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हिन्‍दुत्‍व के प्रति घृणा का इतिहास - 21

''मध्‍यकाल हिन्‍दू समाज के लिए अपमान, यातना और उत्‍पीड़न का काल था, इसके असंख्‍य उदाहरण दिए जा सकते हैं। सबसे अधिक दुर्दशा किसानों की थी जिनसे वसूली में कई तरह की निर्ममता बरती जाती थी। अकाल पड़ने पर पहले हिन्‍दू राजाओं की ओर से जो राहत दी जाती थी उसका तो प्रश्‍न ही नहीं था, उल्‍टे इस काल में भी लगान की वसूली की जाती थी। यदि किसान विद्रोह कर बैठते या खेती करने से इन्‍कार कर देते तो भी उन पर अत्‍याचार होता ओर खेती करने को विवश किया जाता । किसानों की दशा गुलामों जैसी हो चली थीा शासन केवल आतंक पर कायम था इसलिए कुछ मामलों में दंड इतने कठोर होते कि उनकी कहानियां सुन कर ही किसी का सर उठाने का साहस न ह । इनका उल्‍लेख करने का तो किसी कवि को साहस नहीं हुआ । कुछ सिक्‍ख गुरुओं के साथ जिस तरह की निर्ममता बरती गई उनको उन्‍होंने अपने इतिहास में अविस्‍मरणीय बना कर रखा ।

'' इन यातनाओं का एक पक्ष यह भी था कि लगान वसूल करने वाले स्‍थानीय कारिंदों में अधिकांश हिन्‍दू थे और उनकी संख्‍या कम नहीं थी। जितना दिल्‍ली सरकार की पावती थी उससे ऊपर अपने लिए वे उगाही करते थे। हजारी, पांचहजारी आदि अमले स्‍थानीय जनों पर किसी तरह का अत्‍याचार करें, कोई पूछने वाला न था।

''संयोगवश तुलसी ने इस प्रणाली से उत्‍पन्‍न वेदना को भी अकाल के समान पीड़क मानते हुए उसे साथ ही दर्ज किया - दुसह दुराज दुकाल दुख । या नृप या कर उगाही करने वाले स्‍थानीय राजाओं और महामहिपाल के दुहरे शासन के रूप में।

''उन उत्‍पीड़नों के किसी भी तकाजे से राहत के रूप में प्रस्‍तुत करना या यह कहना कि मध्‍यकाल में हिन्‍दुओं को कोई दुख था ही नहीं, उत्‍पीडि़तों के प्रति क्रूरता है। उत्‍पीडि़त जनों का आर्तभाव से भगवान से रक्षा के लिए दबे सुर में घिघियाना, या अपने करम को कोसना या कलिकाल का प्रभाव बता कर राहत पाने का प्रयत्‍न करना, मध्‍यकालीन 'कहां जार्इं का करीं' की व्‍यग्रता को प्रकट करता है जिससे भक्ति आन्‍दोलन का जन्‍म होता है यह गलत नहीं लगता। ऐसी व्‍याख्‍या करने वालों को हमने अपने राष्‍ट्रीय एकजुटता के अभियान के कारण दरकिनार किया पर मार्क्‍सवादी सोच में इनको संप्रदायवादी करार देकर उनका अपमान करना निष्‍ठुरता की पराकाष्‍ठा थी।

''मध्‍यकालीन पीड़ा़ की अवहैलना करना गलत है। हिन्‍दुओं के मन में अंग्रेजी राज से राहत अनुभव हुई यह सही है। यह राहत हिन्‍दू मध्‍यवर्ग को, जो तकनीकी अर्थ में तब तक अस्तित्‍व में ही न था, इसलिए इसे मझोला तबका कह सकते हैं, अधिक अनुभव हुई क्‍योंकि किसान और छोटे भूस्‍वामी इसी कोटि में अाते थे। हस्‍तशिल्‍प से जुड़े समाज की, उनकी भी जिनको इस्‍लाम कबूल करने की विवशता न पैदा हुई थी, मध्‍यकाल में वह दुर्दशा नहीं झेलनी पड़ी थी जो कंपनी राज के साथ झेलनी पड़ी और वे कुशल कामगारों से खेतिहर मजदूरों में बदल गए ।

''इसलिए यह एक ऐसी जटिल समस्‍या थी जिसका बहुत बारीकी ओर ईमानदारी से अध्‍ययन किया जाना चाहिए था, जो उस राष्‍ट्रीय एकजुटता की कोशिशों के कारण और बाद में वामपंथी सोच के कारण उपेक्षित रह गया और इतिहास की व्‍याख्‍या का स्‍थान राजनीतिक नारेबाजियों ने ले लिया।

''परन्‍तु इन दोनों आंदालनों में एक समझ साफ थी कि हम अतीत के जहर से वर्तमान को निर्विष नहीं बना सकते और सदभाववादियों का यह सोचना कि यदि हम उस इतिहास को भुला दें तो उसके वे प्रभाव भी नष्‍ट हो जाएंगे जो हमारी चेतना के अंग बन चुके है, गलत था।

''हम इस पर आगे चल कर विचार करेंगे। अभी तो इतना ही कि इन कटु अनुभवों और स्‍मृतियों के बाद भी मध्‍यकाल में वह सामुदायिक घृणा नहीं थी, जो उन्‍नीसवीं शताब्‍दी में पैदा हुई।''

