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हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास -१८

‘‘तुम्हारी बात कभी पूरी होने पर आती ही नहीं। इतने दिनों से तुलसी चरित बखान रहे हो! कल सोचा आज मुक्ति मिलेगी पर चलते चलते कह गए, ‘‘बाकी कल! अरे भई, जब सांस्कृतिक मोर्चे का अ‍‍द्वि‍तीय योद्धा कह दिया तो कहने को कुछ बाकी रह गया। आरती उतारने के बाद भी भजन बाकी रह गया!’’

‘‘बाकी इस बात से सावधान करना रह गया था कि आकाश को तुम फीते से नहीं नाप सकते, उसके लिए प्रकाषवर्षों की ही जरूरत नहीं होती, तुमने अब तक जितने संख्या मान कल्पित कर रखे है, कल्पित इस लिए कह रहा हूं कि हमारे अरब, खरब, पद्म, महापद्म, शंख, महाषंख, समुद्र आदि की कल्पनाओं का भौतिक जीवन में उपयोग तो था नहीं, इनकी कल्पना संभवतः खगोलीय गणना के लिए भारतीय ज्योविर्वैज्ञानिकों ने की थी। इन्हें आज के वैज्ञानिक मानों ने अपर्याप्त मान कर बौना कर दिया है, तो प्रकाश वर्ष की बात तो हम सोच ही नहीं सकते थे, हमने तो देववर्ष और अधिक से अधिक ब्रह्मा के दिवस की कल्पना की थी - देखो तो माप के लिए हमने कैसे कैसे प्रतीक बना रखे थे-

‘‘तुम साफ बताओ तुम पागलखाने में कब भर्ती होने जा रहेे हाेे ? उसके बाद तुम्‍हारा पता नहीं क्या हो, इसलिए अपने बैंक से लेकर घर के सारे राज बता जाना, बाद में काम आएंगे।’’

मैं हैरानी में उसे देखने लगा तो बोला, ‘‘तुम्हारी एक बात से दूसरी, दूसरी में से तीसरी जो निकलती जाती है, वह मुझे अपने पार्क में दंड पेलते सिरफिरे में भी केवल उन मौकों पर देखने में आती थीं जब वह अपनी रौ में बोलता और बहकता था। किसी वस्तु को सटीक पहचाना जा सके इसके लिए शब्द बने हैं, किसी विचार को सही बताया जा सके उसके लिए वाक्य बने हैं जिनके आगे विराम चिन्ह होता है, जो पहला वाक्य पूरा करने से पहले एक नया वाक्य आरंभ करते चले जाते हैं, या पहले विचार के संप्रेषित होने से पहले ही एक नए विचार और नई अवधारणा की ओर बढ़ जाते हैं उनके लिए पागलखाना बना है!

''मुसीबत यह कि वहां जाने वाले लौटते नहीं हैं, बेमियाद पड़े रहते हैं! इसलिए कह रहा था कि जो अपने बच्चों से भी छिपा रखा हो उसे मुझे बता रखाेे, जरूरत पर काम आएगा।’’

बात उसकी अधिक गलत नहीं थी, इसलिए मैं उसका मजाक उड़ाता हुआ हंस भी न सका, ‘‘यार बात तो तुम्हारी ठीक है। कुछ गड़बड़ी तो मेरे साथ है ही! जिस बात को दूसरे बहुत सलीके से कल लेते हैं, मैं चक्कर काटता हुआ लंबे समय बाद उस बिन्दु पर पहुंचता हूं जिस पर सीधी रेखा में अगला कदम कहा जा सकता है। खैर, मैं फिर भी कहूंगा कि अन्तर्विरोध तो हम सभी में होते हैं, ऋजुता वक्रता से अधिक असाध्य है, परन्तु विराटता के अन्तर्विरोध भी उतने ही विराट होते हैं।

