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हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास - 29

मनुष्‍य हो या जाति, उसका सबसे बड़ा शत्रु या मित्र उसका अपना अतीत होता है - वे कारनामे जो उसने किए हैं। जहां कोई दूसरा नहीं होता वहां भी ये भय या आश्‍वस्ति बन कर उसके साथ रहते हैं! दुर्दान्त समझे जाने वाले व्यक्ति, जिनका नाम सुन कर लोग थर्राते हैं, अकेले चलने में घबरातेे हैंं और अपने रक्षकों के बीच भी आशंकित रहतेे हैंं। जिसने किसी का अपकार नहीं किया उसके साथ कोई अशोभन व्यवहार हो जाय तब भी उसे यह मानने में समय लगता है कि किसी ने उसे क्षति पहुंचाने के लिए ऐसा किया है। उसकी पहली प्रतिक्रिया यह होती है कि शायद किसी से कोई चूक हुई है। यदि पता चले चूक नहीं हुई, उसे ही निशाना बनाया गया था, तो भी कुछ समय तक वह विस्मय में रहता है कि उसने कभी किसी का बुरा नहीं चेता, फिर उससे किसी की दुश्‍मनी कैसे हो सकती है।

अपराधी रात के सन्नाटे में चल रहा हो, तो भी उसके ही पांवों की आवाज तक उसके मन में भय जगा देती है कि कोई उसका पीछा कर रहा है और वह मुड़ मुड़ कर देखता है फिर भी आश्‍वस्‍त नहीं हो पाता ।

भारतीय मुसलमानों का सबसे बड़ा शत्रु उनका अपना ही इतिहास रहा है जो उनका पीछा करता हुआ उन्हें लगातार आश्‍ांका और दहशत में रखता रहा है और वे अपने कार्य, व्यवहार, और वचन से उस अतीत को नकारने की जगह उसे छिपाने का प्रयत्न करते रहे हैं। हिन्दुओं का इतिहास अपने रंग में रंग कर यह दिखाने का प्रयत्न करते रहे हैं कि ऐसा तो उन्होंने भी किया है, ऐसे तो वे भी हैं, जिसकी जरूरत नहीं होनी चाहिए !

परन्तु हम इस पर बाद में आएंगे। अभी तो इतना ही कि सर सैयद का पीछा, जितना उनका इतिहास करता रहा, उतना उतना कोई दूसरा कर नहीं सकता था। इस पीछा करने वाले वाले को हिन्दुओं पर आरोपित करके वह आरंभ से ही, हिन्दुओं से आशंकित रहे। उनके द्वारा अपने प्रति किए गए किसी अपकार के बिना भी हिन्दुओं से गहरी आश्‍ांंका थी। इसे वह असावधानी के क्षणों में खुल कर कह जाते थे; सावधानी के क्षणों में इस पर परदा डालने के लिए ऐसी मनोज्ञ बातें करते थे जिससे हिन्दुओं को विश्‍वास हो जाय कि मुसलमान भी इस देश को अपना देश मानते हैं। वे भी मानते हैं कि वे इसी की औलाद हैं। बाहर से आने वाले मुसलमान तो मुट्ठी भर थे और शेेष तो इस देश केे ही थे, जो मुसलमान बने। जो बाहर से आए मुसलमान थे, कई पीढ़ियों के दौरान शादी ब्याह के चलते उनके रक्त में भी हिन्दुस्तानी खून बहता है! हिन्‍दू मुसलमान दोनों इसी जमीन का अन्न खाते हैं, यहांंकी नदियाेें का पानी पीते हैं। हिन्‍दू और मुसलमान एक दूल्‍हन की दो आंखें हैं। अंंग्रेजी में अनूदित उनके शब्‍दों में कहें तो :
We both breathe the air of India and take the water of the holy Ganges and the Jamuna. We both consume the products of the Indian soil. We are living and dying together. By living so long in India, the blood of both have changed.The colour of both have become similar. The faces of both, having changed,have become similar. The Muslims have acquired hundreds of customs from
the Hindus and the Hindus have also learned hundreds of things from the Mussulmans. We mixed with each other so much that we produced a new language-Urdu, which was neither our language nor theirs .... My friends, I have repeatedly said and say it again that India is like a bride which has got two beautiful and lustrous eyes-Hindus and Mussulmans.

