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प्राच्यविमुखता का इतिहास -49

कुछ लोग सोचते हैं कि भारत में अंग्रेजी राज एक जरूरी हस्तक्षेप था। उन्हें गलत नहीं माना जा सकता। यदि अठारह सौ सत्तावन का विद्रोह सफल हो गया होता तो मध्यकालीन मूल्यों की गहरी जड़ों के कारण देश की राजनीतिक दशा आज से भी बुरी होती, इसके प्रमाण हम अपने आचरण से पेश करते जा रहे हैं। इतिहास इतिहास है, उसमें जो घटित हुआ उससे भिन्न कुछ भी कल्पित करें, वह मात्र मनोविलास है।

ठीक इसी तरह कुछ लोग मानते हैं ईसाइयत से टकराव इस देश के लिए हितकर रहा। कहा जा सकता है कि टकराव तो हितकर रहा पर फैलाव अनिष्टकर है।

हम सभी अपने आप से, अपने समाज से, अपने धर्म और मूल्यव्यवस्था से इतने आसक्त होते हैं कि इनकी कमियों या विकृतियों को देखने और दिखाने वाला सिरफिरा या दुष्ट प्रतीत होता है। आलोचना के लिए जिस तीसरी आंख की जरूरत होती है वह हमारे पास नहीं होती । यह उस आईने से पैदा होती है जो हमारे निंदकों द्वारा हमारे छिद्रान्वेषण के क्रम तैयार होता है। दूसरों को हम जिस रूप में दिखाई देते हैं उसको भी चेतना में स्थान देने से पैदा होती है।

इस्लाम के पास विश्वास था, विचार नहीं था, इसलिए न तो उसको औजार बना कर इसने दूसरों की आलोचना की न ही आत्मालोचन किया। आत्मालोचन की क्षमता पोपतान्त्रिक ईसाइयत में भी नहीं है। यह विशेषता ऐग्लिकनचर्च में पैदा हुई और इसलिए सबसे पहले इसने पोपतन्त्र से मुक्ति पाई। यही कारण है कि दूसरे ईसाइयों की तुलना में बर्तानवी ईसाइयों में विश्वास के समनुपात में विचार भी बना रहा।

यदि यूरोप के दूसरे उपनिवेशवादियों की तुलना में अंग्रेजों का व्यवहार अधिक तर्कसंगत था तो इंगलैंड के चर्च में भी दूसरों की अपेक्षा अधिक तार्किकता थी और इसका प्रयोग इसने अपने प्रचार कार्यों में भी किया। सच कहें तो बंगाल के प्रबोधन में जितनी भूमिका कंपनी के विधिवाद से मिले प्रतिरोध के अवसर का है उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका ऐंग्किलन चर्च की प्रखर आलोचना का भी है जो हिकारत से अधिक समाज को सुधारने और इसमें राज्य के हस्तक्षेप की मांग के रूप में सामने आया और इसके दबाव से बाहर आने के लिए आधुनिक चेतनासंपन्न सभी अग्रदूत- राममोहन राय, दयानन्द सरस्वती, विवेकानन्द, गांधी, सभी = ईसाइयत से टकराते हुए अपने को वर्णवादी सोच और उस मानसिकता से पैदा हुई विकृतियों से समाज को बाहर लाने का आन्दोलन चलाते हैं।

ईसाइयों को भारतीय समाज का उद्धार करने के लिए इसकी बुराइयों पर ही ध्यान केन्द्रित करना था। इन बुराइयों में से कुछ को आप सभी जानते हैं, कुछ को बहुत कम लोग ही जानते होंगे क्योंकि उनको लेकर अधिक चर्चा नहीं हुई । जिन बुराइयों को जानते हैं, वे कहां से पैदा हुई या कब उन्होंने भारतीय समाज में प्रवेष किया इससे भी कम लोगों का ही परिचय होगा। हमने ईसाइयत का सामना होने से पहले कभी इन बुराइयों की ओर ध्यान नहीं दिया। ऐसे आन्दोलनकारी भी जो जाति और वर्णभेद को ले कर आन्दोलन करते रहे, उनकी दृष्टि भी इनसे मुक्ति की ओर नहीं गई। अतः हम मान सकेते हैं कि मिशनरियों, और विशेषतः ब्रिटिश मिशनरियों की कटु आलोचना के अभाव में हमारे उन चिन्तकों का ध्यान भी आत्मालोचन और आत्मशुद्धि की ओर न गया होता और वे आज भी जारी रह सकती थी।

