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अपना बारह मत बजाओ...!!

'पढ़िए!...क्योंकि स्कूली-पाठ्यक्रम के कब्जेदारों ने हमारी नजरों से 'सत्य, दूर रखा, असत्य पढ़ाया। वे आज तक सत्य को 'लाजिकली प्रूव, करने में लगे रहते है और हमें भटका रहे हैं।

जब पूरा देश भयानक-आतंकवाद से त्रस्त था.....लोगो का अपने-धर्म अध्यात्म के साथ जीना दूभर......हिन्दू रहना है तो जजिया और तीर्थयात्रा कर की कीमत चुकाओ, वो भी अपमान के साथ !!.सल्तनत भारत से सनातन हिंदुत्व खत्म करने पर अमादा था....शांन्तिदूतो के अत्याचार से तंग आकर गुरुओ ने शास्त्र-अध्यात्म में धर्म-युध्द भी जोड़ दिया। बहुत टक्कर ली ..... पंजाब का कोई ऐसा गाँव-घर नही होगा जहां से लोग हिन्दू-धर्म की रक्षा करते हुये मारे न गए हों..वे सिख कहलाते थे.!
इसी तरह पांच सौ साल तक चलता रहा।
अंत में नवें गुरु तेगबहादुर जी का युग आ गया।
.........आदत और मजहब के अनुसार औरंगजेब ने कुछ हिन्दुओ को जबर्दस्ती मुसलमान बनाने का आदेश दिया तो वे भाग कर गुरु तेगबहादुर के पास पहुंचे...

गुरुजी ने उनसे कहा की “वे जा कर औरंगज़ेब से कह दें कि यदि गुरु तेगबहादुर ने इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया तो उनके बाद हम भी इस्लाम धर्म ग्रहण कर लेंगे !! और यदि आप गुरु तेगबहादुर जी से इस्लाम धारण नहीं करवा पाए तो हम भी इस्लाम धर्म धारण नहीं करेंगे'। औरंगज़ेब ने यह स्वीकार कर लिया।.
उनकी हिन्दूधर्म के प्रति निष्ठा कितनी गहरी थी, इसका अनुमान इसीसे लगाया जा सकता है कि जब “दीन मुहम्मदी,,में लाने का दृढ़ संकल्प कर औरंगजेब ने गुरु तेगबहादुर जी के समक्ष तीन विकल्प रक्खे।
1. चमत्कार दिखाओ।
2. इस्लाम स्वीकार करो।
3. या अपने प्राणों की आहुति दो।
तब गुरु जी ने उसके प्रस्तावों का उत्तर देते हुए कहा-

तिन ते सुनि श्री तेगबहादुर। धरम निवाहनि बिखै बहादुर।
उत्तर भन्यो, धरम हम हिन्दू। अति प्रिय को किम करहिं निकन्दू।।
लोक परलोक उभय सुखदानी। आन न पाइया याहि समानी।
मति मलीन मूरख मति जोई। इसको त्यागे पामर सोई।
सुमतिवंत हम कहु क्यों त्यागहिं। धरम राखिवे नित अनुरागहिं।।
त्रितीए प्रान हाव की बात। सो हम सहै, अपने गात।
हिन्दू धरम रखहिं जग मांही। तुमरे करे बिनस यह नांही।
अर्थ- हम हिन्दू धर्म को मानने वाले हैं। हम अपने प्राणों से ज्यादा प्रिय हिन्दू धर्म को कैसे छोड़ सकते हैं?
यह हमारा हिन्दू धर्म लोक और परलोक दोनों में सुख देने वाला है। दूसरा कोई धर्म इसकी समानता को प्राप्त नहीं कर सकता। जो मूर्ख है वही इसके त्यागने की बात सोच सकता है, वह निश्चय ही पामर है। ऐसा व्यक्ति निश्चित ही इस लोक में अत्यन्त दुःख पाता है और यमराज भी उसको दण्ड देते हैं।...हमारा अपने धर्म की रक्षा में नित्य अनुराग है। प्राण देने की जो तुमने तीसरी बात कही है, वह हमें स्वीकार है। शरीर पर प्रहार सहते हुए प्राणों की आहुति देकर और हम हिन्दू धर्म की रक्षा कर लेंगे और यह धर्म तुम्हारे प्रयास से नष्ट होने वाला नहीं है।
औरंगजेब यह सुनकर आगबबूला हो गया । उसने दिल्ली के चाँदनी चौक पर गुरु तेगबहादुर जी का शीश काटने का हुक्म ज़ारी कर दिया! सन 1675 में गुरु जी धर्म की रक्षा के लिए अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध अपने चार शिष्यों के साथ धार्मिक और वैचारिक स्वतंत्रता के लिए शहीद हो गए….. गुरु जी ने हँसते-हँसते बलिदान दे दिया। गुरु तेगबहादुरजी की याद में उनके 'बलिदान स्थल' पर गुरुद्वारा बना है, जिसका नाम गुरुद्वारा 'शीश गंज साहिब' है।
उनही महान गुरु - तेग-बहादुर के बेटे थे गुरु गोबिन्द सिंह (पटना, जन्म: २२ दिसम्बर १६६६, मृत्यु: ७ अक्टूबर १७०८) उनका विवाह सुंदरी जी से 11 साल की उम्र में 1677 में हुआ। जिन्होने हिन्दुओ की रक्षार्थ सिख (शिष्य) धर्म की स्थापना की थी । इसके अंतर्गत हर हिन्दू घर का एक लड़का (विशेषकर बड़ा) सरदार बनता था..... उन्होने सन १६९९ में बैसाखी के दिन उन्होने इस पन्थ की स्थापना की....खालसा पंथ..!!

