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हिन्दुत्व से घृणा का इतिहास - 15

‘‘वह कौन सी बात थी जिसे आधे घंटे तक मेरा सिर खाने के बाद भी तुम शुरू नहीं कर सके ? बता सकते हो ?’’

‘‘तुम्हारा सिर फट न जाये, इसका खयाल करके चुप कर गया, नहीं तो कल ही बता दिया होता! एक तरह से कहो तो बता भी दिया था। महावट जिनता अपनी जड़ों पर टिका होता है उतना ही अपनी डालियों से भी जड़ें पैदा करता और उन जड़ों को ही तने में बदलता कल्पनातीत विस्तार पा लेता है। अपनी महिमा से प्रकृति के क्षुद्र नियम को उलटता हुआ, या वेतलता और महावट के भेद को मिटाता हुआ और प्रकृति के ही एक अधिक जटिल नियम को प्रतिपादित करता हुआ! गिरे हुए और तने हुए के भेद को मिटाता हुआ और यह दिखाता हुआ कि महिमा के अनेक रूप हैं जिस पर एक ही नियम लागू होता है, वह है जमीन से जुड़ते जाने की योग्यता।

''वह व्यक्ति हो या पादप या पर्वत महिमा वह अपनी जमीन से जुड़े रहने के दम पर ही उस महिमा को प्राप्त कर पाता है। तुलसी को समझने के लिए या किसी अन्य व्यक्ति को समझने के लिए इस नियम को मत भूलो, अन्यथा तुम उन्हें समझ नहीं सकते।’’

‘वह क्या लाइन है गालिब की, जिसके आगे आता है, ‘हम भी इक अपनी हवा बांधते हैं!’ हम की जगह तुम कर दूं तो मेरी बात समझ पाओगे! समझ पाओगे कि तुम जमीनी सवालों को हवा में उछाल कर महिमा को परिभाषित करते हों जो मुझ जैसे गंवार की समझ में नहीं आता। पहले स्वयं तो जमीन पर आओ।’

‘‘मैं जमीन पर ही लाने की बात कर रहा हूं। सोलहवीं सत्रहवीं शताब्दी के सामाजिक और शैक्षिक पर्यावरण को देखो। आस्थामूलक साहित्य की भाषा को देखो, तत्कालीन सांस्कृतिक चुनौतियों को देखो तो तुलसी का महत्व समझ में आ जाएगा। उससे पहले के ब्राह्मणों की सारी चिन्ता अपनी प्रतिष्ठा, अपने लाभ, और ज्ञान को अपनी निजी संपदा बना कर रखने की थी। वे जन भाषाओं को उसी तरह अपवित्र मानते थे जैसे सामाजिक स्तर भेद में शूद्रों को। तुलसी से पहले का कोई संस्कृतज्ञ मिलेगा नहीं जिसने जनभाषा में लिखने का प्रयत्न किया हो!

''इस शून्य का ही लाभ सिद्धों को, नाथपंथियों को, सूफियों और सन्तों को मिला और उन्होंने अपने विचारों को जो विचार नहीं थे, पर वैचारिक आतंक पैदा कर सकते थे, अपनी उलटबांसियों और गूढ़ोक्तियों के द्वारा अपने दैनन्दिन के ले-दे से ऊपर अपने असाधारण ज्ञान का या उसका भागी होने का आत्मगौरव दे सके!

बयल बिआइल गविया बांझ, बछा दूहिए तीनो सांझ! निसदिन सियाल सिंह सों झूझै कण्हपाद कोउ बिरला बूझे! इसे ही संस्कृतज्ञ सिद्धों ने भी अपनाया! गोमांसं भक्षयेन्नित्यं विबेत अमरवारुणीम। गो इन्द्रियां, उनका मांस या आहार कामना या लालसा, उसको ही खा जाओ, या उससे मुक्त हो जाओ और ध्यान की साधना से उत्पन्न और आह्लादित करने वाली या कभी निष्प्रभाव न होने वाली मादकता में डूबा रहे। इसमें चैकाने और असाधारण ज्ञान का आतंक जमाने के अतिरिक्त कुछ नहीं है! यह ध्यान दो तो कबीरपंथियों में कबीर के वे दोहे और कथन प्रचलित नहीं है जिनमें वह समाज व्यवस्था को, धार्मिक भेदभाव को चुनौती देते हैं, अपितु वे जिनकी गूढ़ोक्तियों का मर्म जानने के कारण अशिक्षित दलित भी अपने को एक ऐसे ज्ञान का अधिकारी होने का बोध बनाए रखते हैं जो पंडितों को भी समझ न आए।