इनमें कुछ का परिचय इस प्रकार हैः

1. सती प्रथा - इसके बारे में इतना अधिक लिखा गया है कि लगता है इसके विषय में कुछ जानने को बचा नहीं है। फिर भी यह निवेदन किया जा सकता है कि राजतरंगिणी के अनुसार यह कुप्रथा मध्येशिया से आई थी। पहले इसके विरल नमूने ही देखने में आते थे। मध्यकाल में अपमान से बचने के लिए यदि राजपूतों ने प्राणान्त तक युद्धभूमि से पीछे न हटने का व्रत लेकर केसरिया बाना पहना तो स्त्रियों ने जौहर का व्रत लिया और इसके बड़े पैमाने पर कई बार आयोजन हुए परन्तु स्वेच्छा से सामान्य स्थितियों में इसका वरण करने वाली महिलाएं लाखों करोड़ों में एक हुआ करती थीं, इसलिए इनको देवी मान कर पूजा करते थे। नव विवाहिताएं उनके स्थान पर सिर झुकाने जाती थी। बंगाल में इसके पीछे आथिैक कारण प्रधान थे और इसमें असाधारण बढ़ोत्तरी कंपनी प्रशासन के बाद ही हुई । यदि आप किसी के जिन्दा जलने या जलाए जाने की प्रथा किसी भिन्न समाज में लक्ष्य करें तो वह पूरा समाज कितना क्रूर, संवेदनशून्य प्रतीत होगा इसकी कल्पना कर सकते हैं।

2. काशी- मथुरा- वृन्दावन-वास - राजा राममोहन राय के प्रयत्न से सती प्रथा पर प्रतिबन्ध तो लग गया, परन्तु समाज की चेतना में ओर सोच में परिवर्तन नहीं आया। जीवित जलाने की जगह आखों से ओझल करके उनकेा निपटाने का सिलसिला बहुत बाद तक चलता रहा। कारण वह अनमेल विवाह, आर्थिक बोझ को कम करने और इज्जत बचाने की ग्रंथि। राममोहन राय ने इसके साथ ही विधवाविवाह का भी आन्दोलन चलाया था, वह सफल नहीं हुआ। अकेले विद्यासागर थे जिन्होंने विधवा से विवाह किया।

3. आत्महत्या - चाल्र्सग्रांट ने जगन्नाथपुरी की रथयात्रा देखने के लिए अपनी यात्रा के दौरान तीर्थयात्रियों भारी भीड़ को असह्य दुर्गति सहते हुए पुरी की यात्रा करने का और महारथ के सामने कूद कर प्राण देने का वर्णन किया है वह विचलित करने वाला है। पर साथ ही तीर्थ यात्रा पर टिकट लगा कर कमाई करने के लिए कंपनी के प्रबध का उसने उल्लेख तो किया है पर कोई आलोचना नहीं की है। आत्महत्या का एक रूप गंगा में कूद कर प्राण देना भी था।

4. कासी करवट - संभवतः यह किसी एक ही पंडे की पैशाचिक योजना थी परन्तु थी बहुत पहले से चली आ रही क्योंकि इसका उल्लेख कबीर ने भी किया है। यह था क्या इसका पता कबीर को भी न रहा होगा। सदेह स्वर्ग जाने कि इच्छुक धनी जजमान को उस कमरे में ले जाकर पूजापाठ कराया जाता और उससे भारी दान दक्षिणा वसूल की जाती । उसके परिजन उस कक्ष में नहीं जा सकते थे क्योंकि उसमें जाने के बाद वे भी स्वर्ग चले जाते। अंग्रेजों ने जब इसका रहस्य पता किया तो पता चला कि उस कमरे में जजमान को जिस पटरे पर बैठाया जाता वह ढेकीनुमा था। उसके नीचे गंगा से आई एक नहर थी जिसमें घड़ियालों का वास था। दान दक्षिणा वसूल करने के बाद अपने आसन से पंडा हटता कि इधर पटरा दूसरी ओर उलट जाता। वह नीचे नहर में जा गिरता और उसकी मनोकामना घड़ियाल पूरी कर देते। इसके बाद पटरा वापस और कमरे से वह स्वर्ग यात्री गायब। उसके परिजन यह देख कर संतुष्ट हो कर चले जाते कि वह सदेह स्वर्ग चला गया।

