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हिन्दुत्व से घृणा का इतिहास - 34
(मिला मिला न मिला फिर भी कुछ मिला तो सही. हुआ हुआ न हुआ फिर भी कुछ हुआ तो सही )

सर सैयद बहुत सफल आन्दोलनकारी थे। वह अपनी बात मनवाने के लिए किसी हद तक जा सकते थे - मुसलमानों को यह समझाना हो कि ईसाइयों से तो हमारा कभी झगड़ा हो ही नहीं सकता, या यह कि अंग्रेजों को इस बात की पूरी छूट होनी चाहिए कि वे हमें मनमाना लूट सकें; या यह कि अंग्रेज गए तो हमारे दिन भी लदे और हिन्दुओं को भी बुरे दिन देखने होंगे, क्योंकि उनके चले जाने पर सत्ता का जो संघर्ष होगा उसमें जीत हार किसी की हो, यूरोप की दूसरी ताकतें हमला करके इस देश पर कब्जा कर लेंगी और उनका शासन अंग्रेजों से बहुत अधिक क्रूर होगा; या यह कि कांग्रेस की स्थापना हिन्दुओं के हित के लिए हुई है; या यह कि कांग्रेस में कोई इज्जतदार मुसलमान शामिल हो ही नहीं सकता - कुछ को जोर जबरदस्ती शामिल किया गया है तो कुछ को पैसा दे कर खरीद लिया गया है, कुछ को फर्जी रईस करार दिया गया है तो एक दो ऐसे भी हैं जो अभी गलतफहमी में हैं पर कल को संभल जाएंगे; या यह कि हिन्दुस्तान का भला इसी में है कि हिन्दू मुसलमान दोनों में आपसी भाईचारा हो, तभी हम आगे बढ़ सकते हैं, परन्तु ऐसा अंग्रेजी राज्य के अधीन रह कर ही किया जा सकता है; चाहे यह कि यदि हिन्दू भार्इचारे की बात नहीं समझते तो कौमी दंगे होंगे ही, जो दबे सुर में जिन्ना की सीधी कार्रवाई की धमकी का पूर्वपाठ है; या यह कि उर्दू मुसलमानों की जबान है।

वह बहुत अच्छे आशुवक्ता थे और बहुत अच्छे वकील, जो गलत को भी सही सिद्ध कर सकते थे। इनमें से अधिकांश पहलुओं पर हम पीछे की कुछ पोस्टों में विचार कर आए हैं और यह भी निवेदन कर आए हैं कि अपनी समझ से वह अंग्रेजी राजशक्ति का अपने लिए उपयोग कर रहे थे, जब कि राजशक्ति उनका उपयोग अपने लिए कर रही थी। इस उपयोग के लिए उन्होंने अपने को स्वयं योजनाबद्ध रूप में समर्पित कर रखा था और इसलिए जैसा कि कभी मृणाल पांडे के साथ एक साक्षात्कार में एक प्रतिभाशाली नवोदित कलाकार ने स्वीकार किया था, कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है, सर सैयद अपनी ओर से ही बहुत कुछ खो कर राजशक्ति को याद दिलाते रहते थे कि अब तो कुछ दो । पर पीठ की थपकी मिली या वास्तव में कुछ हासिल हुआ ?

एक शोधनिबन्ध एक पाकिस्तानी ने एक फ्रेंच विद्वान के साथ मिल कर लिखा था जो पाकिस्तान जर्नल आफ History में शशश यह दयद 1964 में प्रकाषित हुआ था। अब तो लेखक का नाम भी याद नहीं पर इससे फर्क नहीं पड़ता । उसमें उसने हंटर की उस पुस्तक को ही आधार बना कर उस समय से ले कर 1947 तक प्रत्येक दस साल की तालिकाएं तैयार की थीं और उनका पूरे भारत के प्रत्येक प्रान्त में हिन्दू और मुस्लिम आबादी और इनको उपलब्ध पदों का लेखा दिया था। उसका निष्कर्ष यह था कि आबादी को देखते हुए मुसलमानों और हिन्दुओं को जितने पद तब मिले थे वे गलत न थे, कि ये सभी छोटे और मझोले पद थे, उच्च पदों पर अंग्रेज ही पदासीन थे। मुझे इस लेख की इसलिए याद है कि 1968-70 तक जब मैं नेषनल लाइब्रेरी का सदस्य था और मेरी सीट भी रिजर्व थी मेरे सामने की सीट पर जया मुखर्जी जो मध्यकालीन इतिहास पर शोध कर रही थी, बैठा करती थी। मैं तो प्राचीन इतिहास और वेदादि का अध्येता, पर एक बार जब चर्चा में मैंने इस लेख का हवाला दे कर उसके निष्कर्ष बताया तो उस पर मेरा बड़ा रोब पड़ा था, उसे लगा पुरानी पोथियों का यह पाठक सड़ा हुआ नहीं, पढ़ा लिखा है और इसके बाद बताने को कुछ रह ही नहीं जाता।

इस बात को समझने में आपको दिक्कत होगी कि सर सैयद अपनी सेवा के बदले शब्दातीत संवाद में निवेदन करते हमारी कौम को कुछ दो, कुछ दो, और उन्हें यह भ्रम भी होता कि उन्हें कुछ मिल रहा है, जैसे सर सैयद को ही इतना महत्व जो किसी भारतीय के लिए कल्पनातीत था, परन्तु उस समुदाय के लिए केवल drug, जिसके अर्थ तो दवा और नषा दोनों होते है, पर असर से पता चलता है कि वह पदार्थ था क्या।

