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हिन्दुत्व से घृणा का इतिहास - 14

‘‘सच बताना, कल तुम मेरे सवालों का अनुमान करके घबड़ाकर भाग खड़े हुए थे या नहीं ?’’

‘‘मैंने दो बातें कही थीं, पहली यह कि ‘‘तुलसी तर्कवाद के आघात से बचने के लिए आस्थावाद का सहारा लेते हैं और उनका आन्दोलन अधिक सफल रहा यह तुम परिणामों से समझ सकते हो । दूसरे वर्णवाद हिन्दू समाज का सबसे अरक्षणीय पक्ष था यह गलत है। सबसे दलित और दुर्गति में जीने वाली जातियों में से किसी ने धर्म परिवर्तन नहीं किया। यह बात तुम्हारे भेजे में आई या नहीं? इसके बिना तुमसे बात ही नहीं हो सकती।’’

‘‘देखो, सफलता सही होने का प्रमाण नहीं है। मैं मानता हूं तार्किक सन्तों, जिसके कारण ही उन्हें ज्ञानमार्गी भी कहा जाता रहा है, को निष्प्रभाव करने में तुलसी को असाधारण सफलता मिली, परन्तु समाज को ज्ञानविमुख या बौद्धिकता से शून्य, पोंगापन्थी बना कर उन्होंने सिद्धों और सन्तों के किए कराए पर पानी फेर दिया और उनके कारण कबीरपन्थ केवल कबीरपंथियों तक सीमित रह गया जो आज दलित कहने में अधिक आश्वस्ति अनुभव करते हैं। यदि तुलसी न होते तो सिख मत की तरह इनके पन्थ में भी ऊंची जातियों के लोग मिले होते और वह सामाजिक विषमता दूर हो गई होती फिर दलित, पिछड़े या सवर्ण का भेद मिट गया होता। तुलसी ने हिन्दू समाज को उस अगले पड़ाव से लौटा कर हजारों साल पीछे के उस चरण पर पहुंचा दिया जब वेद की ऋचा का उच्चारण करने पर शूद्रों की जबान काट ली जाती थी, और किसी के कान में वेदवाक्य सुनाई पड़ गया तो उसके कान में पिघला सीसा डाल दिया जाता था! गलत कह रहा हूं ?’’

‘‘तुम गलत कह ही नहीं सकते। गलतियां भी वे ही करते हैं जिनके पास समझ होती है और सही गलत का फर्क समझते हैं। तुम अक्ल बेंच कर खानेवाले लोग हो, खरीदार कोई मिल जाय, उसका काम पूरी ईमानदारी से करोगे, जैसे वकील करता है या सुपारी किलर करता है। तुम जब कहते हो आज से साढ़े तीन हजार साल पहले, अर्थात् ईसाइयत और इस्लाम की पूरी अवधि को जोड़ लो उससे पहले किसी ने किसी किताब में पता नहीं किस बात से खीझ या अपमानित अनुभव करके यह कामना की थी। यह कभी अमल में आया इसका प्रमाण नहीं! अमल में आ ही नहीं सकता था इसका प्रमाण है क्योंकि यज्ञ के लिए जिसमें वेदमंत्रों का पाठ होता था, उनमें नाई आदि भी भाग लेते थे। यज्ञ सच पूछो तो एक समारोह होता था जिसमें बहुत सारी मातृप्रधान अवस्थाओं की रीतियां भी चलती थीं। यह संभव ही न था शूद्र के कान में वेदमंत्र न पड़े। हां, मंत्रों का सही उच्चारण वे नहीं कर सकते थे! वह तो ब्राह्मणों में भी बहुत कम कर पाते थे। सभी ब्राह्मण सुशिक्षित होते थे यह भी गलत है। पर इस बखेड़े में हम नहीं जाते।

‘‘तुलसी की असली लड़ाई इन सुधारवादियों से नहीं थी, या थी तो इस कारण थी कि ये जिसे बचाना चाहते थे उसे ही दांव पर लगा रहे थे।’’

‘‘क्या थी वह चीज जिसे तुलसी बचाना चाहते थे ? जरा मैं भी तो सुनूं ।’’

‘‘उदारता, सहृदयता, विचारों की स्वतन्त्रता, बहुदेववाद, अद्वैतवाद ।’’

उसने इतने जोर का ठहाका लगाया कि रसोई के बर्तन भी झनझना उठे । हंसते ही हुए बोला, ‘‘वर्णवाद और जातिवाद का तो नाम लेने का भी साहस नहीं हुआ तुम्हें ।’’

