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हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास - 19

मैं तुलसी की महिमा या क्रान्तिकारिता बखानने के लिए उनका जिक्र नहीं कर रहा था। प्रशंसा में 'क्रान्तिकारी' विशेषण लगा दिया फिर चर्चा उधर मुड़ गई । एक शब्द पूरी चर्चा हो और पेटी में उगा मामूली सा कास या कहीं टिक गया एक पत्थर नदी की धार को मोड़ देता है । दार्शनिक चर्चा में सटीक प्रयोगों और प्रयुक्त शब्दों के सटीक आशय पर और न्याय विचार में तो विराम और अर्धविराम तक पर इसीलिए इतना बल दिया जाता है।

तुलसी महाकाव्‍य लिखने के कारण ही नहीं महाकवि हैं, वह कई दृष्टियों से विशद हैं, कोपियस। उनके लेखन में अपना जीवन, समाज का जीवन, अपनी पीडा, समाज की पीड़ा बहुत कुछ है जिस पर ध्यान नहीं दिया गया, या दिया गया तो उसे सही ढंग से रेखांकित नहीं किया गया, क्योंकि हम अपने मन्तव्य को हीटर की आंच देकर सेते रहे कि इससे जल्द चूजा निकलेगा। वह जल कर आमलेट के काम का भी नहीं रह गया।

तुलसी का बहुत बारीकी से अध्ययन करें तो उससे उन गुत्थियों को भी समझा जा सकता है जिनको टालू ढंग से निपटाया गया और इसलिए बहुत सारी ग्रन्थियां और सामाजिक समस्यायें पैदा हुईं। जिन दिनों बाबरी का ध्वंस नहीं हुआ था, उस पर विवाद चल रहा था, मेरे मन में कोई संशय न था कि वहां राममंदिर था। फिर भ्‍ाी मैं बाबरी मस्जिद को गिराने का विरोधी था और उसे बचाने के लिए जो तरीके
अपनाये जा रहे थे उनका भी विरोधी था और एक साल पहले कहा था कि यदि यही तरीका अपनाया गया तो यह ढांचा गिर कर रहेगा।

इसके ब्यौरे में यहां जाना ठीक न होगा, इसे उस समय प्रकाशित अपने दो लेखों - धर्मनिरपेक्षता का उन्माद और सांप्रदायिकता की महाव्याधि - में मैंने समुचित विस्तार से दिया था। पर जिस कारण तुलसी के प्रसंग में यह याद आया वह यह कि उस समय मस्जिद कमेटी के लोंगों द्वरा तर्क दिया जा रहा था कि उस जगह पहले कोई मन्दिर नहीं था यदि रहा होता तो तुलसी ने इसका उल्लेख अवश्‍य किया होता, उस समय मुझे यह खलता था कि इस आधार पर तो बाबरी मस्जिद को बचाया ही नहीं जा सकता । सचाई यह है कि जिन कारणों से मैं इस विषय में सुनिश्चित था कि वहां पहले राम का जन्‍मस्‍थान मंदिर था उनमें एक, मेरे लिए सबसे विश्‍वसनीय, कारण तुलसीदास का एक प्रयोग ही था।

यदि मध्यकालीन जबांबन्दी के बीच दबे सुरों और संकेतों को कोई पढ़ नहीं सकता तो वह तुलसी के उस आर्तनाद को नहीं समझ सकता जिसका सही अनुमान हमें है ही नहीं! वह व्यग्र आत्मा, बेचैन, व्यक्तिगत पीड़ा से नहीं, उस सामाजिक असुरक्षा और अधोगति से जिसके निवारण के लिए वह एकल संग्राम करता है, पर विवश अनुभव करता है- कबहुं न नाथ नींद भरि सोयो!

