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हिंदुत्व के प्रति घृणा का इतिहास - ३८
क्षेपक-2

हम अपने श्रद्धेय जनों के प्रति आदरसूचक विशेषण लगाना पसन्द करते हैं, जैसे महर्षि, महात्मा, महामना, स्वामी परन्तु पश्चिमी विभूतियों के प्रति कृपणता बरतते हैं। यह आदत गोरों में भी थी और पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, परन्तु है यह बुरी आदत, रुग्णता का परिचायक भी, ग्रंथि से जुड़ी - वह अहंताग्रंथि हो, या अकिंचनता ग्रंथि- मोटापा हो या कृशता, हैं तो दोनो व्याधियां।

यह भूमिका इसलिए कि यूरोप में (उससे बाहर का तो कुछ पता ही नहीं), ऐसी अनगिनत विभूतियां हैं जिनके साथ ऐसे विशेषण लगाने का प्रलोभन होता है और उस दशा में हम मैकाले के साथ महामना लगाएं तो अनुचित न होगा। वह उस परंपरा में आते हैं जो वाल्तेयर से आरंभ होती और जेफर्सन और टाम पेन से होती उन तक आती है। इसके बाद भी हिन्दीवालों ने उनका तिरस्कार किया। परन्तु आपको तो 'हिन्दीवाला' का अर्थ भी पता न होगा। जैसे दारूवाला, बाटलीवाला, सब्जीवाला, चायवाला, मिठाईवाला होता है, उसी तरह हिन्दीवाला भी होता है, हिन्दी को बेच कर अपनी महिमा की दुन्दुभी बजाने वाला। हिन्दी में काम-काज करने की जगह हिन्दी दिवस और हिन्दी पखवाड़ा मनाने वाला, विश्व हिन्दी सम्मेलन करने वाला, हिन्दी पर सवार होकर बड़ा बनने वाला। हिन्दीभाषी समाज में हिन्दीवालों का अलग संप्रदाय सेठ गोविन्ददास के साथ ही आरंभ हो गया था और इसने हिन्दी का अंग्रेज़ी से अधिक अहित किया। यह कम पखारने और अधिक बघारने वालों की जमात है, परन्तु यदि मैं कहूं कि यह हिन्दी तक सीमित है तो अन्याय होगा। यह भारतीय पहचान बन गई है और हिन्दीवालों से अधिक अंग्रेजीवालों में पाई जाती है। उथलापन और परनिर्भरता हमारा बौद्धिक पर्याय बन चुका है। भांग कुंए में ही घुली हुई है, इसके बिना आजादी की मस्ती का मजा ही नहीं लिया जा सकता था।

मैं आज आपके और मैकाले के बीच नहीं आना चाहता था। इच्छा थी कि उनके संगत व्याख्यानों या लेखों आदि से जुटाए गए कुछ उद्धरणों को सामने रख दूं कि आप बिना किसी हस्तक्षेप के स्वयं अपनी राय बना सकें, परन्तु कुछ बिन्दुओं की ओर ध्यान दिलाना जरूरी है, क्योंपिक पाठक तो बादशाह होता है और लेखक को इसरार करना होता है कि हुजूर इसे तो देखिए, इसके लिए ही अपनी शैलियां और युक्तियां और विधाएं और मंच चुनता रहता है पर बादशाहत का मिजाज कि सारे करतब करने के बाद भी वह जहां तक पहुंचना चाहता है, पहुंच नहीं पाता। सो बीच बीच में ध्यानाकर्षण के लिए मुझे अल्पतम वाक्यों में हस्तक्षेप करना ही होगा। इसे हम आरंभ से ही आरंभ करते हैं। अधकचरी सोच के लोगों ने हिन्दी राज स्थापित करने के लिए चला दिया कि अंग्रेजी ने हमारा अहित किया, वह न होती तो भारतीय कामकाज की हिन्दी होती, उन्हें यह भी पता नहीं कि अंगेजी से परिचय के बिना हिन्दी हिन्दी भी नहीं बन सकती थी। इससे पहले किसी ने सोचा ही नहीं था कि गद्य में भी कोई महत्वपूर्ण बात कही जा सकती है। भारतीय भाषाओं के विकास में अंग्रेजी का इतना योगदान है कि उससे परिचित होने से पहले हम सही वाक्य तक नहीं लिखते थे, वाक्य की जगह लकीर लिखते थे। उर्दू में ही नहीं, हिन् दी में भी एक शब्द को दूसरे से अलग किए बिना पूरी लकीर लिखी जाती थी और परी लकीर की एक ही शिरोरेखा हुआ करती थी। इसमें विरामचिन्हों के नाम और महत्व का बोध तक न था। एक ही विराम दम तोड़ ने वाला, अन्तिम गति, पूर्णविराम और दुहरे अन्त के लिए दुहरा पूर्णविराम। मैं इस पर अधिक बोलने चला तो विषयांतर होगा और स्थानाभाव और समयाभाव अलग से।