‘‘सूफी पीरों ने पहली बार सीधे लोकभाषा, लोकभावना और लोकचेतना को सम्मान देते हुए अपना साहित्य रचा और इस्लामपरस्तों की तलवार और जोर जबरदस्ती से अलग प्रेम और सौहर्द से सीधे जन मन में उतर कर लोकप्रियता पाई !

''इन सबकी यह सीमा थी कि उनको संस्कृत का आधिकारिक ज्ञान न तो था, न ही हो सकता है। ऐसे पहले कवि तुलसीदास हैं जिन्होंने जनभाषा को ज्ञान की भाषा, पूरे समाज के लिए कल्याणकारी मानते हुए ज्ञान और आस्थामूलक साहित्य पर ब्राह्मणों के एकाधिकार को चुनौती देते हुए सर्वजन हिताय, सर्वजनग्राह्य साहित्य रचना का क्रान्तिकारी कदम उठाया । यह वैसा ही कदम था जैसा लातिन की दबोच से यूरोप की भाषाओं का बाहर निकलना जो तुलसी के समय तक भी पूरा नहीं हो सका था। न्‍यूटन ने अपना सिद्धान्‍त प्रतिपादन तुलसी से सौ सवा सौ साल बाद भी लातिन में ही किया था।

''यदि तुलसी की क्रान्तिदर्शिता को देखना हो तो उस विरोध को देखो जो उन्हें ब्राह्णों से सहना पड़ा। तब तुमको यह भी समझ आ जाएगा कि तुलसी वर्णवाद के पोषक थे या उससे क्षुब्ध। तुमने उनकी उस पीड़ा को समझने का प्रयत्न किया है जिसमें बाल्यावस्था में ही माता और पिता के द्वारा परित्यक्त बालक को क्षुधाकातर हो कर अपमानजनक अनुभवों से गुजरना पड़ा और बाद में भी जाति और वर्ण को लेकर कैसे व्यंग्य सहने पड़े। पढ़ा तो होगा, उसका महत्व रेखांकित करने में चूक हुई होगी इसलिए इस भूमिका के बाद उसे फिर पढ़ोः

सूत कहो, अवधूत कहो, रजपूत कहो, जुलहा कहो कोऊ।
काहू की बेटी सों बेटा न ब्याहबो काहू की जानि नसाय न सोऊ
तुलसी सरनाम गुलाम है राम को जाहि रुचै सो कहै किन कोऊ
मांगि के खैबो मसीत को साइबो, लैबे को एक न दैबे को दोऊ

‘‘किसी व्यक्ति को उसके वैभव से नहीं, उस पीड़ा से समझने का प्रयत्न करो जिसे वह आजीवन अनमोल धन की तरह संजो कर रखता है। तुलसी अपने उन दिनों को कभी नहीं भूलते और इन भौड़े दिनों के विपरीत कुछ समय की महन्‍थी को तिरस्‍कार पूर्वक याद करते हैं। इसका ध्‍यान रहे तभी तुम्हें वह तुलसी समझ में आएगा जिसका मर्यादापुरुषोत्तम वर्णमर्यादा को तुच्छ करता है। वह तुलसी जो एक विश्‍वास पर आधारित और इसलिए तर्क के लिए अभेद्य विश्‍वास के प्रहार को रोकने के लिए तर्क और प्रमाण काे नहीं, आस्था और विश्‍वास को हथियार के रूप में काम में लाता है। यह बात उसकी अपनी उस कृति में भी देखी जा सकती है जिसके सहारे वह इस महाज्वार को रोकने का प्रयत्न कर रहा था।’’

''अगर मैं कहूं कि अब भी तुम हवा में बात कर रहे हो तो बुरा तो लगेगा, पर तुमको उनसे भी कुछ समझने का प्रयत्न करना चाहिए जो सचमुच जमीन से जुड़े हैं और जमीनी सचाइयों का सामना कर रहे हैं! तुम अपनी चैदहवीं किश्‍त लिख तो गए पर लगता है तुमने अपनी तेरहवीं पोस्ट पर आई प्रतिक्रियाओं तक को नहीं पढ़ा। किसी का समाधान तो तुमसे हो नहीं पाया।’’

