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हिन्दुत्व से घृणा का इतिहास – 16

‘’तुम बताओ, तुम तुलसी को कबीर से बड़ा कवि मानते हो ?’’

’’यह बताने से अच्छा है कि मैं तुमको यह बताऊं कि तुम्हें सवाल पूछना तक नहीं आता। पूछोगे, कमल गुलाब से बड़ा फूल होता है क्या? यदि कह दूं अपनी आंखों से देख कर समझ सकते हो तो उसके बाद कहोगे, ‘बड़ा तो कमल ही होता है, पर गोभी के फूल से दोनों छोटे होते हैं।‘

'' कोई भी तुलना उसी किस्म पर लागू हो सकती है। तुम कहो, गुलाब के इन फूलों में सबसे सुन्दर कौन सा है तो माथे पर थोड़ा जोर देने के बाद यह तय करना संभव हो सकता है। पूछो दोनों में तुम्हें कौन पसन्द है तो यह भी तय किया जा सकता है। पूछो हमारे गुलदस्ते के लिए कौन सबसे उपयुक्त है तो भी कोई बात हुई। पर यह बड़ा छोटा का पैमाना सही नहीं है ।

‘’ये दो दौरों के आन्दोलनकारी हैं। अपने समय की दो समस्याओं से टकराने वाले, अपनी क्षमता के अनुसार अडिग भाव से प्राणपण से जुटे रहने वाले क्रान्तदर्शी कवि है। परन्तु हमारे समय के लिए दोनों का प्रतीकात्मक मूल्य ही रह गया है क्यों कि हम उनके समय से आगे है।

‘’इनको लेकर अपनी दूकान चलाई जा सकती है, जैसे नानक देव के नाम पर सिखों को दूकान चलाते देखा होगा। इन दोनों का समय समय पर अपने औजार के रूप में वामपंथियों ने उपयोग किया। पहले उनको तुलसी में बहुत कुछ प्रगतिशील दिखाई देता था, परन्तु फिर उन्होंने पाया कि तोड़-फोड़ की गतिविधियों के लिए अपना घर फूंक कर लुकाठा ले कर चलने वाला कवि अधिक उपयोगी हथियार है तो कबीर की ओर मुड़े ।

कुछ समय तक उनके दोनों हाथों में दो तलवारें सधी रहीं। पर दोनों को एक साथ चलाने पर तलवारें आपस में ही टकराने लगीं। यह जपमालाछापातिलक का विरोधी और अपने अनजाने ही हिन्दुओं का ‘छाप तिलक सब छीनने वाले’ सूफियों की योजना के निकट पहुंचने वाला आन्दोलनकारी और दूसरा जपमालाछापातिलक की वापसी से अपने सुरक्षा प्राचीर खड़ा करने वाला।

यह समझ में आते देर नहीं लगी कि दोनों को साथ लेकर चला नहीं जा सकता। अब दोनों के विरोध दिखाई देने लगे। फिर तो तुलसी हिन्दुओं के कवि बन गए और कबीर प्रगतिशील मानवता के। एक छोटी सी बात बताऊं, किसी को बताओगे तो नहीं ?’’

वह हंसने लगा, ‘’यदि मैं कहूं मत बताओ, या कहूं बताया तो दुनिया भर में फैला दूंगा, तो भी बताए बिना तो रहेगा नहीं। इसलिए जल्दी बता, भूमिका में समय मत बर्वाद कर।‘’

’’तुलसी में लोकधर्मिता और उनके ऐसे तत्वों का प्रगतिशील आन्दोंलन को लोकप्रिय बनाने का उपक्रम जिसका भी रहा हो इसमें प्रधान भूमिका रामविलास शर्मा की थी। परन्तु मोटी समझ सभी हिन्दू प्रगतिशीलों की यह थी कि अपने युग की सीमाओं के भीतर तुलसी की एक असाधारण प्रगतिशील भूमिका थी। तुलसी यदि लोकमंगल के साधक है और साम्यवाद का लक्ष्य लोकमंगल ही है तो उनसे अधिक उपयुक्त कोई कवि हो नहीं सकता था। परन्तु उनका लोकमंगल हिंदू समाज तक सिमटा प्रतीत होता था, अत: यह मान्यता संगठन के मुस्लिम सदस्यों को स्वीकार्य नहीं हो सकती थी। मुस्लिम सदस्यों और उनको मिलाकर रखने की चिन्ता से कातर दूसरे प्रगतिशीलों को हिन्दी भी स्वीकार्य नहीं थी, हिन्दुस्ता न भी नहीं, और कुछ कम्युनिस्ट आज भी ऐसे है जो हिन्दी का नाम आते ही हिन्दू हिन्दुस्तान की शृंखला का स्थायी धुन बनाने लगते है। हिन्दुत्व से बचने के लिए हिन्दी और हिन्दुस्तांन को भी स्वीकार नहीं कर पाते ।