मैकाले पर ठीकरे फेंकने के लिए उनके एक ही कथन को तोड़ कर पेश किया करते हैं । वह अंश निम्न प्रकार हैः
We must at present do our best to form a class who may be interpreters between us and the millions whom we govern, --a class of persons Indian in blood and colour, but English in tastes, in opinions, in morals and in intellect.
इसे कब किसने कहां उद्धृत किया था इसका मुझे भी पता नहीं. श्रम के मामले में आलसी होने के कारण इन वाक्यों को लोग अपने तरह से ले उड़ते हैं, और यह जांचना तक गवारा नहीं करते कि यह कब , कहां और किन परिस्थितियों में अन्तिम विकल्प के रूप में सुझाया गया था और दूसरे इन इबारतों को उद्धृत करते हुए अपनी मुश्किल को आसान बनाते रहे हैं और मूर्खता का विस्तार करते हुए इसे ही अपनी राष्ट्रीय पहचान बनाते जा रहे हैं। इस अंश के ठीक व बाद में आए वाक्यांश को छोड़ देते रहे हैं। पूरा कथन निम्न प्रकार है,
I feel with them that it is impossible for us, with our limited means, to attempt to educate the body of the people. We must at present do our best to form a class who may be interpreters between us and the millions whom we govern, --a class of persons Indian in blood and colour, but English in tastes, in opinions, in morals and in intellect. To that class we may leave it to refine the vernacular dialects of the country, to enrich those dialects with terms of science borrowed from the Western nomenclature, and to render them by degrees fit vehicles for conveying knowledge to the great mass of the population.
मुझे डर है कि इस गति से मुझे मैकाले को प्रस्तुत करने का अवसर नहीं मिलेगा इसलिए उनके विचारो को निम्न रूप में समझें।
वह पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने कहा कि भारत के प्रशासन में भारतीयों को शामिल किया जाना चाहिए. उनका यह भाषण ब्रिटिश सन्सद में १० जुलाई १८३३ के हैं और उसी साल ब्रिटिश संसद से ऐक्ट पास हुआ जिसमें भारतीयों को प्रशासनिक सेवाओं में शामिल करने का अवसर तैयार हुआ और इसके असफल क्रियान्ववयन के कारण ही एक नया मोड़ आया. आगे का पथ आप पर छोड़ने के अलावा कोई उपाय नहीं यह याद दिलाना जरुरी है कि आरम्भ के अंश उस अधिनियम के हैं जो १९३५ मैं पारित हुआ और बाद के अंश ब्रिटिश पार्लियामेंट में १० जुलाई 1833 के उनके भाषण के. कुछ बहुत मार्मिक अंशों को जो उनके पत्राचार आदि से हैं स्थानाभाव के कारण छोडना पड रहा है. यह भी यद् दिलाना जरुरी है कि एक राशि शिक्षा के नाम पर १८१३ में ही नियत की गयी थी पर वह आपतोषवादी थी. उसमे संस्कृत और अरबी की पढ़ाई कि छूट दी गई टी थी. पर मैकाले ने उसे ज्ञानाभिमुख बनाया. दुःख है कि बहुत कुछ कथनीय आ है पर कहने का अवसर नहीं:
Act of British Parliament in 1813 A sum is set apart "for the revival and promotion of literature, and the encouragement of the learned natives of India, and for the introduction and promotion of a knowledge of the sciences among the inhabitants of the British territories."
