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पंडित
बनारस की गलीयों में एक भीमकाय छाय अक्सर बीती रात गुजर करती थी ,, हाथ में चिलम ,कमर में लटकता एक चमचमाता फरसा ...फौलादी बदन जैसे सांचे में ढाला गया हो ...और इस पर रंग जमाती एक जनेऊ ....मुछो पर ताव देते जब पंडित आखाड़े में उतरता तो ...बनारस का कोई पहलवान समना करने न आता ....
सलाहो सिंह अपने आमीर बाप की इकलौती औलाद था जो बहुत दवा दुआ के बाद मिली थी ! स्कूल में पढ़ता था तो सबसे सुन्दर लड़का माना जाता था ,वह वाकई सुन्दर था ! बड़े मालदार घराने की आँखों का नूर था ! इसलिये उसको किसी ची़ज की कमी नही थी ! मगर वह जिस मैदान में कुद पड़ा था उसको एक संरक्षक की जरूरत थी ! जो उसके वक्त पर काम आ सके शहर में यूँ तो सैकड़ो बदमाश और पहलवान थे पर पंडित की बात निराली थी ! वह बहुत गरीब था ! बहुत बदमिज़ाजी और अक्खड़ तबीयत का था ! मगर इसके बावजूद उसमे ऐसा बांकापन था कि सलाहो ने इसे देखते ही पंसद कर लिया और उसकी दोस्ती हो गयी !
स्कूल से निकल कर सलाहो कालेज में दाखिल हुआ तो उसने और पर-पुर्जे निकाले और थोड़े ही समय में उसकी सरगर्मियों ने नया रूख अपना लिया ....इसके बाद भगवान का करना ऐसा हुआ की सलाहो का बाप मर गया ! वह अपनी तमाम जायदाद का अकेला मालिक था ! पहले तो उसने नकदी पर हाथ साफ किया फिर मकान गिरवी रखने शुरू किये ! फिर वे मकान भी बिक गये ! हीरा मंडी की तमाम वेश्याएँ सलाहो के नाम से परिचित थी ,,,,,
सलाहो खुला खेल रहा था पंडित को पता था की यह खेल ज्यादा दिन तक न चलने वाला ....वह सलाहो से दोगुनी उम्र का था ...मगर वह उसे कोई नसीहत नही देता था शायद इसलिये की वह अच्छी तरहा समझता था की जो भूत उसके हलीन व जमील बाबू के सिर पर सवार हैं उसे कोई न उतार सकता ,,,,,,,,
इस दौरान न जाने कहा से हीरा मंडी में एक नया नूर उतरा देखा किसी ने नही पर चर्चा आम हो गयी थी ..सलाहो मचल उठा पंडित ने फौरन पता लगा कर बताया की वह कश्मीर से आई है और वाकई खुबसुरत हैं उसका नाम महताब हैं ....परन्तु अब सलाहो के पास इतनी दौलत न थी की वह महताब की नथ उतराई में ताल ठोक सके .....पंडित से अपने बाबू की यह बेचारगी न देखी जा रही थी ....मगर वह कर ही क्या सकता था ,,,
पंडित ने एक चाल बताई की वह पहले महताब की मां को अपने जाल मे फसाये और फिर मौका देख कर उससे महताब की बात करे .....
सलाहो को बात जम गयी ,महताब की मां इकबाल जोंक की तरहा सलाहो से जा चिपकी ...मगर वह जानती थी की यह अब मालदार न रहा बस वह उसकी बची खुची दौलत को ठिकाने लगाने वाली थी .....एक दिन मौका देख कर सलाहो ने इकबाल से अपनी बात कह दी ....इकबाल ने साफ साफ कह दिया की रूपये 25 हजार देने पड़ेगे नथ उतरवाई के .....उसमे अपने बचे हुये दो मकान बेचे और पच्चीस हजार लेकर अगले दिन इकबाल के पास पहुच चुका था ....इकबाल का ख्याल था की सलाहो इतने रूपये नही जमा कर पायेगा ...वह तैश में आ गयी ...महताब से सलाह करने पर उसने कहा इतनी भी जल्दी नही करनी चहिये ...उससे कहो की पहले हमारे साथ उर्स पर चले ..सलाहो को विवश होकर जाता पड़ा ....पंद्रह हजार रूपये उर्स के मुजरे नें उड़ गये ...पच्चीस हजार को दिमक लग चुकी थी ....बचे दस हजार महताब की फरमाईशो पर खर्च हो गये !
सलाहो बेचैन हो उठा ....इकबाल यही तो चाहती थी .....इधर सलाहो का एक मकान जो गिरवी पर था कुर्की आ चुकी थी जिसमे उसकी नेकचलन मां रहती थी .....पंडित को चिंता हुयी ...सलाहो को मकान की चिंता नही महताब को पाने की बेचैनी थी ......कुर्की की रकम दस हजार थी ...जो सलाहो के पास न थी ....अगली सुबह पंडित सलाहो के सामने आया तो उसका चेहरा ऐसा लग रहा था जैसे जान ही न हो उसमें ,,
उसने अपने गमछे से सौ सौ के कुछ नोट निकाले ...सलाहो ने गिने तो पूरे दस हजार थे ....
पंडित इतने पैसे तेरे पास कहा से आये ....
यह मत पूछो मालिक चलो कुर्की की रकम जमा कर आओ .....
सलाहो के दिमाक मे तो महताब थी ..उसके कदम फिर महताब के कोठे की तरफ उठने लगे ...
पंडित ने कहा नही बाऊ महताब के पास मत जाओ यह रूपया कुर्की वालो को दे दो !
सलाहो ने बिगडे हुये बच्चे की तरहा कहा क्यो न जाऊ ...
पंडित ने कड़क लहजे मे कहा ," तू नही जायेगा'''''!"
सलाहो ने तैश में आकर कहा तू कौन होता है रोकने वाला ?
मै तेरा गुलाम हू बाऊ पर अब महताब के पास मत जा कोई फायदा नही !
"क्यो?"
पंडित की आवाज में लर्जिश सी पैदा हुई - यह रूपये मुझे उसी ने दिये है बाऊ ..
सलाहो करीब करीब चीख उठा यह रूपये महताब ने तुझे दिये है .....
"हाँ बाऊ ! उसी ने दिये है ! बहुत दिनो से मरती थी मुझपर साली ,पर मैं हाथ न आता था ! तुझपर तकतीफ का वक्त आया तो मैने सोचा छोड़ पंडित अपनी कसम बाऊ तुझसे कुर्बानी माँगता हैं ! सो मैं कल रात उसके पास गया और .....सौदा कर लिया !"
पंडित की आंखों से टप टप आंसू टपक गिरने लगे ! _________________________@

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