रामविलास शर्मा को इनसे ही पंगा लेना पड़ा। कारण जो भी बताए गए हो, रणदिवे को भी हाशिये पर डालने का यही प्रमुख कारण रहा हो सकता ह, और रामविलास जी के विरोध में तो अभियान ही चला दिया गया जो उनके अन्त काल तक जारी रहा। सबको मिलाकर रखने की चिन्ता जरूरी भी थी, पर इस चिन्ता, में लगातार समझौते करते हुए मुस्लिम परितोष की नीति के कारण कोई मध्यमार्ग तैयार न हुआ जिसके लिए दोनों पक्षों को कुछ दुराग्रह छोड़ने पड़ते हैं, इसलिए कम्युनिस्ट पार्टी और उससे जुड़े आन्दोलन, उससे अलग हुए धड़े और इस परितोषवादी नीति के कायल दूसरे दल, मुस्लिम लीगी अपेक्षाओं की पूर्ति करने को बाध्य रहे हैं जो देश और समाज के लिए दुर्भाग्यपूर्ण सिद्ध हुआ है।‘’

’’यह बात मेरी समझ में नहीं आई । यदि सब कुछ हिन्दुओं की रुचि के अनुसार चलता रहता तो वह सौभाग्य पूर्ण होता, और यदि उसमें मुस्लिम संवेदनाओं का भी ध्यान रखा गया तो दुर्भाग्यपूर्ण हो गया?’’

‘’यहीं मुझे लगता है कि वामपन्थ अपना कफन बांध कर निकलता है और वामपन्थी अपनी आंख मूद कर दुनिया को रास्ता दिखाने का एकाधिकार ले लेता है । वामपंथ कफन की कीमत वसूल करने में लगा रहता है और वामपंथी कम्युनल गेम खेलने वालों के इशारे पर दौड़ लगाने को मजबूर हो जाता है।‘’

’’तुम्हा‍रा दिमाग खराब है। तुम कम्युानिस्ट आन्दोलन और प्रगतिशील अभियान के बारे में धेले की जानकारी नहीं रखते, और बात इतने धड़ल्ले से करते हो जैसे सारी जानकारी लेकर बैठा जज फैसला सुना रहा हो। तुम तुलसी और कबीर तक ही रहो तो तुम्हारी बेवकूफी छिपी रहेगी।‘’

’’अपने ढंग से तुम भी ठीक ही हो। जानकारी मेरी थोड़ी है इसलिए व्यवहार को ही देख पाता हूं। जहां तक कबीर का प्रश्न है वह आर्थिक स्तसर पर यथास्थितिवादी हैं, रूखा सूखा खाइके ठंडा पानी पीउ। देखि पराई चूपड़ी मत ललचावे जीउ । उनकी ब्रह्म और माया की परिभाषा में स्त्री माया है। एक बात बताऊं तुम्हें।‘’

’’बता यार, पर भूमिका से तो बचा।‘’

’’अभी अभी मुझे खयाल आया कि ब्रह्म और माया, दोनों एक से अभिन्न होते हुए भी अभिन्न नहीं, ब्रह्म की कामना ही माया बन जाती है या वह अव्‍यक्‍त रूप में उसी में रहती है और व्यक्त होती है, और पुरुष की पसली से स्त्री रची जाती है उसकी आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए। वह स्वतंत्र नहीं है, पुरुष की तुष्टि ही उसका लक्ष्य है, इन दोनों में तुम्हें कोई संबंध नहीं दिखाई देता है?’’

’’इनमें संबंध तो नहीं दिखाई देता पर तुम्हाहरे ऊंचे विचारों और बदहवासी में एक संबंध अक्‍सर दिखाई देता है।‘’

’’शक मुझे भी था। खैर, मैं कह रहा था कि इसके बाद हिन्दुंओं के तुलसीदास मुसलमानों के कबीरदास के शत्रु बनने को बाध्य होंगे ही। पर जल्द ही वह केवल ब्राह्मणों या सवर्णों के कवि बन जाते हैं, फिर केवल पुरुषों के कवि बन जाते हैं। स्त्रियों और शूद्रों को उनसे बहुत सारी शिकायतें बनी रहती है और मुझे हैरानी होती है कि नारी आन्दोलनकारियों ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि सरल पाठ में कबीर में महिलाओं के बारे में अधिक गर्हित टिप्पणियां हैं।

‘’तुम कहना क्याो चाहते हो ?’’