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All parties seem to be agreed on one point, that the dialects commonly spoken among the natives of this part of India contain neither literary nor scientific information, and are moreover so poor and rude that, until they are enriched from some other quarter, it will not be easy to translate any valuable work into them.
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What then shall that language be? One-half of the committee maintain that it should be the English. The other half strongly recommend the Arabic and Sanscrit. The whole question seems to me to be-- which language is the best worth knowing?
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I have no knowledge of either Sanscrit or Arabic. But I have done what I could to form a correct estimate of their value. I have read translations of the most celebrated Arabic and Sanscrit works. I have conversed, both here and at home, with men distinguished by their proficiency in the Eastern tongues.
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We have to educate a people who cannot at present be educated by means of their mother-tongue. We must teach them some foreign language.
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In India, English is the language spoken by the ruling class. It is spoken by the higher class of natives at the seats of Government. It is likely to become the language of commerce throughout the seas of the East.
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Within the last hundred and twenty years, a nation which had previously been in a state as barbarous as that in which our ancestors were before the Crusades has gradually emerged from the ignorance in which it was sunk, and has taken its place among civilized communities. I speak of Russia.
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The committee have thought fit to lay out above a lakh of rupees in printing Arabic and Sanscrit books. Those books find no purchasers. It is very rarely that a single copy is disposed of.
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Twenty-three thousand volumes, most of them folios and quartos, fill the libraries or rather the lumber-rooms of this body.
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The fact that the Hindoo law is to be learned chiefly from Sanscrit books, and the Mahometan law from Arabic books, has been much insisted on, but seems not to bear at all on the question. We are commanded by Parliament to ascertain and digest the laws of India.
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We are to teach it because it is fruitful of monstrous superstitions. We are to teach false history, false astronomy, false medicine, because we find them in company with a false religion.
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It is taken for granted by the advocates of oriental learning that no native of this country can possibly attain more than a mere smattering of English. They do not attempt to prove this.
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There are in this very town natives who are quite competent to discuss political or scientific questions with fluency and precision in the English language.
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If, on the other hand, it be the opinion of the Government that the present system ought to remain unchanged, I beg that I may be permitted to retire from the chair of the Committee. I feel that I could not be of the smallest use there.
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I believe that no country ever stood in need of a code of law as India.
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I feel that for the good of India itself, the admission of natives to high offices must be effected by slow degrees. But that, when the fullness of time is come, when the interest of India requires change, lest we should endanger our own power, this is a doctrine of which I can nor think without indignation. Governments, like men, may buy existence too dear.
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It is scarcely possible to calculate the benefits that we may derive from the diffusion of the European civilization among the vast population of the East. It would be, on the most selfish view of the case, far better for us that the people of India were rules by their own kins, but wearing our own broadcloths, and working with our cutlery than that they were performing their salams to English collectors and English magistrates but were too ignorant to value or too poor to buy English manufactures. To trade with civilized men is infinitely more profitable than to govern savages.
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What is power worth if it is founded on vice, or ignorance or on misery.
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We are free, we are civilized to little purpose if we grudge to any portion of human race an equal measure of freedom and civilization.
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Are we to keep people of India ignorant in order that we may keep them submissive or do we think that we can give them knowledge without awakening ambition? Or do we mean to awaken ambition and to provide no legitimate vent? Who will answer any of these questions in the affirmative? Yet any of these must be answered in the affirmative, by every person who maintains that we ought permanently to exclude the native from high office. I have no fears, the path of duty is plain before us, and it is also the path of wisdom, of national prosperity, of national honour.
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… that having become instructed in European knowledge, they may in some future age demand European institutions. Whether such a day will ever come, I know not. Whenever it comes, it will be the proudest day in English history.
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