.. धर्म के लिए समस्त परिवार का बलिदान उन्होंने किया जिसके लिए उन्हें 'सरबंसदानी' भी कहा जाता है ।
हममे से बहुतों को नही पता होगा कि "चण्डी चरित्र" पुस्तक की रचना उन्होने ही की थी॥ उसके अंतर्गत - ४ रचनाए - अरूप-आदि शक्ति चंडी की स्तुति | इसमें चंडी को शरीर औरत एवंम मूर्ती में मानी जाने वाली मान्यताओं को तोडा है..... चंडी को परमेशर की शक्ति = हुक्म के रूप में दर्शाया है | एक रचना मार्कण्डेय पुराण पर आधारित है|

गुरु गोबिंद सिंह जी के चार पुत्र साहिबज़ादा अजीत सिंह, जूझार सिंह, जोरावर सिंह और फतेह सिंह थे।अपने जीते-जी उन्हीने
मुस्लिम अत्याचारो के खिलाफ युद्ध जारी रखा था...कश्मीर-पंजाब और अफगानिस्तान तथा हिमाचल-गढ़वाल तक का बड़ा हिस्सा उन्होने स्वतंत्र करवा लिया था और वहाँ हिन्दू राज्यों कि स्थापना कर ली थी.....!

मुगल सेना चमकौर यद्ध (6 दिसंबर 1704) में हार गयी।गुरु जी वहां से निकल गए। किन्तु अफरातफरी में दोनों छोटे पुत्र और जोरावर सिंह व फतेहसिंहजी के साथ माता गूजरी देवी के साथ...नदी पार के दौरान बिछड़ गए और मुगल सेना के हाथ लग गये।...धोखे से उन्हे पकड़ लिया गया था.....मुस्लिम नबाब वजीरखान ने जो और्ंगजेब का मुंहसेवा था उसने दोनों बच्चो को इस्लाम स्वीकार करने का “मजहबी (औरंगजेबी) आदेश सुनाया...!
“छोटे बच्चों ! तुम्हारे बडे भाई पिता के साथ शहीद हो गए हैं। सौभाग्य से तुम मेरे दरबार में जिन्दा आ पाए हो। जल्दी करो और इस्लाम कबूल कर लो। मुस्लिम बच्चों के रूप में तुम्हारा जीवन राजकुमारों सा होगा।''
वीर गुरु पुतरो ने स्पष्ट इन्कार ही नहीं किया, बल्कि नवाब की खिल्ली भी उड़ाई। उन्होंने कहा,
'' हिन्दू हमें जान से भी प्यारी है। इस माया सी दुनिया हमें धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर नहीं कर सकती। हम गुरु गोबिन्द सिंह जैसे शेर के पुत्रा है। जो तेरा भ्रम जल्दी ही दूर कर देंगे। हमारे दादा श्री गुरु तेगबहादुर जी ने अपने प्राण हिन्दु पीड़ितों की धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए बलिदान दिया था। तब तुम क्या धर्म परिवर्तन करवा पाए थे?
जब गुरु अर्जुन देव जी ने मुगल जहांगीर के विरुद्ध संघर्ष में बलिदान दिया, तब वह क्या धर्म परिवर्तन करवा पाया था। हमने इस लासानी शहादत के इतिहास को जारी रखना है।'',,
10 और 11 वर्ष के बालकों के ऐसे उत्तर सुनकर नवाब वजीर खान दंग रह गया।
........... हुक्म सुनाया गया कि कल के दिन दोपहर तक अगर तुमने इस्लाम कुबूल न किया तो हम तुम्हें दीवारों मे चुन देंगे....!