’’यह कि ये अपने समय की सबसे विकराल प्रतीत होने वाली समस्याओं से टकराने वाले चिन्तक हैं, इनको उनके युग और परिवेश में रख कर ही समझा जाना चाहिए। अपनी जरूरतों से इनको लुकाठा बना कर आगजनी का आनन्द नहीं लेना चाहिए? कबीर को भरोसा था कि तार्किक विवेचन से, समाज की दुर्बलताओं को नंगा करके, सामाजिक बुराइयों को दूर करके एक मानवतावादी जीवन पद्धति अपनाई जा सकती है जो धार्मिक और सामाजिक भेदभाव को दूर कर सके । उन्हें स्वयं यह अन्देशा नहीं रहा होगा कि उनका सन्देाश केवल हिन्दु ओं या हिन्दु्ओं से धर्मान्तरित मुसलमानों तक ही पहुंच सकता है, मुसलमान इससे कोई सीख नहीं ले सकते क्योंकि इस्लाम में तर्क के लिए अवकाश ही नहीं है। इसलिए यह खयाली पुलाव सिद्ध होगा।

तुलसी कबीर से बहुत कुछ सीखते हैं, उनकी सीमाओं को समझते हैं, उनके परिणाम के प्रत्यशक्षदर्शी हैं और अपने गहन ऊहापोह में वह मार्ग निकालते है जिसमें अपना घर संभालने और उसकी एक भी शहतीर या तनिक भी खिसकने से बचाने की चिन्ता होती है।

ये उनके युग की समस्यायें हैं। हमारे लिए इनका सबसे बड़ा महत्व यह है कि जिस समय इस्लामी शिक्षा के मकतब और मद्रसे थे, हिन्दु ओं की पाठशालाएं थी जिनमें क्रमश: फारसी, अरबी और संस्कृत का ज्ञान कराया जाता था जिन तक एक प्रतिशत लोगों की भी पहुंच नहीं रहती होगी, वहां इन दोनों कवियों ने सामा‍जिक शिक्षा संस्थानों की भूमिका निभाई। कबीर ने पिछडेा, आज की भाषा में दलितों और अशिक्षितों को अपनी रचनाओं से इस तरह हीनताबोध से उबारा कि वे यह सोच सकें कि उनके पास जो ज्ञान है उसके सामने बडे बड़े पंडित हार जायं, और तुलसी ने नाममात्र के साक्षरों को भी ज्ञान का ऐसा विश्‍वकोश उपस्थित कर दिया कि साक्षरता का भारतीय प्रतिशत जो भी रहा हो, शिक्षा का इसका स्तर दूसरे समाजों से बहुत ऊपर था।

''लगभग सभी जन सामाजिक, सांस्कृततिक, व्यावहारिक मूल्यों से अवगत और शिष्ट । इसे आज की स्थिति में समझाना कठिन है । दोनों में बहुत कुछ ऐसा है जो हमारे समय को देखते हमारे उपयोग का नहीं है, हमें उनके उपादेय तत्वों को ही अपने समय के लिए प्रेरक मान कर ग्रहण करना चाहिए था, बाकी की उपेक्षा कर देनी चाहिए थी। इस दृष्टि से तुलसी में बहुत कुछ है जो हमें उनके समय से भी परिचित कराता है, मानव यातना के रूपों से भी और आज भी जिसका उपयोग किया जा सकता है।

''कबीर हों या नाथपंथी या सिद्ध सभी का सबसे बड़ा दोष यह है कि वे निवृत्तिमार्गी है या अन्धभोगवादी हैं, तुलसी इनमें अकेले हैं जो प्रवृत्तिमार्गी हैं और जिनमें किसी से अधिक संतुलन दिखाई देता है।

''एक बात और बताऊं ? देखो मुझे इसका आधिकारिक ज्ञान नहीं है, पर यदि यह सच है तो कम्युेनिस्टोंह को तुलसी से यह कला सीखनी चाहिए थी कि जनान्दोलन खड़ा कैसे किया जाता है और सफल कैसे किया जाता है।‘’

’’भूमिका ही बांधते रहोगे कि बताओगे भी?’’

’’तुम पता लगाना, सुनते हैं होली के अवसर पर लो अश्लील और कामोत्तेाजक गालियां देने की पुरानी परिपाटी मुक्त समाज की विरासत के रूप में चली आ रही थी, उसे कबीर और जोगीड़ा की संज्ञा देने के पीछे तुलसी का हाथ था।‘’

’’हत्ते रे की। कहां ला के पटका।‘’

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