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आस्था के प्रतिमान-५

#अर्थ_शंकराचार्य_होने_का...

#नारायण_ऋषि जो स्वयं #विष्णु के अवतार हैं *(नर नारायण अवतार)* उनसे हमारे सनातन की #संन्यासी_परंपरा आरंभ होती है। वैसे मूल महाकाल हैं।

#महर्षि_वसिष्ठ से #शक्ति और उनसे #महर्षि_पराशर तथा उनसे #वेदव्यास फिर व्यासदेव से #शुकदेव और *शुकमुनि* से होते हुए कई हजारों सिद्ध महात्माओं को जन्म देती हुई कलियुग में ये #गौड़पादाचार्य तक आई। इनके शिष्य हुए अष्ट सिद्धि संपन्न #गोविन्द_भगवद्पादाचार्य।
गोविन्द भगवत्पादाचार्य के शिष्य हुए #शंकराचार्य जिन्हें हम #भगवान_आद्यशंकराचार्य के रूप में जानते हैं।

#आद्यशंकराचार्य ने ऐसे समय अवतार लिया जब सनातन धर्म नष्ट भ्रष्ट होने की कगार पर था। बुद्ध द्वारा उपदिष्ट करुणा प्रधान बौद्ध अपने मार्ग से बुरी तरह पतित हो चुके थे।मांस मदिरा व संभोग में बुद्धत्व खोजा जा रहा था।

जैन मत अपने को स्वतंत्र धर्म घोषित करने की महत्वाकांक्षा में महावीर को भूल राजसत्ताओं के साथ वैदिक धर्म को मिटाने के षड्यंत्र रचने में व्यस्त था।

स्वयं सनातन में भैरव और कापालिक मत की प्रधानता वाले तामसी अनुष्ठान प्रमुख हो गए थे।देवी पूजन के नाम पर छोटी बच्चियों के बलात्कार तक सहन किए जा रहे थे।

ऐसे समय में केरल के एक छोटे से गांव के निर्धन ब्राह्मण परिवार में #शंकर अवतरित हुए।
*८ वर्ष* की वय में बिना किसी विशेष सहायक के सारे वेद सांगोपांग कंठस्थ करके आत्मानुभूति के लिए नर्मदा तट पर ओंकारेश्वर में तपोरत गोविन्द भगवत्पादाचार्य की शरण में आए।

कुछ परंपराओं का मत है गोविन्द पादाचार्य ही #महर्षि_पतंजलि थे जो हजारों वर्षों से शिव के इस अवतार को अपना अंतिम शिष्य बनाने के लिए #ओंकारेश्वर में समाधिस्थ थे।
शंकर को दीक्षा देकर उन्होंने #योगबल से देह त्याग दी।

इसके बाद #आद्यशंकर ने भारत के ४ कोनों में ४ शांकर मठ और संन्यास दीक्षा परंपरा की स्थापना की।
#दक्षिण में #श्रंगेरी, #पूर्व में #जगन्नाथ_पुरी, #पश्चिम में #द्वारका और #उत्तर में #ज्योतिषमती_पीठ।

इन चारों पीठों पर जो आचार्य होते हैं उनका दायित्व होता है अपनी पीठ के अधिकार क्षेत्र में धर्म जागरण व अधर्म पाखंड का उन्मूलन।

*ये आचार्य कोई यूँ ही नहीं बन सकता।*

१२/१५ वर्ष का ब्राहमण बालक #दंडी_संन्यासी का शिष्य होता है।वहाँ करीब २५/३० वर्ष कठोर साधना और गुरुसेवा के साथ उसे संस्कृत व्याकरण का समग्र ज्ञान पाना होता है।वेद वेदांग, उपनिषद और पुराण,ब्राह्मण व आरण्यक ग्रंथों सहित सारा शास्त्र कोष न केवल अध्ययन कराया जाता है अपितु अधिकतम भाग #कंठस्थ कराया जाता है।

करीब ४०/४५ की आयु में वो बालक से प्रौढ़ हो चुका व्यक्ति दंड संन्यास ग्रहण कर दंडी स्वामी होता है। *त्रिदंड धारण करना सिर्फ ब्राह्मण के ब्रह्मचारी पुत्र के लिए ही आरक्षित है।*

ऐसे हजारों दंडी संन्यासी अपने अपने गुरु के साथ मिलकर अपने क्षेत्र के शंकराचार्य के मार्गदर्शन में धर्म कार्य करते रहते हैं।

*आप कहेंगे दिखते क्यों नहीं???*
तो इनके मीडिया और सोशल मीडिया में आग लगाने जैसे कांड नहीं होते।प्रचार ये चाहते नहीं।चुपचाप काम करते रहते हैं।

इन हजारों दंडी स्वामियों में से कुछ विशेष प्रतिभा संपन्न लोगों को शंकराचार्य दृष्टि में रखते हैं और अपने देहत्याग या महासमाधि से पूर्व सर्वश्रेष्ठ ज्ञानी को अगला शंकराचार्य घोषित कर देते हैं।
उनकी महासमाधि के बाद सारे देश से संत संप्रदाय एकत्र होकर उस संन्यासी को शंकराचार्य पद पर अभिषिक्त करते हैं।