इतने कम और इतने सादे ढंग से अपनी तड़प, अपने आजीवन संघर्ष, और अपने असन्तोष को व्यक्त करने की क्षमता बहुत कम कवियों में देखने को मिलेगी। इस भाषा को, इस वेदना को समझने के बाद ही हम समझ सकते है कि ‘‘मसीत को सोइबो’’ का अर्थ क्या है। यह कोई एक मस्जिद नही, वही मस्जिद है जिसे रामजन्मभूमि मन्दिर कहा जाता था और जिसके कारण ही बाद तक इसके दो नाम थे। एक राम से जुड़ा दूसरा बाबर से जुड़ा।

जो लोग रामचरित मानस का जाप करते हैं, उसके दोहों, चैपाइयों के चित्र खींचते और विचित्र पाठ करते हैं उनमें से कितनों ने रामचरित मानस को लिखने की प्रेरणा, व्यग्रता और दृढ़ निश्‍चय को जानते हैं। 'मसीत को सोइबो' और इसी कारण 'जोलहा कहो कोऊ' में एक स्वीकारोक्ति है, विवशता है और उसके पीछे एक दर्प और विश्‍वास है और इस अनुभव के पीछे ही वह संकल्प है कि मैं इसको बदलूंगा, इससे मुक्ति दिला कर रहूंगा। विनम्र संकल्प जो आजीवन बना रहता है, ऐसी हठ जैसे गांठ पानी परे सन की ।

इसी के बल पर तुलसी वह कह सके जिसे कहने का साहस मध्यकाल में किसी और के पास न था और वह कर सके जिसे करने का बोध और विवेक किसी अन्य में न था और इसी कारण मध्ययुग की तो न कहूंगा पर अंशतः मध्ययुग की, विशेषतः अकबर काल की हिन्दुओं की पीड़़ा के सांकेतिक चित्रण तुलसीदास में मिलते हैं, उतने किसी अन्य कवि ही में नहीं मिलते, किसी अन्य स्रोत से नहीं मिलते।

और इसी से यह भी पता चलता है कि हिन्दुओं का मध्यकाल में धर्मान्तरण किन परिस्थितियों में हुआ और क्यों वे मुसलमान बन जाने के बाद भी हिन्दू बने रहना चाहते थे, या हिन्दू मूल्यों, मानों और आदर्शों को निभाना चाहते थे। कोई समझना चाहे तो इसी से तुलसी के पूर्ववर्ती कबीर का भी निदान हो जाता है कि क्यों वह मुस्लिम परिवार में पैदा हो कर जिस नए पंथ की बात कर रहे थे वह हिन्दू आदर्शों और प्रेरणास्रोतो, वाग्विधानों से लैस है ? क्यों इस बोध ने कि हम कुछ भी कर लें, हिन्दु समाज हमें अपना नहीं सकता, अपना एक अलग समाज हम बनाना चाहें भी तो वह लचर ही रह जाता है वह विवशता पैदा की कि रहना जिस समाज में है उसकी अपेक्षाओं पर पूरा उतरने के लिए हमें वह करना होगा ि‍जिसकी मांग वे हमसे करते हैं। इसमें गोकुशी भी थी और अपने ही बन्‍धुओं से जिनसे वे भीतरी लगाव अनुभव करते थे उनके प्रति अत्‍याचार भी।

इस्लामीकरण की प्रक्रिया और धर्मान्तरित मुसलमानों की विवशता, गंगाजमुनी संस्कृति के निर्माण और नवधर्मान्तरित अभिजात हिन्दुओं की कट्टरता, इन समस्याओं को समझने में जितनी महत्वपूर्ण भूमिका तुलसीदास की है वैसी किसी काल के किसी कवि की नहीं। मध्‍ययकालीन प्रशस्तिलेख्‍ान करने वालों की भी नहीं जिसे मध्‍यकालीन इतिहास कहा जाता रहा। आज के भी किसी कवि की नहीं क्योंकि आज के लेखक वह आग बेच कर बड़ा बनने के चक्कर में पड़े रहे जिसे जिसे जिलाए रखने के और इस बात के प्रयास में जल कर राख बन जाने के कारण ही वह विभूति बनता है। वे सब कुछ पाना चाहते हैं, संभूति भी, विभूति भी
और कूडे की ढेर में बदल जाते हैं, यही त्रासदी है इस क्षण की।

