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आरटीओ महकमे में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर समाचार माध्यमों में ताबड़तोड़ छप रही खबरों को शासन ने सज्ञान में लिया। शासन द्वारा जारी फरमान पर अमल करते हुये हुये मंगलवार को एसडीएम कीर्ति कुमार एवं कोतवाल कपिल मुनि सिंह के नेतृत्व में औचक छापेमारी की गयी। मौके पर डेढ़ दर्जन लोगों को गिरफ्तार किया गया है। उनके पास से लैपटॉप, प्रिंटर, फोटो कॉपी मशीन सहित तमाम उपकरण जब्त गए। माना जा रहा है कि यह लोग आरटीओ विभाग में दलाली का काम करते थे। अचानक हुई छापेमारी से आरटीओ कार्यालय में घण्टों अफरा तफरी का माहौल रहा। हर बार की तरह निशाने पर वही थे जो यहां से किसी तरह छोटी मोटी आय कर अपना परिवार चलाते हैं। इन्हे दलाल शब्द से नवाजा जाता है। आरटीओ महकमे में भ्रष्टाचार सुरसा की तरह मुंह बायें खड़ा है इसको सभी जानते हैं। मजबूरियों के पास बगावत की ताकत नही होती। यही कारण है कि वर्षों से ठगी का शिकार हो रहे ग्राहकों ने आवाज नही उठाया। सभी भलीभांति जानते हैं कि यहां हर काम के पीछे ग्राहक बहुत खुश हुआ तो दलाल को 100 रूपया दे देता है। इससे ज्यादा पाने के लिये उसे बेइमानी का रास्ता अख्तियार करना पड़ता है जो सभी के लिये न तो संभव है और न ही सभी के पास इतना साहस है।

ऐसा नही कि यहां आफिस के बाहर अपना दफ्तर खोलकर ग्राहकों को सेवायें दे रहे दलाल अनपढ़ और गंवार है। इनमें कई ऐसे हैं जो डिग्री धारक हैं। कानून की पढ़ाई किये हैं। योग्यता क्षमता के अनुसार उन्हे सरकारी नौकरी में होना चाहिये था। नही मिली तो उन्होने किसी के आगे भीख मांगना उचित नही समझा। आरटीओ आफिस के बाहर संभावनाओं को देखते हुये किसी ने फोटो कॉपी मशीन लगा लिया तो किसी को दलाली रास आ गयी। वे यहां काम कराने आये ग्राहकों को सीधी सपाट भाषा में आरटीओ ऑफिस का दस्तूर बता देते हैं। इसके बदले उन्हे कुछ रकम मिल जाती होगी इसमें दो राय नही। लेकिन इसका कई गुना ऑफिस में बैठे अधिकारी और पटल सहायक डकार जाते हैं। प्रशासन के टारगेट में जब यहां का भ्रष्टाचार आता है तो बाहर बैठे बेरोजगारों पर गाज गिरती है। उन्ही का धरपकड़ होता है। ऐसा करके प्रशासन अपनी पीठ थपथपा लेता है। इस बार भी किरदार और स्क्रिप्ट दोनो पुरानी है। प्रशासन की छापेमारी के बाद दोहरे मापदण्ड को लेकर चर्चा हो रही है। ऑफिस के बाहर फोटो कॉपी मशीन लगाकर अपना जीविकोपार्जन करने वालों का क्या दोष है।


बाहर बैठे दलालों के पास सरकारी फाइलों का पाया जाना क्या संकेत करता है। क्या इसमें पटल सहायक जिम्मेदार नही है। फाइलों के हाथ पैर नही है कि खुद चलकर दलाल के दफ्तर चली आयेगी। निःसंदेह इसमें पटल सहायक और महकमे के अफसर बराबर जिम्मेदार हैं। यहां लर्निंग लाइसेंस बनवाने की सरकारी फीस 200 रूपया है, किन्तु ऑफिस के अंदर इसके लिये 600 रूपया घूस देना पड़ता है। इसे परमानेन्ट कराने के लिये सरकारी फीस 700 रूपये है, इतनी ही आरटीओ और पटल सहायक मिलकर डकार जाते हैं। हेवी लाइसेंस बनवाने के लिये सरकारी फीस 1000 रूपये है, इसके लिये 2500 रूपये घूस देना पड़ता है। छोटी गाड़ियों के ट्रांसफर में भी यही खेल है। सरकारी फीस 150 रूपये है और घूस 250 रूपये। किसी बेरोजगार युवक ने टैम्पो खरीदकर अपना परिवार चलाने का मन बना लिया तो उसे विभाग के अफसर ऐसा चूसते हैं कि गाड़ी की किश्त निकालना भी उसे भारी पड़ता है।

ऑटो की परमिट के लिये सरकारी फीस 1500 रूपये है लेकिन इसे पाने के लिये 4000 रूपये घूस देनी पड़ती है। इतना ही अफसरों और पटल सहायकों के नखरे भी झेलने पड़ते हैं। इस बीच यदि आपने काम में देरी की वजह पूछ लिया तो दोनो मिलकर इतना दौड़ा देंगे कि पसीना उतर जायेगा। आरटीओं में घूसखोरी की खबरें अक्सर छपती रहती है। लेकिन कमजोर और अंधा बहरा बन चुका प्रशासन का खुफिया तंत्र खुद सवालों में है। वरना इतने लम्बे अरसे से चली आ रही प्रथा कबका बंद हो चुकी होती। खबर लिखे जाने तक गिरफ्तार लोगों को छुड़ाने के लिये सौदेबाजी का दौर जारी था। 

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