बढ़ चली .....कुछ क्षण बाद दादा जी बोले ...गिरधारी की लड़की जो शहर में पढ़ती थी उसने आत्महत्या कर ली है आज सबेरे ही ..........
कारण पता नही चला क्यो ...
मैं जैसे की कियी अबोध बालक सा यह सुन कर रोने लगा ....दादाजी जब तक कुछ समझते घर आ चुका था .......मैं भाग कर अपने कक्ष में गया ....और रात भर सुबकिया लेता रहा .......
अगली सुबह पास के शमसान में एक चिता जल रही थी ....और मैं भोर के उगले उस सुर्ख लाल सुर्य के नीचे शोकातुर अवस्था में अपने उस अज्ञात प्रेम की सीमा के अंत को निहार रहा था.....
@ अंकित तिवारी "आवारा"

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