पूरे पंजाब, मे बात फैल गई !
गुरु-गोबिन्द सिंह अफगानिस्तानी सीमा पर पहुँच गए थे....दूर होने की वजह से उन्हे खबर भी नही थी...!
बाद में पता चला।
गांवों-गांवों के सरदारों (हिन्दू-धर्म रक्षकों) ने तय किया कि हम दिन में दोपहर तक लड़ कर बच्चों को छुड़ा लेंगे...।
सब अपने छोटे-मोटे-हथियारों के साथ उन बच्चो को बचाने निकल पड़े.....बहादुर होने की वजह से सरदारों ने भी चैलेंज दिया...
शाही फौज प्रशिक्षित होने के साथ-साथ काफी बड़ी और व्यवस्थित होने के अलावा मजहबी जुनून के साथ तैयार थी…!!
उस इलाके का कोई परिवार ऐसा नही था जहां से लोग लड़ने न गए हों....भीषण युद्ध हुआ....वजीर खान के कप्तानी मे लड़ रही मुगलों की आधी सेना उसमें मारी गयी...परंतु कोई भी सरदार जीवित न बचा...सिखो की बहादुरी की अद्भुत मिशाल थी यह घटना।
27 दिसम्बर सन्‌ 1704 को दोनों छोटे साहिबजादे और जोरावरसिंहजी व फतेहसिंहजी को सरहिंद नगर के बीच चौराहे पर सरेआम दीवारों में चुनवा कर कत्ल कर दिया गया…!
वीरता के हद के बावजूद क्योंकि सरदार गुरु जी के बच्चों को दोपहर तक छुड़ा न पाये इसलिए शुरुआत मे मुस्लिम सारे सरदारों को चिढ़ाते थे “लो सरदार जी, दोपहरिया हो गई !!" बाद में जैसे दोपहर की जगह अङ्ग्रेज़ी काल-मापन आ गया, दोपहर की जगह 12 बजे ने ले ली ।
अब वे, "लो सरदार जी, 12 बज गए ?" कहके हमारे सिक्ख भाइयों की खिल्ली उड़ाने लगे।
तब से आज-तक उस बलिदान हल्का ही किया जा रहा...लगातार.।
धीरे-धीरे हम भी....छि:!!!
..आप क्या सोचते हैं...यह हलका करना भी एक सुनियोजित हथियार नही है??
..धीरे-धीरे भुला देने का तरीका.. हम कितने नीच और कमीने हैं दुनियां के सर्वश्रेष्ठ बलिदान को सर-आँखों पर बैठाने के बजाए .... हमारे ही दुश्मनों के ट्रैप, में आ गए.!!
समझ तो गए ही होंगे न, क्यों आज इतिहास बताने बैठा हूँ.....कुछ दूसरी बात है...
उन्होने दुनियाँ के सबसे महान शौर्य-बलिदान का मज़ाक बनाना शुरू कर दिया....और धीरे-धीरे इसे सहज कर दिया....इस पर चुटकुले बनने शुरू कर दिए.....(किसने शुरू किया होगा अंदाजा लगा लीजिए....)॥न दुनियाँ मे कहीं ऐसे योद्धा हैं की खुद के बलिदान को भूल जाये न ही ऐसे शत्रु की बडी चालाकी से भुलवा दें!!