इस प्रकार ये परंपरा आज तक अविच्छिन्न चली आ रही है।

वर्तमान में परम पूज्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वतीजी ज्योतिषमती पीठ(जोशीमठ,उत्तराखंड) और द्वारका पीठ (गुजरात) पर विराजमान हैं। आपका पट्टाभिषेक हिमालय के सिद्ध योगी स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वतीजी महाराज ने किया था जो इनके पूर्व शंकराचार्य थे।

आज स्वामीजी ९०+ की वय में भी पूरी ऊर्जा से सनातन के ऊपर हो रहे आघातों से लड़ रहे हैं।हमारी संस्कृति में डाले जा रहे धीमे विष के प्रति आगाह कर रहे हैं।और हम बदले में उन्हें विष दे रहे हैं।

*हम सब टुच्चे क्रांतिवीरों में से किसने उम्र के ८० साल सिर्फ शास्त्र अध्ययन, साधना, शिक्षण और चिंतन को दिए हैं???????????*

सोचियेगा जरा...........।

(राजनैतिक मतभेद अलग बात है। शंकराचार्य पर बेहूदी टिप्पणी बरदाश्त नहीं करेंगे। यदि ऐसा कुछ हुआ तो वह व्यक्ति हमसे मैत्री संबंध की योग्यता नहीं रखता।)

#अज्ञेय


आस्था के प्रतिमान-६

सनातन धर्म अपने मूल स्वरुप में #ऊर्जा_विज्ञान है।

हमने खोज की थी कि ऊर्जा के मोटा मोटी दो स्वरुप होते हैं।
१:- #सकारात्मक(Positive)
२:- #नकारात्मक(Negative)

किंतु जीवन का गहन नियम है... कुछ भी यहाँ परिपूर्ण नहीं होता।
अच्छा पूरी तरह अच्छा नहीं होता, तथा,बुरा भी पूरी तरह बुरा नहीं होता।

सबकुछ मिश्रित है।

ऊर्जा भी पूर्णतः सकारात्मक या नकारात्मक नहीं होती, इस संसार में।

सकारात्मक ऊर्जा की प्रधानता वाली शक्तियाँ #देवता व नकारात्मक ऊर्जा की प्रधानता वाली शक्तियाँ #पिशाच इत्यादि कहे गए हैं।

देवताओं में भी ऊर्जा की सघनता व शुद्धता के अनुसार श्रेणियाँ हैं।असुरों में भी हैं पर ... वो कहानी फिर कभी।

शुद्धतम सकारात्मक ऊर्जा परम शिव,परा शक्ति, परब्रह्म, परम शून्य, नारायण, परमात्मा, भगवान इत्यादि नामों से जाना जाता है।

इस स्तर से नीचे लेश मात्र अहं भाव की नकारात्मक ऊर्जा मिश्रित देवगण हैं.... इंद्र, वरुण, अग्नि इत्यादि।

फिर इनसे नीचे लोकपाल, दिक्पाल,व ग्रहों के देवता हैं। इनमें ऊर्जा कठोर स्वभाव की हो जाती है।यम, शनि, राहु, भैरव, कुबेर इत्यादि।

स्वभाव अनुसार इन शक्तियों से संवाद व इनसे सुरक्षा तथा अनुग्रह प्राप्ति हेतु हमारे महान योगी पूर्वजों ने कुछ नियम निर्धारित किए थे जो ऊर्जा विज्ञान पर ही आधारित थे।
अज्ञानी लोगों ने भी उन नियमों का पालन कर लाभ उठाया है।

इन्हीं में कुछ नियम स्पर्श अस्पर्श विवेक से संबंधित हैं।

परम तत्व की साधना या भक्ति के लिए कोई स्थूल नियम नहीं हैं।गुरु से दीक्षा व अंतस की पावनता ही यथेष्ट है।

किंतु जैसे जैसे नीचे आते हैं संविधान लागू होता जाता है।

जैसे भैरव,महाकाली इत्यादि के उपासक को एक तय जीवन शैली अपनानी ही है।वैसे ही कुछ मंदिर ऐसे हैं जहाँ एक विशिष्ट ऊर्जा का व्यक्ति ही प्रवेश व अनुष्ठान का अधिकार रखता है।पहले सभी ब्राह्मण गायत्री उपासक थे अतः ऊर्जा के उच्च स्पंदनों पर रहते थे इसलिए पुजारी बनाए गए।अब नहीं हैं।अब वे शूद्र से भी निकृष्ट स्थिति में हैं।यहाँ उनकी चर्चा है जो जन्म मात्र से ब्राह्मण हैं।साधक नहीं हैं।

इसी प्रकार भैरव,हनुमान, शनि इत्यादि उग्र देव माने गए हैं। इसलिए कोमल ऊर्जा वाले प्राणियों को इनसे निश्चित दूरी बनाकर उपासना का विधान किया है।
स्त्री स्वभाव मृदु ऊर्जा प्रधान है इसीलिए कहीं ऊर्जा की सघनता को देखते हुए स्त्री का प्रवेश वहाँ वर्जित किया गया।कोई बहुत कठोर स्त्री वहाँ जा सकती थी, पर उस समय लोग इतने सरल थे कि कठोरता और स्त्रीत्व कहीं कभी कभार ही मिलते थे।

आज वर्जनाएँ भंग हो रही हैं..... न समझने वाले समझाने निकल पड़े हैं..... समझाने वाले मौन हैं..... क्योंकि समझने वाले कौन हैं????

#अज्ञेय

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