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जनता और नेता की अपेक्षाओं में फर्क क्या होता है ?

लो स 2014 को भी हिन्दू ध्रुवीकरण बताया गया था। था भी, नहीं तो टोपी नकारनेसे हिन्दू इतना खुश न होते । और भी कई अपेक्षाएँ थी, लेकिन उनपर विस्तार से चर्चा फिर कभी। यहाँ कुछ और मौलिक बात रखना चाहता हूँ ।

चलिये, हिन्दू नेता हमेशा हिंदुओं के लिए खुलकर लड़ने के लिए शर्माते आ रहे हैं, मीडिया ने उतना डरा रखा है कि जैसे कोई हिन्दू नेता हिंदुओं से बात करे, वो सांप्रदायिक बताया जाता है, तो हमेशा "बोले कम, समझ लो ज्यादा" वाली बात होती है । बाद में "हमने क्या कहा वो सब जानते हैं, आप ने क्या समझा वो आप की समस्या है" वाले जवाब या चापलूस लीपापोती शुरू हो जाती है । दुख इसी बात का होता है । वैसे जनता की असली अपेक्षाएँ क्या होती है जिन्हें highest common factor कहा जा सकता है ?

जहांतक मैं समझता हूँ, हिन्दू सब से व्यथित होते हैं तो मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए किए गए अपने दमन से । हिंदुओं का दमन और उन्हें उद्दंडता से पीड़ा पहुंचाते रहना इस वाक्य का अर्थ समझ लीजिये । स्पष्ट करता हूँ कुछ उदाहरणों से । मंदिरों में आरती बंद करवाना, जहां मौका मिले वहाँ मंदिरों को नुकसान पहुंचाना, मस्जिदों के भोंपुओं का आवाज लिमिट से ऊपर कर्कश रखना, कानून और नागरी नियमों का उद्दंडता से उल्लंघन करना - पुलिस हतबल जब जाली टोपीवाला लाल लाइट तोड़े, संख्याबल के हौवे से मनमानी करना, हिन्दू विरोधी संगीन आरोपों के अपराधियों को भी कार्रवाई से बचाना, हिन्दू कॉलोनी में एक फ्लॅट खरीदकर सब के लिए उपद्रव खड़े करना.... महज कुछ उदाहरण हैं, और भी कई आप जोड़ सकते हैं । इन सब का परिणाम एक ही होता है, चिढ़ाकर पूछना कि हमने तो तुमको रगड़ दिया; क्या उखाड़ सके हमारा ? आगे भी रगड़ेंगे, और रगड़ेंगे । तुम्हारी पुलिस हमारा कुछ नहीं करेगी, उल्टा तुम्हें ही परेशान करेगी क्योंकि उसे हुक्म देनेवाले नेता हमारी चरणवंदना करते हैं । वामी तथा ईसाई मिशनरी भी कम ज्यादा इसी में फिट होते हैं । इसाइयों की उद्दंडता और चिढ़ाने की मात्रा मुसलमानों जितनी तीव्र नहीं होती बस । हाँ यह भी कह दूँ कि यह अनवरत मानसिक दमन करते रहना कुरआन की ही सीख है । सबूत दे सकता हूँ, पिछले कई दिनों से दे ही रहा हूँ और उनका कोई खंडन नहीं कर पाया है क्योंकि वे ठोस सबूत हैं ।

सब से अधिक यही अनवरत दमन और चिढ़ाए जाना चुभता है और हिन्दू इतना ही चाहता है कि उनकी यह उद्दंडता समाप्त करनेवाला नेतृत्व सत्ता में आए । कत्ले आम चाहनेवाले कम ही होते हैं, आम हिन्दू बस यह दमन से क्षुब्ध हैं । वह इतना ही चाहता है कि दबंगाई खत्म हो जाये, भोंपू का आवाज कम किया जाये; वो हिन्दुओं को परेशान करने के लिए ही मर्यादा से ज्यादा रखा जाता है । कानून का डर उनमें भी हो... मुसलमान जितनी दुष्टता से उद्दंडता करता है इस्लाम की शान बढ़ाने के लिए उतना हिन्दू कभी नहीं करता, उसकी हमेशा प्रतिक्रिया ही होती रही है । नेताओं से उसकी नाराजी इसीलिए होती है क्योंकि वे उसके मतों से चुनकर आते हैं और उनके गोद में खेलते हैं जिन्होने हिंदुओं से शत्रुत्व ही अपना उद्देश्य रखा है । चौकीदारी के लिये लाया हुआ महंगा कुत्ता लुटेरे का साथ देता है वही हिंदुओं का सब से बड़ा दुख रहा है । यह न हो इतनी ही हिंदुओं की अपेक्षा होती है, उससे बहुत ज्यादा नहीं ।

नेताओं को क्या चाहिए ? वे पक्षीय दृष्टिकोण से देखते हैं । उनके लिए दूसरा पक्ष उनका टेम्पररी शत्रु दल है (बदलने का ऑप्शन हमेशा है) । उसे सत्ता में न आने देना यही उसका उद्देश्य है क्योंकि इन्हें सत्ता चाहिए । जनता को क्या चाहिए इससे उनको मतलब नहीं रहता । आर्थिक सुधार भी जनता की मांग होती है, वे करते रहें, उनसे जिसका भला हो वो इन के विरोध में कम बोलेगा इतना ही उनका दृष्टिकोण रहता है । यह बात ज़्यादातर हिन्दू नेताओं की ही है क्योंकि अधिकांश मुस्लिम नेता इस्लामी अजेंडा को ही समर्पित होते हैं और खुलकर बोलने में उनको कोई हिचक नहीं होती क्योंकि मीडिया में उनके प्रति विशेष प्रेम उमड़ता है ।

नेता अपना अलग फोकस लेकर चलते हैं - बाद में कहते भी हैं झल्लाकर - जनता को राजनीति की समझ नहीं होती, कुछ भी मांगें रखती है, थोड़ा practical भी होना चाहिए । उस वक़्त वे उन्हीं मांगों का उल्लेख करते हैं जो वाकई अव्यवहारिक हो सकती हैं । चापलूस उसी बात को दोहराते हैं और सब वही कहने लगते हैं कि हाँ, ये मांगें अव्यवहारिक हैं । होती भी हैं अक्सर, लेकिन इस कोलाहल में वास्तव मांग जो मुस्लिम गिरोह की उद्दंडता समाप्त करने की है, वो भुलाई जाती है ।

दुबारा चुनाव जब आता है तब कोई वास्तव और न्याय मांग का उल्लेख भी नहीं करता, नेता ही कोई अव्यवहारिक लेकिन भावना भड़कानेवाली मांगों को लेकर आते हैं और अगर चुने जाये तो उन्हें ठंडे बस्ते में रख देते हैं ।

क्रोध इस बात का है कि अनवरत दबंगाई और छुटपुट हिंसा से मुसलमान भय बना रखते हैं और अधिकाधिक भूमि से हिंदुओं को बेदखल करते रहते हैं । मांग यही हो कि अनवरत दबंगाई और अनवरत छुटपुट हिंसा तथा कानून को धता बताने को कड़ाई से तोड़ा जाये । Dominance की विचारधारा को उखाड़ दिया जाये, लोकतन्त्र में उसकी कोई जगह नहीं ।

सब से असली और सब से जायज मांग यही है । बाकी चुनावी मौसमी मुद्दे हैं ।
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