इनके आधार पर न उनके इरादों को आंका जा सकता है, न उनको श्‍ाब्‍दश: मान कर उनका मूल्यांकन किया जा सकता है। उनकी नजर में उर्दू हिन्‍दुओं और मुसलमानों की साझी भाषा थी, और इसलिए हिन्‍दी और नागरी लिपि की मांग सांप्रदायिक मांग थी।

अपने तई वह बहुत बड़े इन्सान थे, अपने समुदाय के नेता के रूप में बहुत समर्पित नेता थे, वह रईसों को ही सम्मान का पात्र मानते थे जो उन्नीसवीं क्या बीसवीं शताब्दी तक का ऐसा मान्य सिद्धान्त था कि इस पर सन्देह करने वाले को सिरफिरा माना जा सकता था, इसलिए वह हिन्दू रईसों के साथ जिस तरह का अपनापन दिखा सकते थे, वह मुस्लिम अवाम के लिए अकल्पनीय था। कई बार लगता है कि उनका हिन्दू मुस्लिम एकता का राग भी रईसों के स्तर की एकता का ही राग था। हिन्दू रईसों में सभी उर्दू और फारसी से परिचित थे, क्योंकि वही राजकाज की भाषा थी, अतः उनका नागरी लिपि और हिन्दी को भी मान्यता दिये जाने का प्रस्ताव भी उन्हें विश्‍वासघात जैसा लगा होगा।

यह न भूलना चाहिए कि जिस भारतेन्दु ने उनसे भाषा के प्रश्‍न पर टकराव मोल लिया था उनका भी एक मुकदमे के दौरान सर सैयद ने अपनी मुंसफी के दौरान पक्ष लिया था! मामला एक रईस के सम्मान का था! और भारतेन्दु उस रियासत को नफरत करते हुए, उसकी होली जलाते हुए हिन्दी भाषी समाज के उत्थान के लिए विह्वल रहे।

शहादत के असंख्य रूप होते हैं जिसे वे, जिनको खून के रंग से अधिक प्यार है देख नहीं पाते। सर सैयद को उठा कर अपनी रोजी कमाने वालों ने भारतेन्दु का अपमान न करते हुए, सर सैयद का महत्व आंका होता तो अच्‍छी बात होती, क्योंकि चोटियों के ऊपर सिर्फ आसमान होता है, उनसे ऊपर कुछ नहीं होता!

इस विशेष मामले में मैं दोनो व्यक्तियों की तुलना कर ही नहीं सकता, क्योंकि व्यक्तित्व की ऊंचाइयों को मापने का कोई पैमाना मेरे पास नहीं है। अच्छा हो हम उनकी तुलना करने से बचें। अपना सर्वस्व उत्सर्ग करने वाले जीवित रहते हुए भी शहीद ही होते हैं।

ब्रितानी कूटविदों को बता तो मैकाले ने ही दिया था कि इतनी लंबी दूरी से, इतने कम लोगों के बल पर, इतने विशाल क्षेत्र और और इतनी बड़ी और विविधतापूर्ण जनसंख्या पर सफलतापूर्वक शासन करना आश्‍चर्यजनक है अत: शासन को लंबे समय तक जारी रखने के लिए भारतीयों की भागीदारी जरूरी है, परन्तु सर सैयद अहमद के साथ यहीं से समस्या पैदा हो जाती थी।

मुसलमानों ने अंग्रेजी सीखी नहीं थी। हिन्दुओं ने किसी तरह का प्रतिरोध दिखाया नहीं, इसलिए अंग्रेजों के लिए स्थानीय उपयोग के लिए हिन्दू सुलभ थे, जब कि मुसलमानों के सामने समस्या यह थी कि राज्य गया, पुरानी शान गई, अब क्या हराने वालों की जबान सीख कर उनके हुक्म का गुलाम बनना होगा !

यह शर्त उन्हें कबूल नहीं थी। हिन्दुओं के लिए फारसी और अंग्रेजी दोनो पराई भाषाएं थीं जिनमें से एक को छोड़ कर दूसरे को अपनाने में उनके सामने कोई मनोबाधा न थी, इसका उन्हें लाभ मिला। मनोबाधा मुसलमानों या कहें अभिजात या रईस मुसलमानों के मन में थी। उनको न भारतीय मूल के धमान्तरित मुसलमानों पर विश्‍वास था न हिन्दुओं पर। जब वे पूरे हिन्दुस्तान को अपनाने की बात करते थे तो अपना दायरा बढ़ाने के लिए धर्मान्तरित मुसलमानों के साथ एकता कायम करने की व्यग्रता प्रकट करते थे। जब अरबी लिपि और अरबी बोझिल उर्दू और नागरी में लिखी हिन्दी का प्रश्‍न आता था तो उनको यह डर रहता था कि धर्मान्तरित मुसलमान भी नागरी लिपि और हिन्दी भाषा को सुगम पा कर उसके पक्ष में चले जाएंगे। उनको अपने से जोड़ने का एक ही रास्ता धार्मिक कट्टरता को उभार कर अपनी कार्यसाधक जमात में शरीक करने का था।

हम उदाहरणों के साथ बात करने को कल तक के लिए स्थगित कर सकते हैं।

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