इसका मर्म यदि समझ में न आ रहा हो तो इस रूप में समझें कि 1871 से 1947 तक के छिहत्तर सालों में ब्रिटेन ने मुसलमानों को केवल एक वहम दिया कि हम न रहे तो तुम मिट जाओगे क्योंकि तुम संख्या में कम हो और लोकतांत्रिक व्यवस्था में शासन तुम्हारे हाथ में न रहेगा, तुम्हारे मध्यकाल के कारनामें ये हैं, वे तुमसे इसका बदला लेंगे इसलिए उनसे बचो। हम और केवल हम तुम्हें सुरक्षा दे सकते हैं, इसलिए तुम तभी तक सुरक्षित हो जब तक हम हैं। इसे सर सैयद अहमद से ले कर बाद तक के मुस्लिम लीगी नेताओं ने मार्फिया के इंजेक्षन की तरह निर्विरोध ग्रहण किया!

यह बात यदि समझ में न आ रही हो कि कुछ दिए बिना, देने का इतना बड़ा नाटक खेलते हुए, अंग्रेज उनके मन में कैसे इस विष्वास को कायम रख सके कि वे मुसलमानों के हितैषी और हिन्दू उनके दुष्मन, कि कांग्रेस जो सबको साथ रखना चाहती है, हिन्दुओं की पार्टी है और उससे तुमको खतरा है इसलिए तुम उससे न जुड़ कर मेरे आश्रय में सुरक्षित रहो तो आपको इस बात पर ध्यान देना चाहिए किं कांग्रेस उसी नीति पर चलते हुए, वही बानी बोलते हुए, उसी तरह की दहशत पैदा करते हुए, वैसे ही आश्वासन देते हुए, उनके जनमत का अपने लिए उपयोग करती रही जिनमें ऐसे वादे भी थे जिनसे हिन्दू समाज से उनकी दूरियां बढ़ें! अब समाजवाद दलितवाद ने वही फिकरे अपना लिए हैं और आज तक मुसलमानों को सब्ज बाग दिखा रहे हैं। परन्तु यदि 1947 से 2016 की वैसी ही दससाला तालिकाएं बनाई जाएं तो क्या कोई यह कह सकता है कि मुसलमानों को कांग्रेस के कारण कुछ अतिरिक्त मिला। मिला तो, इस नारे का उपयोग करने वाले कुछ मुस्लिम नेताओं को, जो ही वाचाल होते हैं और जनमत को अपने लिए इस्तेमाल कर लेते हैं, पर साधारण मुसलमानों को नहीं। उपलब्धि के नाम पर यह दावा कि दलित तो मुसलमानों और ईसाइयों में भी हैं और आरक्षण का लाभ उन्हें भी मिलना चाहिए। हिन्दू इसे जानते थे यह झांसा है, इसलिए वे कांग्रेस से विमुख नहीं हुए, परन्तु पहली बार जब मनमोहन सिंह की जबान का इस्तेमाल करते हुए, ईसाइयत को आगे बढ़ाने के मुहिम में, सोनिया चालित कांग्रेस ने यह सोच कर कि उसकी सत्ता अचल अटल है जब तक मुस्लिम जनमत को चुंबकीय नारों से अपनी ओर खींचने की उसमें शक्ति है, और इसलिए अल्पमत के भीतर एक नये अल्पमत को उभरने की भूमिका तैयार करते हुए यह दावा किया कि इस देश पर पहला अधिकार अल्पसंख्यकों का है तो संतुलन बिगड़ गया। इसका सन्देश कितनी दूर तक पहुंचा यह कहना कठिन है परन्तु इतना तो पहुंचा ही पहली बार भोर भयो भ्रम निसा सिरानी जागे फिर न नसैहों की सुगबुगाहट आरंभ हो गई।

याददाश्‍त का हाल तो यह है कि अपना नाम भी भूल जाता है और याद करके बताना पड़ता है कि शायद मेरा नाम भगवान है, इसलिए महाभारत का वह श्लोक भला कैसे याद रह सकता है जिसे समझा तो पर रटने का प्रयत्न नहीं किया। उसका सार यह है कि यदि तुम्हारा कोई सात दुश्‍मन भी हो और उससे तुम्हारा कोई काम सधता हो तो उसे सिर पर बैठा लो और जब काम सध जाय तो उसे कच्चे घड़े की तरह पटक कर फोड़ दो।

हो सकता है कुछ विचारणीय पक्ष मुझसे छूट गए हों। परन्तु क्या यह सच नहीं है कि मुसलमानों की भावुकता का उनके ही दूरगामी हितों के विरुद्ध अलग अलग कालों और परिस्थितियों में उनका उपयोग करने वालो ने उपयोग किया है और उनको उनके अनिष्ट के गर्त में छोड़ दिया । इसका निर्णय मेरे वश में नहीं, परन्तु जब तक इसका खंडन नहीं हो जाता तब तक हम यह मानने को स्वतन्त्र हैं कि संरक्षकों ने मुसलमानों के साथ जितना अत्याचार किया है उतना उनका दुश्‍मन भी नहीं करेगा. उनको औजार बना कर अपना भी नुकसान किया है। यह एक खतरनाक निष्कर्ष है जिससे मुझे भी डर लगता है, इसलिए इसका खंडन हो तो मुझे भी राहत मिले ।

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