‘‘देखो, मैं अपनी किताब सबके सामने बैठ कर लिख रहा हूं और मेरी चिन्ता अपनी किताब पूरी करने की है, किताब अपने समय के सरोकारों से दो दो हाथ होने के इरादे से है, इसलिए मेरी चिन्ता केवल यह रहती है कि मैं जिस तरह, जिस भाषा या शैली में लिखता हूं वह कितने लोगों तक पहुंचने में सहायक है। कई बार कुछ विचारणीय प्रश्‍नों पर प्रतिक्रिया भी देता हूं पर उनसे इतने तरह के सवाल पैदा हो सकते हैं, होते भी हैं कि उनका उत्तर देने चलूं तो उसी कुचक्र में पड़ कर फिकरेबाजियों के स्तर पर उतर जाना होगा और मैं अपने समय के सरोकारों का सामना करने की जगह नई समस्याएं पैदा करने लगूंगा!’’

‘‘क्या उन प्रश्‍नों को देखा भी है । देखा है तो उनसे तुम भागने का सुरक्षित तरीका तो नहीं निकाल रहे हो ?’’

‘‘पहली बात यह कि सभी प्रश्‍नों का जवाब नहीं दिया जा सकता। यह प्रश्‍नकर्ता के ज्ञान, व्यथा, दृष्टि, पर तो निर्भर करता ही है, इस प्रश्‍न से भी संबंधित है कि तुम किसी परिदृष्य को कहां खड़े हो कर कब और क्यो देख रहे हो। कुछ लोगों को चन्द्रशेखर आजाद और भगत सिंह का रास्ता सही लग सकता है, परन्तु जैसा कि गांधी ने कभी कहा था, यह व्यावहारिक नहीं था, क्योंकि अंग्रेजों ने हमसे हथियार छीन कर हमें नामर्द बना दिया है। इसमें जोखिम उठाने और इक्के दुक्के रक्तपात करने की संभावना तो थी, इसके बल पर निर्णयकारी युद्ध नहीं लड़ा जा सकता था। गुप्त संगठनों की गतिविधियों से सामाजिक जागरूकता भी नहीं पैदा की जा सकती थी। आपने दो चार को गोली या बम से भून दिया, पर उसके बदले संभावित दमन की कार्रवाइयों में जितने निरीह लोगों को प्राणों से हाथ धोना पड़ता इसका न आपको अपने गुस्से में ध्यान था न अनुमान। यह ब्रितानी शासन को कोई क्षति पहुंचा सकता था या नहीं यह विवादास्पद हो सकता है, पर इस पर कोई विवाद नहीं हो सकता कि इसका समर्थन गाधी के असहयोग और अहिंसा के आन्दोलन को खत्म कर सकता था।

इस तरह की जुगत ब्रितानी ताकतें भिड़ातीं तो समझ में आता है, अपने देश के सबसे प्रभावशाली आन्दोलन पर कुठाराघात किया जाय यह गांधी के सारे किए कराए पर ही पानी फेरने जैसा नहीं है, जनजागृति का जो अभियान गांधी ने छेड़ा था वह भी कुंठित हो जाता। गाधी की अहिंसा को बच्चों का खेल न समझो, यह एक हथियार है जिसकी धार तभी तक पैनी रह सकती है जब तक वह प्रत्यक्षतः या परोक्षतः हिंसात्मक रास्ते के साथ खड़े दिखाई न दें। तुम गांधी के समय में, उनके आन्दोलन की त्वरा पर कुठाराघात करने वाले इन उपक्रमों को जिनमें पहले, चैाराचैारी कांड के बाद उन्हें अपना आन्दोलन वापस लना पड़ा था और दूसरी बार भगत सिंह के मामले में एक भिन्न तरीका अपनाना पड़ा था, रख कर समझने का प्रयत्न करो तो तुम्हें शिकायत नहीं रह जाएगी! इसे मैंने इसलिए उठा लिया कि किसी ने इस पर गांधी की भर्त्‍सना की थी ।