‘‘वह भी, वह भी । यह जानते हो गांधी भी वर्णधर्म को मानते थे और उसे बदलने के लिए कृतसंकल्प थे। इसी आधार पर उन्होंने अपने पुत्र का विवाह राजाजी की पुत्री से करने का विरोध किया था कि वह ब्राह्मण थे यह बनिया और स्वयं दूसरों का मल मूत्र उठाने और अपने मल का स्वयं निस्तारण करने को भी तैयार रहते थे। तुम्हें वाल्ट ह्विटमैन की सांग आफ माइसेल्फ की वह पंक्ति याद है जिसे मैंने पीछे की एक पोस्ट में कभी उद्धृत किया था
The past and present wilt—I have fill'd them, emptied them.
And proceed to fill my next fold of the future.

Listener up there! what have you to confide to me?
Look in my face while I snuff the sidle of evening,
(Talk honestly, no one else hears you, and I stay only a minute longer.)

Do I contradict myself?
Very well then I contradict myself,
(I am large, I contain multitudes.)

ये पंक्तियां जितनी गांधी पर लागू होती हैं उससे भी अधिक सटीकता से तुलसीदास पर लागू होती हैं । उन्होंने अतीत और वर्तमान को अपने ढंग से भरा था और अपने ढंग से खाली कर दिया था और भविष्य को उस नष्ट हो रही और उत्साहपूर्वक नष्ट की जा रही संपदा से भरने जा रहे थे। चालबाजी मत करो, मैं ह्टिमैन के ही शब्दों को दुहराता हुआ पूछता हूं, मेरे और तुम्हारे बीच कोई तीसरा नहीं है, कोई सुन नहीं रहा है, इस छोटे से लमहे में ईमानदारी से कहो क्या तुम तुलसी को वही समझते हो जो आज के कुछ भी बेच कर कुछ भी कमा लेने की हड़बड़ी में बच्चे अपने पिता और पितामह का वह अनमोल शहनाई बेच आते हैं जब कि वह कलासाधक आठ गुणा दश के कमरे में अपनी महिमा को संभाले रहा, झुका नहीं और इस बच्चे के पास रहने को नया मकान भी है।

‘‘तुम ह्टिमैन की व्यग्रता को समझ सकते हो क्योंकि वह अद्वैत के नये ज्ञान से प्रेरित और उसे अपना बना कर पेश करने की बेचैनी से और अपने को सौ प्रतिशत अमेरिकन सिद्ध करने की और मुक्त छन्द में अपनी बात कहने की व्यग्रता थी, पर गांधी और उनसे भी पहले तुलसी की व्यग्रता को तो समझा ही नहीं जा सकता।

‘‘विचित्र बात है यार, गांधी से पहले वर्णव्यवस्था को तोड़ने के कई आन्दोलन चल चुके थे ! ब्रह्मसमाज, आर्यसमाज, प्रार्थनासभा, थियोसोफी, इसके बाद भी गांधी उस परंपरागत ढांचे को मानते हैं, लगेगा पीछे जा रहे हैं, पर वह इसे भीतर से तोड़ते हैं। कठिन चुनौती है, स्वयं वह काम करो, अपने लिए ही सही तो वह परहेज दूर हो जाएगा जो तुम मलिन पेशों से जुड़े लोगों के साथ बरतते हो। दूसरे लोग ढांचे को नकार रहे थे, गांधी चेतना के रूप को बदलना चाहते थे।

‘‘तुमने तो साढ़े तीन हजार साल पीछे जा कर एक अकल्पनीय दंड विधान का सहारा लिया हिन्दू समाज और वर्णव्यवस्था को गर्हित सिद्ध करने के लिए! कुछ लोग इसके लिए शंबूक और एकलव्य के पौराणिक चरित्रों को इतिहास का सत्य मान कर यही करते हैं, परन्तु हिन्दू समाज के इतिहास में जा कर खोज करते हुए इन उदाहरणों के सहारे हिन्दू समाज की भर्त्‍सना करने और उन्हें ईसाइयत अपनाने के लिए प्रेरित करने वालों के केवल पांच सौ साल पहले के इतिहास केा, तीन सौ साल पहले के इतिहास को, उससे पीछे के इतिहास को तो देखा होता जिसमें उन व्यक्तियों को महापुरुष बना दिया गया जिन्होंने नृशंसता की मिसालें पेश कीं, जिन्होंने अंधविश्‍वास पैदा करने और प्रलय का भय दिखाने के लिए आगजनी की, अपने ही समाज के चिंतकों का यातनावध किया और सुन्दरियों को जिन्दा जलाते रहे, धार्मिक मतभेद के कारण कैथरों की पूरी बस्ती को आग के हवाले करते रहे और अपने इस कुकर्म के लिए इन्नोसेंट कहे जाते रहे ।

