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कुछ प्रश्न है आप के लिए । जरा स्मृतियों को खंगालकर उत्तर दें । आप का शांतिदूतों के प्रति आज जो विचार है वो कैसे बना ? कब बना ? क्यों बना ?

जहांतक अपनी बात कहूँ, तो मैं भी सेकुलर ही था। शायद आज भी सेकुलर ही हूँ क्योंकि हिन्दू पैदाइशी सेकुलर ही होता है । यूं कहें कि पहले स्यूडो सेकुलरों को भी असली सेकुलर समझता था।

मेरे आँखों से पट्टियाँ कैसे उतरी, आज स्यूडो सेकुलरों से घिन क्यूँ होती है इसकी कहानी इस पुरानी पोस्ट में मिलेगी । आप का अनुभव जानने को उत्सुक हूँ, अवश्य कमेन्ट करें । और हाँ, इसे अपनी वाल पर कॉपी करने का अनुरोध तो करूंगा ही, औरों को भी पता चले तो हमारी संख्या बढ़ेगी । राजा नंगा है ये सब ने कहा तब ऐसा ही कुछ हुआ होगा । पढ़िये -
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कबूतर और डॉ पीटर हैमण्ड
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कल (3 मई 2016 की पोस्ट है) अपने लंदन वाले डॉ राजीव मिश्रा जी का धैर्य जवाब दे गया, एक कबूतर पर आखिर बरस ही पड़े । उनका दोष नहीं, काफी दिनों से झेला था उन्होने उस कबूतर को, मैं इतना नहीं झेल पाता । पूरा Certifying कबूतर है भाई । जी, स्पेलिंग में गलती नहीं, वो Certifying कबूतर ही है , बिल्लियों को सर्टिफिकेट बाँट रहा है । मेरे पोस्ट्स पर भी आता है शायद आयेगा यहाँ भी ।

लेकिन बात कबूतर या डॉ मिश्रा की नहीं है, कबूतर ने कही बात की है ।

कई लोग होते हैं जो शांतिदूतों को ले कर प्यारी प्यारी पोस्टें लिखते हैं । भाई हम कोई पैदाइशी दुश्मन नहीं थे उनके, और आज भी मेरे कुछ लोगों से बहुत अच्छे संबंध हैं । लेकिन वक़्त ने किया क्या हंसी सितम, वहीं रहे हम पर तुम तो बेपरदा हुए सनम । आज 59 साल जी चुका हूँ, कुछ तजुर्बा अपना भी है और पिछली दो पीढ़ियों के साथ भी अच्छा खासा समय बिता चुका हूँ, मेरे नानाजी 1895 में जन्मे थे और 1985 में चल बसे । आखिर तक याददाश्त में कमी न थी । सर्विस भी कोर्ट की थी, तो मानवी स्वभाव को अलग अलग पहलू से देखा हुआ था । पिताजी पुलिस में थे । वहाँ भी कई नमूनों से परिचय हो ही जाता है । फॅमिली तथा समाज में में डॉक्टर भी काफी हैं, तीनों पीढ़ियों में, सो अगर व्यक्ति बात छेड़कर शांति से सुन सकता है उसको काफी कुछ जानने को मिल जाता है ।

तो बात यूं है कि मुझे तो शांतिदूतों से दिक्कत न आई, मेरे जवानी का माहौल अच्छा था । लोग वाकई एक दूसरे की इज्जत करते थे, ना मेरे किसी मित्रों ने हिन्दू देवताओं की निंदा की ना किसी ऐसे लोगों से उनके ताल्लुक थे । हमने भी कभी कोई क्रोध भावना नहीं पाली, शिवाजी महाराज की कथाओं से वीरश्री का संचार होता था लेकिन समकालीनों पर कोई गुस्सा न था। वो इतिहास था, अब वर्तमान के हालात अलग थे।

माँ या पिताजी ने कभी रोका टोका नहीं उनसे दोस्ती करने में लेकिन नाना नानी हमेशा टोकते । डरावनी कहानियाँ सुनाते । हम लोग हँसकर उड़ा देते कि ऐसा कुछ नहीं है, और सत्य भी यही है कि कभी कुछ हुआ भी नहीं । फिर स्कूल कॉलेज खत्म हुए, जिंदगी शुरू हुई।

वैसे सत्य तो यह है कि मेरी निजी जिंदगी में मुझे किसी ने भी परेशान नहीं किया या कोई भी बुरा अनुभव नहीं । फिर भी, दुनिया मे जो होता है उस से अंजान थोड़े ही रह सकते हैं ? समाज में बदलाव दिख रहे थे, जो समझ में नहीं आ रहा था वो समझने की कोशिश करने लगा । इतने सालों उनके एरिया के बीच रहा - मुंबई के डोंगरी इलाके में जिंदगी के तीस साल गुजारे, जाकिर नायक का ऑफिस बहुत पास था, कभी जाने की कोई इच्छा नहीं थी । बसें कम हुआ करती थी तो हम चलकर स्कूल जाते थे भेंड़ीबाजार नल बाजार के बीच में से, कभी कोई असुरक्षा नहीं लगी ।

लेकिन बदलता माहौल समझ में आ रहा था ।

अचानक हम जैसे ही दिखनेवाले लोग टोपी दाढ़ी में आ गए, बहुत सारे टिपिकल ड्रेस में भी आ गए । पेशानी पे काले निशान दिखने लगे । काले बुर्के अचानक बढ़ने लगे, यहाँ तक कि गोद में उठाई बच्चियाँ भी हिजाब पहनाई हुई दिखने लगी । अजान की कर्कशता बढ़ गई और शुक्रवार के नमाज से लौटते हुए युवाओं के चेहरों पर दैवी अनुभूति के बजाय एक खूंखवार चुनौतीपूर्ण भाव दिखने लगा कि बस “राड़ा” करनेपर आमादा हैं, बच के चलो, टकराने पर राड़ा हो कर रहेगा । बच के चलने पर एक विजयी भाव दिखता कि डराया है । डर होता लेकिन अकेले कुत्ते का नहीं, गली का होता जहां से अकेले गुजरते थे ।