''गहरी खाइयां हिमालय में ही हो सकती हैं, किसी टीले या बांबी में नहीं। इसलिए हमें उन्हें अपने पैमाने से नहीं मापना चाहिए न निर्णय करने में जल्दबाजी करनी चाहिए। विराटता के साथ ही उनके असंख्य पक्ष हो जाते हैं, असंख्य आवर्त, जिनमें से किसी को कसौटी मान लिया तो उन्हें अपने से भी तुच्छ सिद्ध कर सकते हैं! इससे न हम अपने को समझ सकते हैं न उनको! उनको समझने के लिए धैर्य की, आस्था की जरूरत होती है और इसके साथ ही अमंद स्मृति की जरूरत होती है जो आस्था के क्षणों की भी विसंगतियों को कहीं दर्ज करती रहे जिसे आस्था के कारण हम दबा देते या उपेक्षणीय मान लेते है। यह स्मृति ही संचित हो कर इतना प्रबल दबाव डालती है कि श्रद्धा या आस्था वश जिस पर हम मंत्रमुग्ध थे उससे मोहभंग होता है और हम उसका स्वतन्त्र और वस्तुपरक मूल्यांकन कर पाते हैं। याददाश्‍त से कुछ अलग हो सकती है यह, कारण अच्छी याददाश्‍त वाले भी मुग्ध होने पर उन खटकने वाली बातों को बिसारते चले जाते हैं, इसलिए तार्किक प्रकृति के लोगों में ही आस्था और श्रद्धा के क्षणों में स्‍म़ति भी सतर्क रहती है।''

‘‘जानते हो तुम क्या कर रहे हो? तुम उसी अभियोग का प्रमाण दे रहे हो और मुझ पर यह दबाव डाल रहे हो कि मैं पहले से ही किसी पागलखाने में तुम्हारे लिए एक खाट बुक कर लूं!’’

मैं अपनी हंसी को रोक नहीं पाया ! बात वह ठीक ही कह रहा था पर ठीक इसलिए नहीं था कि जटिलता को सरलोक्तियों में नहीं बांधा जा सकता। मेरी नजर में वह मूर्ख था और उसकी नजर में मैं पागल।

मूल्यांकन का अन्तर इस मसले पर हमारे दृष्टिभेद के कारण था। कहा, ‘‘देखो, तुम गलत नहीं हो। केवल मेरी नजर में सही नहीं हो। आज ही एक मित्र ने कल की पोट पर कहा, 'क्रान्तिकारी तुलसी के असली नारी विषयक रूप को देखना है तो वन काण्ड में सीता को अनुसूया से दिलाया उपदेश जरूर देखें ! उत्तर में मैंने कहा, 'आप ने ध्यान नहीं दिया नाटकीयता, रणनीतिक उपयोग और निजी संवेदना के पहलुओं पर और तत्कालीन दबावों में, जिसमें सबसे अधिक शिकार महिलाएं बनती थी। इसे एक दो वाक्यों में नहीं समझा सकता। तुलसी का लेखन एक सामरिक लेखन है।

एक दूसरे मित्र ने कहा मध्यकाल के वह अकेले कवि हैं जिसमें यह साहस था कि सत्ता के आतंक के बीच अपना विरोध प्रकट कर सकें is a complete wrong statement sir.

सच कहो तो मुझे ऐसी ही आपत्तियों से रास्ता मिलता है। पहले मित्र को जो उत्तर दिया उससे मैं स्वयं संतुष्ट नहीं हूं! दूसरे ने अपनी असहमति का या मेरे कथन के गलत होने का कोई कारण बताया होता तो उससे अधिक लाभान्वित होता और सोचने समझने की दिशा बदलती। परन्तु ये दोनों प्रतिक्रियाएं मेरी उस मुहिम की सफलता को प्रकट करती हैं कि आपको किसी के प्रभाव में आकर उसकी बात या उसके निष्कर्ष मान नहीं लेने चाहिए। दुनिया का कोई प्रचंड मेधावी भी किसी विषय पर अन्तिम सत्य पर नहीं पहुंचा है और यदि ऐसा कोई आतंकवादी चिंतक दिखे तो सबसे पहले उससे मुक्ति पानी चाहिए। हमें अन्तिम भरोसा सब कुछ जानने और अपने ढंग से समझने के बाद अ पनी ही बुद्धि पर करनी है। परन्तु हम जिनसे अअसहमत होते हैं उन्हें अपनी असहमति का कारण या प्रमाण बता सकें तो दोनों का भला हो। हमारा लक्ष्य अपने विचारों की धाक जमाना नहीं, सोचने समझने की प्रक्रिया को जाग्रत करना है जिसकी ही एक कड़ी है कि जो एक सन्दर्भ में सही लगता है वह दूसरे सन्दर्भ में गलत सिद्ध हो जाय!’’