हम अपनी बात पर आएं, हिन्दुओं के इस्लामीकरण की प्रक्रिया को समझने की। हमें समझाया जाता रहा कि वर्णव्यवस्था से उत्पीड़ित जनों ने इस्लाम ग्रहण किया, इसे पहले गलत सिद्ध कर चुका हूं। तलवार के जोर पर या बलप्रयोग से हिन्दुओं को मुसलमान बनाया गया यह पूरा सच नहीं है, इसको सत्ता समर्थित धार्मिक उद्दंडता से समझा जा सकता है।

यदि अकबर तक के शासनकाल में मुस्लिम उचक्के घरों के भीतर घुस कर सिल बट्टों को, चक्‍की और जांत को, कहें पत्थर के किसी उपकरण को मूर्ति मान कर तोड़ सकते थे तो पूरे मध्यकाल की सचाई को समझने में यह विवरण उपयोगी होगा। इस उचक्कापन में ऐसे पेशों के लोगों के घर में बना सामान - सूत, कपड़ा, रंगा हुआ वस्त्र लुटने लगे तो जुलाहों और रंगरेजों को तो मुसलमान बनना ही था।

अकाल इस देश में मौसमी विपर्यय के कारण आते ही रहे हैं, अब नितान्त असह्य स्थिति में अन्न के अभाव मे यदि फीरोजशाह तुगलक की तरह पूरे शहर में भूखों को मुफ़त भोजन देने के लिए जगह जगह व्यवस्था करे तो , उसमें वे जो अकाल दुकाल में अपने बेटों बेटियों को बेचने को विवश हो जाते रहे हों वे बिके हुए बच्चे और उसके बाद विवशता में मुसलमानी खाना खाने के बाद अपने ही आकलन में वे हिन्दू नहीं रह जाते थे उनकी ओर ध्‍यान नहीं दिया गया ।

फिर भी हिन्दू न रह पाने की पीड़ा उन्हें हिंदू रीतियों, पर्वों और समारोहों से तो जोड़ता ही था इस्लाम की ‘पवित्रता’ को भी नष्ट करता था! और वर्णव्यवस्था के अभिमानी हिन्दुओं के इस्लाम में किन्हीं अवांछनीय या अकथनीय कारणों से धर्मान्तरित होने के बाद या अपने घर वापसी का दरवाजा बन्द देख कर कट्टर और हिन्दूद्रोही चरित्र अपनाने के भी संकेत मिल जाएंगे। अन्तिम का उदाहरण तो स्वयं तुलसीदास हैं जिन्हें पुरातनपंथी ब्राह्मणों के हाथों जितना अपमान सहना पड़ा उससे उद्विग्न हो कर यदि वे सचमुच जोलहा हो गए होते तो ऐसे लकीर के फकीर लोगों के प्रति अपने आक्रोश में वह क्या नहीं कर सकते थे।

परन्तु तुलसी से जो एक बात प्रकट होती है वह यह कि मध्यकाल में धार्मिक टकराव था, अपनी रक्षा की चिन्ता थी, अपने प्रसार की विफलता का पराजयबोध भी रहा होगा, परन्तु समुदायों के प्रति आपसी घृणा नहीं थी। एक विचित्र बात यह कि जिस हिन्दुत्व से इस्लाम परस्तों का टकराव था उसके उन मूल्यों के प्रति उनके मन में सम्मान था, यहां तक कि सती प्रथा तक के प्रति, जिनको समझने से परहेज करके हमारे बुद्धिजीवी अपनी पवित्रता की रक्षा करते हैं।

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