‘‘तुम तो इतिहास की बुराइयों की बात करते हो, हमारे वर्तमान समाज में बुराइयां हैं जिन्हें दूर करना है। मैडम मेयो ने इनको ही दर्ज करते हुए ‘मदर इंडिया’ लिखा था और गांधी जी ने उसे सैनिटरी इंस्पेक्टर की रपट कहा था। इसे मैं आसानी से समझा नहीं सकता कि गांधी एक ओर भारतीय समाज को चेतना के स्तर पर बदलना भी चाहते थे और जब तक वह बदलाव नहीं आ जाता तब तक बाहरी ढांचे को तोड़ना नहीं चाहते थे। उनकी परिभाषा में यह हिंसा थी। इससे बनने वाला समाज एक भिन्न तरह की कट्टरता का शिकार हो जाता है। यह कट्टरता तुम्हें आर्यसमाज में भी मिलेगी। अन्तिम सत्य तक पहुंचने और उससे भिन्न को सहन न करने या दूसरों को बदलने पर स्‍वयं को न बदलने का आग्रह।

''तुमने कभी गौर किया कि गुरुकुलों में कठोर आदर्शो के लिए जिनमें कुछ अपालनीय थे, जैसे ब्रह्मचर्य, जगह थी, पर कला, संगीत, साहित्य, विनोद के लिए स्थान नहीं था जिनके बिना मनुष्य पुच्छविषाणहीन पशु बन जाता है। वे उसकी संवेदनशलीता को नष्‍ट करके कट्टर बना देते हैं। वही कट्टरता जिसके लिए हम इस्लाम को दोष देते हैं वह आर्यसमाज में भी रही है, सभी एकेश्‍वररवादी मतों में होती है क्योंकि वे अपनी समझ से अन्तिम सत्य पर पहुंचे हुए लोग होते हैं। पता नहीं गांधी इसे इस रूप में देखते या सोचते थे या नहीं तुलसी इसी तरह सोचते दिखाई देते हैं।’’

वह कुछ कहना चाहता था, मैंने रोक दिया, ‘‘तुम यह मत देखो कि वह वर्णव्यवस्था का समर्थन करते हैं या नहीं। यह देखो कि उनके मर्यादा पुरुषोत्तम क्या करते हैं। यह देखो कि वाल्मीकि रामायण के किस अंश का उपयोग वह करते हैं और किनको किनारे डाल देते हैं।

राम मर्यादापुरुषोत्तम हैं और उनका आचरण एक नयी मर्यादा, एक नई सामाजिक संहिता का निर्माण करता है। देखो निषाद के साथ उनके बन्धुत्व को, आदिवासियों के साथ उनके मैत्रीभाव को, शबरी के जूठे बेर को खा रहा है मर्यादा पुरुषोत्तम । सन्‍यासियों और तपस्वियों की मनोग्रन्थि के उनके चित्रण को वाल्मीकि रामायण में प्रक्षेप करके उसमें उत्तरकांड जोड़ने वालों की विवशता जो भी रही हो, तुलसी के यहां शंबूक नहीं मिलेगा, सीता का निर्वासन नहीं मिलेगा, महिलाओं के प्रति पात्रों और परिस्थितियों का निर्वाह करते हुए वे नाटकीयता के तकाजे से जो कुछ कहते हैं उसे तुलसी का विचार मत मान लो, इस पर ध्यान दो कि वह समस्त जगत को सियाराममय मानते हैं। बहुत सारे पोथे तुलसी पर लिखे गए हैं, मुझे उनकी चेतना में उतर कर उनका और उनकी कृतियों का विष्लेषण करने वाला कोई ग्रन्‍थ्‍ा देखने मे नहीं आया ।’’

‘‘तुम बोलने पर आते हो तो थकते भी नहीं । अक्ल की बात न सही, थकान के कारण अपनी बेवकूफी से तो बच सकते हो !’’

बोलते बोलते मैं नहीं थका पर सुनते सुनते तुम थक जरूर चुके हो, पर अभी तो मैं विषय पर आया ही नहीं था। जैसी तुम्हारी किस्मत। एक तो तुम्हारी झोली छोटी, दूसरे नीचे से फटी हुई, कुछ ठहरता ही नहीं !

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