5. बालिका वध - यह मध्यकालीन क्रूरता आत्मसम्मान की रक्षा से जुड़ी थी जिसका उल्लेख हम पहले कर आए हैं।

6. बालविवाह - इसकी क्रूरता को हम समझ नहीं सकते, विषेषतः अनमेल विवाह के मामलों में। इसे हरबिलास शारदा जी की नजर से देखें तो "where a social custom or a religious rite outrages our sense of humanity or inflicts injustice on a helpless class of people, the Legislature has a right to step in. Marrying a girl of three or four years and allowing sexual intercourse with a girl of nine or ten years outrages the sense of humanity anywhere."

7. देवदासी प्रथा जिसके बारे में हम सभी को कुछ पता तो है ही पर इसे मेयो के शब्दों में रखें तो The little creature, accordingly, is delivered to the temple women, her predecessors along the route, for teaching in dancing and singing. Often by the age of five, when she is considered most desirable, she becomes the priests' own prostitute.
If she survives to later years she serves as a dancer and singer before the shrine in the daily temple worship; and in the houses around the temple she is held always ready, at a price, for the use of men pilgrims during their devotional sojourns in the temple precincts. She now goes beautifully attired, often loaded with the jewels of the gods, and leads an active life until her charms fade. Then, stamped with the mark of the god under whose aegis she has lived, she is turned out upon the public, with a small allowance and with the acknowledged right to a beggar's livelihood. Her parents, who may be well-to-do persons of good rank and caste, have lost no face at all by the manner of their disposal of her

8. मरिया प्रथा - यह हिन्दू समाज में प्रचलित न था पर सबरों में मनौती पूरी करने और इसक द्वारा धरती को उपजाऊ बनाने के लिए किसी दूसरी जनजाति या सभ्य समाज के बच्चे को चुरा ले जाते और उसे अपने बच्चे की तरह ही पालते पोसते थे। उस बच्चे को अपनी होनी का पता नहीं रहता। पर खेल कूद में यदि दूसरे किसी बच्चे से उसके मरिया होने का पता चल जाता या इसका सन्देह उसे पाल कर रखने वाले को हो जाता उसके बाद उसे बांध कर रखते। उसे शराब पिलाने की आदत डालते और पक्का शराबी बना देते । बलि के दिन उसे भरपूर शराब पिलाते और गाते बजाते बलि स्थल पर ले जाते। वहां एक गड्ढा होता जिसमें सूअर काट कर उसका खून भरा जाता और मरिया हो उसी में सर के बल तब तक दबाए रहते जब तक दम घुट कर वह मर नहीं जाता। फिर उसकी बलि दी जाती और उसके मांस का एक एक टुकड़ा प्रसाद के रूप में सभी ला कर पकाते खाते थे।

9. नरबलि के विषय में विस्तार से कुछ बताने की आवश्यकता नहीं, परन्तु बलिपशु की अवधारणा बहुत पुरानी है जिसका एक उदाहरण तो शुनःशेप की कथा में ही आता है जो ऋग्वेद में कई सूक्तों में वर्णित है। मध्यकाल में ठगों, डकैतों के द्वारा शक्ति की उपासना और बलि की कहानियां डरावनी हैं। कर्नल स्लीमैन के ठग्स: ए मिलियन मर्डर्स में इनकी धोखाधड़ी, विश्वासघात और क्ररता की जो कहानियां मिलती हैं वे रोंगटे खड़े करने वाली हैं, पर मजे की बात यह कि अपने गांव जवार में इनकी बड़ी इज्जत थी।

अब आप अपने को हिन्दू से इतर किसी भी भावभूमि पर रख कर इतनी गर्हित रीतियों और विश्वासों में जकड़े हुए समाज और उसके धर्म के बारे में कोई धारणा बनाएं तो वह कैसी होगी? क्या उसके प्रति आपके मन में कोई सम्मान पैदा होगा? यह ध्यान रहे कि प्राच्यवादी भी इन रीतियों को गर्हित मानते थे, कोई भी विवेकवान व्यक्ति गर्हित मानने को बाध्य होगा, हमारे नेतृवर्ग ने भी इन्हें असह़्य माना और इनके निवारण के लिए तत्पर हुए।

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