कबूतर तो थे नहीं इसलिए समझ में आ गया कि बिल्लियाँ हैं । फिर नजरिया बदला, नजर भी बदली । इस्लाम का अभ्यास शुरू किया वो भी श्रद्धा को ताक पर रखकर । काफी कुछ समझ में आने लगा ।

कश्मीर भी उसी वक़्त सुलग उठा था । समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक इतने सालों से जो दोस्त थे, दोस्तों के खून और दोस्तों की औरतों के जिस्म के प्यासे कैसे हुए । अगर ये हत्यारे बाहर से आए तो स्थानिक मित्र उनसे लड़े क्यों नहीं ? परतें खुलने लगी, बातें समझ में आने लगी ।

फिर डॉ पीटर हैमण्ड (Dr Peter Hammond) की Slavery, Terrorism and Islam पढ़ने में आई । उसका वो सूत्र अब तक आप ने भी पढ़ा ही होगा कि जैसे उनका percentage बढ़ता है, क्या गतिविधियां होती है । किताब को छोड़िए, उनका वो सूत्र आप यहाँ पढ़ सकते हैं, उतना ही काफी है अगर आज तक पढ़ा नहीं है तो । http://archive.frontpagemag.com/readArticle.aspx?ARTID=30675

नाना नानी की बातों का संबंध लग गया, उन्होने बंटवारा देखा था। मुंबई में ही रहे तो उसकी दहक महसूस नहीं की जो पंजाब, बंगाल वालों ने की । लेकिन तब मुस्लिमों की संख्या उतनी बढ़ी थी कि फुल्टू उपद्रव मोड में आ चुके थे । माँ - पिताजी ने युवावस्था में बँटवारे के बाद की स्थिति देखी जहां उनका अनुपात कम हो गया था। हम ने भी युवावस्था में वही देखा जब अनुपात कम था या फिर शासन का डर था, वोटों की ताकत इतनी भी न थी कि दंगे वगैरा बर्दाश्त किए जाये । मीडिया असली अर्थ में सेक्युलर था, सेक्युलर का अर्थ केवल हिन्दू का अंधशत्रु होना नहीं था ।

लेकिन जब इस्लाम का अभ्यास किया तो समझ में आया कि यह शांति का नाम लेता रहता है लेकिन शांति से रहनेवाला संप्रदाय नहीं है । उसके नजर में शांति तब ही आएगी जब हरा झण्डा मुल्क पर लहराएगा । तब शांति इसलिए क्योंकि मुल्क को इस्लाम शासित करने का फर्ज उसने निभा लिया अब उसको वो ड्यूटी नहीं, अब बाकी उत्पात मचाने के लिये वो स्वतंत्र है । लेकिन जब तक देश का झण्डा हरा नहीं होता तब तक उसे शांति से रहना नहीं है ।

इसके लिए वो संख्या की प्रतीक्षा करता है । परिवार नियोजन को पुरजोर विरोध करता है कि परिवार नियोजन न करना अल्लाह की आज्ञा है । परवरिश का क्या करेंगे तो अल्लाह देखेगा, हमें क्या फिक्र करना जैसा उड़ाऊ जवाब देता है और सख्ती पर लड़ने को तैयार हो जाता है । कारण सीधा है, उसकी फौज उतने देर से तयार होगी आप के कानून के कारण ।

हिंदुओं ने एक बड़ी मूर्खता की जो उर्दू पढ़ना छोड़ दिया । अपने आप उनके लिए एक secure channel of communication बन गया । अभी सुना है उसमें भी शॉर्ट हैंड विकसित किया जा रहा है । पढ़ो, भाई, अब भी पढ़ना सीख जाओ । आप के नजर के सामने आप को लूटने का नोटिस लगेगा लेकिन आप बेखबर रहेंगे ।

आज फिर से संख्याबल बढ़ रहा है और दूसरी बात है कि आखिरत (कयामत) को ले कर एक time table फैलाया जा रहा है । उसपर विस्तार से लिखूंगा, बस इतना समझ लीजिये कि गजवा ए हिन्द उस टाइम टेबल का एक अनिवार्य हिस्सा है । (11 /2/2017 को लिखी, यहाँ पढ़ें https://readwritehere.com/post/oqpps/गजवा-ए-हिन्द-समय-नजदीक-है)

बात कबूतर से शुरू हुई थी । वो बंदा कहता है कि उसके शांतिदूत बड़े अच्छे दोस्त हैं ।

मुबारक हो । शांतिदूत, कश्मीरियों के भी बड़े अच्छे दोस्त थे । राजीव जी को नफरत फैलानेवाला कहता है । यहाँ भी आके वही स्टंट दुबारा करने की पूरी शक्यता है । मनोरंजन के लिए तयार रहिएगा ।

वैसे आप ने यह भी सुना ही होगा कि कई हिन्दू ID फेक हैं जो कबूतर बन कर हम जैसों पर सार्वजनिक आरोप करते हैं कि हम नफरत फैलाते हैं । ID है, ID का क्या । मूर्ख है या धूर्त, कैसे कह सकते हैं?

लंबी हो गई पोस्ट, उम्मीद है यहाँ तक पढ़ ली आप ने । शेयर करेंगे? जितने कबूतर कम हो, अच्छा होगा भविष्य के लिए । और हाँ, आप के कमेंट्स का स्वागत है ।

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