'दशमेश, समझ गए हिन्दू समाज को संगठन के अलावा 'गम्भीर प्रशिक्षण, की घनघोर जरूरत है। बड़े कठोर परिश्रम से संगठन भी खड़ा हुआ (आज के संघ की तरह)
उसी "भाषा-शैली, में सरदारों ने जबाब देना शुरू किया।
बाद मे उस "वजीर खान,उसके सारे रिश्तेदारों को जिंदा फाड़ा गया..केवल एक को छोड़कर (उसने विरोध किया था) उस दिन सरहिंद में उपस्थित सारे शान्तिदूतो को जिन्दा ही आग में जला दिया गया।..जब गुरु आए तब सरदारों ने बन्द किया.....औरंगजेब इतना डर गया कि वह "डेक्कन,से आया ही नही....वहीं 'दक्खन, में तड़प-तड़प के मरा।
...मुक्तसर युद्ध (1706) की विजय मे सरदारों ने मुगल सेना को तबाह कर दिया....था पंजाब से अफगान तक का पूरा इलाका जीता...।
(विश्वास न हो तो उस समय का इतिहास पढ़ो--असुर को गुरु गोबिंद सिंह द्वारा लिखा पत्र भी पढ़ेे )
..धीरे-धीरे गुरु ने दिल्ली की गद्दी पर ही अपना आदमी बैठा दिया । बहादुर शाह...!
सरदारों से लगातार 14 युद्धो मे हार के बाद शान्ति-दूतों की समझ मे आ गया..
.सवा-लक्ख से एक लड़ाऊँ का मायने क्या है!
...कई युद्ध ऐसे भी थे जिसमे 2-3 सौ सरदारों ने पचास हजार से अधिक शान्तिदूतों को गाजर मूली की तरह काट डाला ।
... खौफ हो गया....यह हिन्दुओ को सचमुच आजाद करवा लेगा...चूँकि 'पॉलिटिकल-साम्राज्यवादी धार्मिक संगठन' था,तो उनके बौद्धिक वर्ग ने....तो पैतरा नंबर दो चलना शुरू किया...”भाई-भाई...,
नेहरुआना कांग्रेस ने उसे बड़ी चतुराई से अलग करके एक समप्रदाय के रूप में स्टैब्लिश कर दिया।
''हिन्दू मुस्लिम,सिख,ईसाई...
का समझे बबुआ??
जब कोई ज्यादा भाई-भाई का खेल सिखाये तो समझो 'पट्टीदार बना, रहा है।

उन्होंने सबसे बड़ा वार कांग्रेस के माध्यम से 1982 के बाद किया..
.कहो तो 'संघ,का नेतृत्व सारा माजरा समझ गया नही तो....!!

उनसे यही तरीका सीखा वामी-कामी इतिहास-कारों ने, साहित्यकारों,लेखकों और मीडियाबाजों नें बड़े सधे तरीके से हमें बचाने जो भी आगे आएगा उसको काट देंगे....अलग कर देंगे...शुरू मे लगेगा यह कुछ नही है...बस ऐसे ही चल रहा है ....समय बीतते-बीतते,...उसका दस्तावेजीकरण और एक्सेप्टेन्स ऐसे ही कराया जाता है बाप...!
इसलिए छोटी बातें अनदेखी करने का मतलब है......समाप्त होना !!
जो भी संगठक होगा,संग़ठन खड़ा होगा उसे बड़ी चालाकी से अलग करेंगे,॥ हल्का करेंगे॥...आइसोलेट करेंगे.. और कुछ नही होगा तो उन्मादी होते हुये भी मज़ाक उड़ाकर....12 बजाएँगे.....और बेवकूफ सिद्ध करेंगे......धीरे-धीरे सोशल-मेमोरी से डिलीट मार देंगे !!
यह एक हथियार है...उनके पास ऐसे छोटे-छोटे हजारों पैंतरे और हथियार हैं जो दिखते नही 'सीधे-काट कर अलग कर देते हैं....पहचानना सीख लीजिये!!
इस हथियार से ही हिन्दू समाज के “रक्षको, को भी एक “मजहब" मे काट-बाँट दिया जाता है..आपको पता नही लगता....लेकिन यह छुरा बहुत तेज है.!

.....और इसी तरह ह.... वामी-सामी-कामी इतिहासकार,लेखक और मीडियाखोर इस हिन्दू धर्म कि सुरक्षा के लिए बनाई गए तमाम ‘पंथों को हिंदुत्व से बांटने में सफल रहे बल्कि कहिये कि शत्रु बनाने मे सफल रहे..।

यह इसलिए बता रहा हूँ इन सत्तर सालों में उनके पास और खतरनाक हथियार था ""मीडिया और मुंबइया सिनेमा,,.....बड़ी खूबसूरती से आज के मीडिया-बाज और मुंबइया फिल्म कर इसमे लगे हुये है....ध्यान से देखो उनकी फिल्मों में 12 बजाने वाली बहुत चीजें दिख जाएंगी!!

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