''अजीब घोंचू हो यार। इतनी त्रासदियां, इतनी यातनाएं और इतने तरह के उत्‍पीड़न गिना दिए, अभी तो तुमने जजिया को लिया ही नहीं और फिर भी कहते हो मध्‍यकाल में सांप्रदायिक घृणा नहीं थी ।''

मध्‍यकालीन पीड़ा के तर्क थे, कारण थे, अत्‍याचार को सही मानने का एक बहाना था, वह ग्रन्थि जो किसी निरपराध के प्रति अत्‍याचार या अन्‍याय के कारण अपनी नैतिक चेतना द्वारा अपने को अपराधी ठहराने के बाद उसे चेतना से ओझल करने के लिए उस व्‍यक्ति, समुदाय या वस्‍तु, क्रिया के प्रति अन्‍धप्रतिक्रिया को पैदा करती है, जिस पर हमारा नियन्‍त्रण नहीं रह जाता और‍ जिसे हम घृणा के रूप में व्‍यक्‍त करते हैं वह मध्‍यकाल के उन तत्‍वों में भी नदारद थी जिनको हम विदेशी मूल का या अपनी विदेशी पहचान पर गर्व करने वाला मानते हैं। वे यदि अत्‍याचार करते थे, तो इसकी उनके मन में ग्‍लानि न होती थी, इस पर गर्व करते थे, इसलिए यह ग्रन्थि का रूप नहीं ले पाती थी।

किन्‍हीं परिस्थितियों में धर्मान्‍तरित हिन्‍दू विरल अपवादों को छोड़ कर जिनमें वे अपने व्‍यक्तिगत लाभ के लिए अपने को सच्‍चा मुसलमान सिद्ध करने के लिए किसी सीमा तक जा सकते थे, उनको छोड़ कर, किसी में यह घृणा का रूप नहीं ले सकती थी और यह कहने की आवश्‍यकता नहीं कि घृणा का रूप ले लेने के बाद अनर्थ की कोई सीमा नहीं रह जाती।''

''तुम्‍हारी बातें समझ में नहीं आतींं यार। जहां तक मैं समझ पाया हूं, तुम धर्मान्‍तरित हिन्‍दुओं में से अभिजात और महत्‍वाकांक्षी हिन्‍दुओं को ही हिन्‍दुओं से घृणा करने वाला मान रहे हो और आक्रमणकारियों को, उनकी औलादों को अभियोग से बरी कर दे रहे हो।''

''इसलिए कि उनके मन में कोई ग्‍लानि न थी, धार्मिक आवेश था जिसमें वे अपने जघन्‍यतम अत्‍याचार पर उसकी जघन्‍यता के अनुपात में ही गर्व भी अनुभव करते थे। इसे समझने के लिए धैर्य और आत्‍मसंयम की, विवेक की आवश्‍यकता है।

पहली बात तो यह कि मैं जो कुछ कहता हूं उसे सही माना जाय यह गलत है, किसी अन्य कारण से गलत माना जाय यह उससे भी अधिक गलत है, इसके बाद ही यह निवेदन करना चाहता हूं कि अत्याचार, दमन, उपेक्षा, तिरस्कार और घृणा में फर्क किया जाना चाहिए।

दूसरी भौतिक कारणों से उत्पन्‍न मनोवृत्तियां या विकृतियां हैं और घृणा अपने कमीनेपन केे बोध के ग्रंथि में बदल जाने की वह प्रक्रिया है जिससे घृणा करने वाला भी अवगत नहीं रहता और वह उन्हीं कृत्यों की पुनरावृत्ति करता जाता है जिनके कारण उसके मन में अपने प्रति घृणा पैदा हुई और इसके दाह से अपने को बचाने के लिए उसने इसे उन पर स्थानान्तरित कर दिया जिनके प्रति उसने स्‍वयं अन्याय किया था।

मात्र इस सीमा में मैं कहना चाहता था कि मध्यकाल में धर्मान्तिरित अभिजात हिन्दु्ओं में से अपने निजी उत्थान के लिए लालायित हिन्दुओं ने हिन्दुओं से भले घृणा की, मुसलमानों में धर्मान्तरित हिन्दुओं ने अपनी विवशता में जो हिन्दू समाज में लौटने के दरवाजे बन्द हो जाने के कारण द्विगुणित हो जाती थी, हिन्दू मूल्यों मानों, सांस्कृतिक प्रतीकों को यथासंभव अपनी चेतना और जीवन में स्थान दिया, अत: हिन्दुओं से उनका अपनेपन का नाता था। अधिक बड़ी संख्या ऐसे मुसलमानों की ही थी इसलिए यह कह सकते हैं कि उस समय की परिस्थितियों में दोनों धर्मों के सबंध धर्म से अधिक हैसियत और आकांक्षा और महत्वा कांक्षा से निर्धारित थे और उसमें विदेशी मूल का दावा करने वालों के भी हिन्दुओं के साथ जटिल और बहुरूप रिश्ते थे, जिनमें दमन और धौंस भी सम्मिलित थी, परन्तु घृणा नहीं । इसलिए हमें इस समस्या को कुछ धैर्य से, अनुत्तेजित रह कर समझना होगा। यह काम आज तो नहीं, कल किया जा सकता है।

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