‘‘एक दूसरा सवाल समग्रता को देखने की अक्षमता से पैदा होता है! अग्रेजों के कारण ही सबको शिक्षा का अवसर मिला, उनको कोसना ठीक नहीं! यह अंग्रेज और ईसाइयत में फर्क ही नहीं कर पाते। यह फर्क भी नहीं कि शत्रु अपनने हित के लिए जो काम करता है वही जिनके विरुद्ध उनको तैयार करता है, उनके भी हथियार बन जाते हैं। हर त्रासदी का एक सुखान्‍त पक्ष होता है।

परम पुरुष के मुंह से ब्राह्मण पैदा हुआ जैसे विश्‍वास स कैसे पाले जा सकते हैं। ऐसा प्रश्‍न उस सीमा से पैदा होता है जिसमें अपनी अल्पज्ञता के बाद भी कुछ रटी रटाई बातों को सन्दर्भ निरपेक्ष हो कर लोग आग्रहपूर्वक दुहराते हैं! यह नहीं देखते कि उतने पुराने कालों में दूसरे समाजों में कितने जघन्य विश्‍वास और मानवद्रोही दर्शन पनपते रहे हैं, यहां तो मात्र सामाजिक प्रतिष्ठा का सवाल था।

परन्तु सबसे बड़ी बात यह कि वे यह भी नहीं समझ सकते कि वर्णवाद और पुरानी आस्था को इस्लाम से लड़ने के लिए औजार बनाते हुए भी ब्राह्मणवादी वर्चस्व पर सबसे प्रभावशाली प्रहार तुलसी करते हैं! भक्त के समक्ष जाति नहीं भक्ति भावना प्रधान होती है और वही सभी में वह साम्य देख सकता है जिसमे वह पूरे जगत को सियाराममय मान कर उसके समक्ष विनम्र हो सकता है।

'' कहा न तुलसी प्रतीयमान अन्तर्विरोधों और गहन तत्वदर्शिता से संपन्न कवि हैं। समर में उतरने के लिए उन्होंने रामकथा को चुना जिससे इससे पहले की वैचारिक लड़ाइयां लड़ी जाती रहीं, समस्त सुलभ ग्रन्थों का मर्म ग्रहण किया, वेद, पुराण ही नहीं दूसरी भाषाओं में सुलभ ज्ञानभंडार का अध्ययन करने के बाद अपनी सामरिक आवश्‍यकता के अनुसार वह कथानक, चरित्र और भाषा, विचार संपदा का चयन करते हैं। तुलसी विचलन के सभी रूपों का विरोध करते हैं, उस सधुक्कड़ी का भी जो आज की व्याधि है। गृहस्थ का जीवन उनके लिए आदर्श है। मुनिवृन्द की आन्तरिक भोगलिप्सा पर भी बड़े मीठे ढंग से प्रहार करते हैं दूसरे निग्रहवादी मतो पर भी !

‘‘प्रश्‍न यह है कि तुम कहां से अपने समय की समस्याओं को देखते हो और स्वयं क्या हो! वह कविता याद है कि मोची की नजर में हर आदमी एक जोड़ी जूता है। एक रोगी के लिए दुनिया के सारे काम रुक जाय पर उसकी पीड़ा से मुक्ति मिले इससे बड़ी कोई समस्या नहीं हो सकती। उसकी समस्या का उपहास नहीं किया जा सकता पर उसकी इच्छा के अनुसार दूसरे सभी कामों को स्थगित नहीं किया जा सकता। सामाजिक स्तर पर यह समस्या दूसरे रूप में प्रकट होती है। सामाजिक न्याय मांगने वालों के लिए समस्त गतिविधियां उनके दुखनिवारण पर केन्द्रित होनी चाहिए जिनमें उन्हें कुछ करना न हो, पाना ही पाना हो। यह उनके और देश के हित में नहीं है, न उनमें स्वयं अपनी चुनौतियों का सामना करने की क्षमता पैदा होगी न उन्हें जो मिलेगा उससे उनकी तृप्ति होगी, न वे सुविधाएं उनके ही समाज के अधिक उत्पीडित जनों तक पहुंचने पाएंगी।’’

‘‘आज तो सचमुच थका दिया तुमने ! पछता रहा हूं इस पहलू को छेंडा ही क्यो!’’

अब क्या कहता !

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