वह हंसने लगा, ‘‘जीत हर हालत में तुम्हारी ही होगी! हार गए तो भी।’’

‘‘मैं जीतने के लिए बात करता ही नहीं हूं, समझने के लिए अपना पक्ष रखता और दूसरे के पक्ष पर विचार करता हूं और दोनों स्थितियों में मुझे लाभ होता है। जो जीतना चाहे ही नहीं वह हार कैसे सकता है? पर यह अपेक्षा अवश्‍य करता हूं कि तुम अपनी बात पूरी तैयारी और समझदारी से करो! उन बातों को दुहराओ नहीं जिनको मैं प्रतीकात्मक रूप में स्वयं कह आया हूं। महिमा की अपनी शर्ते रखते हुए, उनमें निहित अन्तर्विरोधों को ह्विटमैन की पंक्तियों से उदाहृत भी कर आया, फिर भी यदि आप अपने छोटे फीते से महिमा या विराटता को नापने के बाद उसे सीमोल्लंघन का दोषी करार दे तो वह क्या कर सकता है! वह तो है, एक सत्य और सत्ता की तरह ! तुम तभी तक हो जब तक उसकी स्वायत्तता से छेड़छाड़ न करो अन्यथा तुम फलक से बाहर चले जाते हो।

‘‘मैं यह निवेदन कर चुका था कि तुलसी रामायण को कबीरपन्थ, नाथपंथ, इस्लामी अग्रधर्षिता के विरुद्ध एक हथियार के रूप में तैयार करते हैं, इसमें कथन उपकथन पात्रों और परिस्थितियों के अनुरूप हैं और तर्कयोजना के व्यापक आयाम हैं जिनकी दूरंदेशी चकित करती है! मित्र आहत स्त्रियों की पीड़ा को व्यक्त करने वाले वाक्य से थे और उन्हें अनसूया प्रकरण याद आ रहा था, यह समझ में नहीं आया कि मध्यकाल के जंगल में अपने पति के साथ राक्षसों के बीच स्त्री को अपने सम्मान की रक्षा का एक आसंग भी इससे जुड़ा है, मध्‍यकाल हिन्‍दू महिलाओं के लिए राक्षसों के बीच अपने कौल पर टिके रहने की चुनौती जैसा था अत: तत्कालीन मर्यादाओं में सहज प्रतिक्रिया का भी एक आसंग है, और कथा की अपनी नाटकीयता का भी ध्यान रखते हुए एक मूल्यदृष्टि वहां प्रतिपादित करनी है और हिन्दू समाज को आज की परिस्थितियों में सन्देश भी देना है! इनके बीच ही, और यह सोचते हुए कि इनके सफल निर्वाह में बड़े बड़ों से चूक हो सकती है कोई मूल्यांकन होना चाहिए! किताब में पढ़े सूत्रों को तेा वर्तमान पर भी घटित नहीं किया जा सकता, आज के सूत्रों को उस अतीत में ले जा कर घटित करना अपने दिमाग की परीक्षा करने की मांग करता है!

‘‘तुलसी किसी विराट की तरह विचित्र हैं ! एक जगह वह वर्णमर्यादा पर ऐसा जोर देते हैं कि ब्राह्मणवादी लगते हैं, दूसरी जगह जहां वह अपने को व्यक्त करते हैं कहते हैं अधम ते अधम पुरोहित करमा! सोचो तो इसी पौरोहित्य के बल पर वसिष्ठ की अपनी महिमा टिकी है और उसी को तुलसी अधमतम कर्म बता रहे हैं ! दूसरे मित्र ने तो असहमति का कारण भी नहीं बताया।

पर देखो, इन दोनों की असाधारण समझदारी और अधीरता के कारण आज का भी दिन व्यर्थ गया! जो कहना था, वह तो रह ही गया!’’

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