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इस्लाम की नीतियों को समझिए सरल सीधे शब्दों में -
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जब ताकत कम है तो बात करो । ताकत बढ़ जाये तो चित करो । ये है बात-चित !
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ह मुहम्मद ने मक्का ऐसे ही फतह की थी । हुदैबिया की संधि का अभ्यास करें ।

हमें इस्लाम से सीखना आवश्यक है । शत्रु से हमेशा सीखना चाहिए । जिसे इस वाक्य से आपत्ति है उसे इतना स्पष्ट कर दूँ कि इस्लाम काफिरों से दोस्ती की हिदायत नहीं देता और इस बात को आप खुद गूगल कर के देख सकते हैं आधिकारिक इस्लामी साइटस पर । जब तक आप काफिर हैं, आप को अल्लाह ने उसका याने पर्याय से इस्लाम और मुसलमान का शत्रु बताया है । अगर मुसलमान आप का आज दोस्त है तो इसलिए कि उसके समाज के धार्मिक नेताओं ने जिहाद का जाहिर ऐलान नहीं किया है ।

इस पर भी आपत्ति करनेवालों से यही कहूँगा कि अपने किसी मुसलमान दोस्त से यह पूछें कि वो कुरान पर हाथ रखकर कहें कि गजवा ए हिन्द अगर हो तो वो आप के कंधे से कंधा मिलाएगा या आप से पंजा लड़ाएगा । यकीन के साथ कह सकता हूँ कि आप की बात को वो हँसकर उड़ा देगा, आप से कहेगा कि यह क्या पागलपन है, लेकिन ठोस जवाब नहीं देगा।

इससे यह सीख ले सकते हैं कि वे बात तब तक ही करेंगे जब तक वे निर्बल हैं । भावुक न हों, वे उस अवधि का उपयोग आप को चित करने के लिए आवश्यक ताकत जुटाने में ही लगाएंगे । ताकत जुट जाये तो आप को अपनी ताकत से चकित करेंगे और चित करेंगे ।

तब वे कोई बात नहीं करेंगे, ठीक उसी तरह जैसे ह मुहम्मद ने मक्का की फतह की मुहिम में लड़ाई के पहले शांति प्रस्ताव लेकर आए अबू सूफियान को मिलने से भी मना कर दिया था हालांकि दोनों के बीच रिश्तेदारी भी थी ।

बाकी आज की दोस्ती खराब करने की जरूरत नहीं । बस यही समझिए कि जब उसका मजहब उसे पुकारेगा, वो आप की दोस्ती का लिहाज नहीं कर सकता । क्योंकि इस्लाम एक सेना है और हर मुसलमान को उसका सिपाही होना फर्ज है । जब उसे ड्यूटी का बुलावा आयेगा, वो लड़ने के लिए खड़ा होगा । इसके लिए तैयार रहिए, दुखी मत होइए, और तब तक दोस्ती एंजॉय भी कीजिये । दोस्ती के limits समझकर रहेंगे तो दुखी नहीं होंगे ।

और सुनिए, अगर वो सैनिक है तो आप क्या हैं?
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